जीवन: एक अनवरत प्रवाह और समय की सीख!
कबीर की कुछ पंक्तियाँ हमें याद दिलाती हैं कि यह संसार नश्वर है। यहाँ 'साजो-सामान' और 'तामझाम' आता-जाता रहता है। हम अक्सर चीजों और व्यक्तियों से जुड़ाव बना लेते हैं, लेकिन समय हमें सिखाता है कि कुछ भी स्थायी नहीं है।
1. अनित्यता और कबीर का बोध
कबीर दास जी ने संसार की इसी क्षणभंगुरता को इन शब्दों में पिरोया है:
कबीरा खड़ा बजार में, लिए लुकाठी हाथ।
जो घर जारे आपना, चले हमारे साथ।।
यहाँ 'घर जलाने' का अर्थ मोह-माया और भौतिक जुड़ाव को त्यागने से है। जब हम यह समझ लेते हैं कि कुछ भी साथ नहीं रहने वाला, तब हम असल जीवन जीना शुरू करते हैं।
2. बिछड़ने का दर्द और उद्देश्य
"हर बिछड़ना दिल तोड़ता है, लेकिन समय के साथ समझ आता है कि हर किसी का आना किसी मकसद से होता है।" कबीर का मानना था कि जीवन में दुख और सुख दोनों गुरु की तरह आते हैं।
दुख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे, तो दुख काहे को होय।।
जब हम प्रतिकूल परिस्थितियों (बिछड़ने या खोने) को एक 'सीख' के रूप में स्वीकार करते हैं, तो वे हमें और अधिक मजबूत बनाती हैं।
3. त्याग और स्वीकार्यता
कभी हम कुछ त्याग देते हैं, तो कभी वह हमें अलविदा कह देता है। यह स्वीकार्यता ही शांति का मार्ग है।
माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रोंदे मोय।
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रोंदूंगी तोय।।,

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