स्वार्थ से मानवता की ओर: एक वैचारिक यात्रा!

 



​आज के प्रतिस्पर्धी युग में 'स्वार्थ' शब्द को अक्सर नकारात्मक दृष्टि से देखा जाता है। लेकिन क्या स्वार्थ पूरी तरह वर्जित होना चाहिए? चित्र में दिए गए विचार इस पर एक नई और गहरी रोशनी डालते हैं।

​१. स्वार्थ की प्रकृति: जोड़ना या तोड़ना?

—मुद्दा यह नहीं है कि हम स्वार्थी हैं या नहीं, बल्कि यह है कि हमारे स्वार्थ का परिणाम क्या है।

  • सकारात्मक स्वार्थ: यदि हमारा स्वार्थ हमें रिश्तों को बेहतर बनाने और समाज में जुड़ाव पैदा करने के लिए प्रेरित करता है, तो वह सृजनात्मक है।
  • नकारात्मक स्वार्थ: जब स्वार्थ रिश्तों की नींव कमजोर करने लगे और केवल व्यक्तिगत लाभ तक सीमित हो जाए, तो वह विनाशकारी बन जाता है।

​२. वह सीमा जहाँ स्वार्थ 'मानवता' बन जाता है

​ मनुष्य को अपने लाभ की खोज वहां रोक देनी चाहिए जहाँ से दूसरों की पीड़ा शुरू होती है।

​"जिस दिन हम अपने लाभ की सीमा वहाँ रोक देंगे जहाँ से दूसरों की पीड़ा शुरू होती है, उसी दिन स्वार्थ मानवता में बदल जाएगा।"


​यह पंक्ति सिखाती है कि आत्म-कल्याण तब तक उचित है जब तक वह पर-कल्याण में बाधक न बने। सहानुभूति और संवेदनशीलता ही वह रसायन हैं जो एक स्वार्थी व्यक्ति को इंसान (मानवतावादी) बनाते हैं।

​३. क्या स्वार्थ पूरी तरह त्याज्य है?

​ स्वार्थ को पूरी तरह त्यागना (त्याज्य) लगभग असंभव और कठिन है। जीवित रहने के लिए 'स्व' का बोध और अपनी उन्नति की इच्छा आवश्यक है। पूर्णतः निस्वार्थ होना एक आदर्श स्थिति हो सकती है, लेकिन व्यावहारिक जीवन में 'संतुलित स्वार्थ' ही वह मार्ग है जो समाज को स्थिरता देता है।

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