संरक्षणवाद से सक्रिय भागीदारी तक का सफर !

 


​ भारत का व्यापारिक इतिहास स्वाधीनता के बाद "वस्तु विनिमय" (Barter trade) और सोवियत संघ के साथ सीमित व्यापार से शुरू हुआ था। अतीत में भारत अपनी घरेलू अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए संरक्षणवादी नीति अपनाता था, लेकिन वर्तमान सरकार ने इस हिचकिचाहट को छोड़कर अमेरिका और यूरोपीय संघ जैसे बड़े बाजारों के साथ जुड़ने का "साहसिक" निर्णय लिया है।

​वैश्विक व्यापार का बदलता परिदृश्य

​WTO की चुनौतियां: विश्व व्यापार संगठन (WTO) के विवाद निपटान तंत्र के कमजोर होने और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में आए तनाव के कारण अब बहुपक्षीय समझौतों के बजाय द्विपक्षीय FTA (मुक्त व्यापार समझौते) अधिक प्रभावी हो गए हैं।
​रणनीतिक स्वायत्तता: भारत अब केवल कागजी सिद्धांतों पर नहीं, बल्कि लागत-लाभ (Cost-benefit) के व्यावहारिक आकलन पर अपनी विदेश नीति तय कर रहा है।

​भारत-अमेरिका समझौते के मुख्य लाभ

​निर्यात में वृद्धि: भारत ने 2024-25 में अमेरिका को 86.5 बिलियन डॉलर का निर्यात किया। इस समझौते से उन वस्तुओं पर टैरिफ कम होगा जहां भारत की पकड़ मजबूत है (जैसे: जेनेरिक दवाएं, रत्न-आभूषण और विमान के पुर्जे)।
​निवेश और तकनीक: यह सौदा केवल व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अमेरिकी पूंजी और उच्च तकनीक तक भारत की पहुंच सुनिश्चित करेगा।
​तुलनात्मक लाभ: चीन (35%), वियतनाम (20%) और ASEAN देशों की तुलना में भारत की औसत टैरिफ दर 18% है, जो उसे प्रतिस्पर्धी बनाती है।

​जोखिमों से बचाव

​यदि यह समझौता नहीं होता, तो भारत को बढ़ते टैरिफ, निवेश की कमी और प्रतिस्पर्धा में पिछड़ने जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता। साथ ही, यह समझौता कृषि जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को नुकसान पहुंचाए बिना औद्योगिक आधार को मजबूत करने का प्रयास करता है।

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