भक्ति या विनाश: धार्मिक आड़ में बढ़ता नशे का मायाजाल!

 



​भारतीय समाज में एक पुरानी कहावत प्रचलित है— "भांग मांगे दूध मलाई, गांजा मांगे घीउ।" यह कहावत इस भ्रम को पालती है कि गांजा या भांग का सेवन शरीर को बलवान बनाता है। लेकिन हकीकत इसके ठीक उलट है। विज्ञान और वास्तविकता गवाह है कि नशा शरीर को बनाता नहीं, बल्कि 'गलाता' है। आज के समय में, विशेषकर युवा पीढ़ी के बीच, नशा 'भक्ति' और 'चिल' करने का एक खतरनाक माध्यम बन चुका है।

​1. आस्था की आड़ में अधर्म

​अक्सर मंदिरों और धार्मिक स्थलों पर 'बम शंकर' के जयकारों के साथ गांजे की चिलम सुलगाई जाती है। लोग इसे भगवान शिव का प्रसाद मानकर जायज ठहराते हैं। लेकिन विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या ब्रह्मांड के रचयिता को प्रसन्न करने के लिए किसी नशे की आवश्यकता है?

​पुराणों के अनुसार, शिव और आदि शक्ति ने पंचतत्वों का निर्माण जीवन को चलाने के लिए किया था, उसे नष्ट करने के लिए नहीं। जिसे लोग 'शिव की बूटी' कहते हैं, वह असल में चेतना को सुन्न करने का साधन है। सच्ची उपासना होश में रहकर की जाती है, बेहोशी में नहीं। धार्मिक स्थलों पर नशे का यह 'खुला खेल' न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि यह पवित्रता के साथ एक क्रूर मजाक भी है।

​2. 'चिलम' से 'पॉड' तक का घातक सफर

​समय बदला और नशे के स्वरूप भी। जो गांजा कभी गांव के बुजुर्गों के कौड़े (अलाव) तक सीमित था, वह अब बोंग, पाइप और पॉड जैसे आधुनिक उपकरणों के जरिए ड्राइंग रूम तक पहुँच गया है।

  • UN (संयुक्त राष्ट्र) 2023 की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 10 वर्षों में मादक पदार्थों के व्यसन में 45% की वृद्धि हुई है।
  • ​बाजार की भयावहता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि हर 9 दिन में एक नया सिंथेटिक ड्रग बाजार में कदम रख रहा है।

​3. जीवन का क्षरण: टैफोनॉमी और नशे के चरण

​विज्ञान में शव के गलने की प्रक्रिया (Taphonomy) के जैसे 5 चरण होते हैं, वैसे ही नशे की लत किसी जीवित व्यक्ति को लाश बनाने की ओर ले जाती है। इसकी प्रक्रिया अत्यंत सूक्ष्म लेकिन घातक है:

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