भारतीय रेल: सुरक्षा और सेवा के 'ट्रैक' पर गहराता संकट!

 


भारतीय रेलवे को देश की जीवनरेखा कहा जाता है, लेकिन वर्तमान में यह रेखा असुरक्षा और अव्यवस्था के भंवर में फंसी नजर आती है। एक तरफ सरकार रेलवे को 'विश्व स्तरीय' बनाने के दावे करती है, वहीं दूसरी तरफ यात्रियों की बुनियादी जरूरतों—भोजन और सुरक्षा—के साथ खिलवाड़ एक कड़वा सच बन चुका है।


1. भोजन नहीं, बीमारी का 'जोखिम'

हालिया आंकड़ों और यात्रियों के अनुभवों से स्पष्ट है कि ट्रेनों में परोसा जाने वाला भोजन अब केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि एक 'जोखिम' बन गया है।


गुणवत्ता का अभाव: प्रीमियम ट्रेनों (राजधानी, शताब्दी) से लेकर सामान्य मेल ट्रेनों तक, भोजन में तिलचट्टे, कीड़े और अखाद्य वस्तुओं का मिलना आम हो गया है। 2024-25 के दौरान खान-पान की गुणवत्ता को लेकर 6,645 आधिकारिक शिकायतें दर्ज होना इस संकट की गंभीरता को दर्शाता है।


आर्थिक शोषण: यात्रियों से तय कीमत से अधिक राशि वसूलना और बदले में कम मात्रा या बासी खाना देना रेलवे के निगरानी तंत्र की विफलता है।


जवाबदेही की कमी: शिकायत करने पर कर्मियों द्वारा यात्रियों से दुर्व्यवहार की खबरें सिस्टम की तानाशाही प्रवृत्ति को उजागर करती हैं।


2. सुरक्षा: चोरी और नशाखुरानी का तांडव

भोजन की खराब गुणवत्ता के साथ-साथ, रेलवे परिसर और ट्रेनों के भीतर अपराध का ग्राफ तेजी से बढ़ा है।


नशाखुरानी: लंबी दूरी की ट्रेनों में यात्रियों को नशीला पदार्थ सुंघाकर या खिलाकर लूट लेना एक संगठित अपराध बन चुका है। जीआरपी (GRP) और आरपीएफ (RPF) की मौजूदगी के बावजूद ये गिरोह बेखौफ सक्रिय हैं।


चोरी और छिनतई: चलती ट्रेनों में मोबाइल स्नैचिंग, बैग चोरी और यात्रियों के साथ हाथापाई अब 'आम बात' मानी जाने लगी है। खिड़की के पास बैठे यात्रियों से सामान छीनना और प्लेटफॉर्म पर सुरक्षा घेरे की कमी यात्रियों के मन में भय पैदा करती है।

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