भोजपुरी लोक कला का 'विद्रोही सितारा': राम सिंगासन उर्फ चाईं ओझा की अनकही दास्तां !

 


लेखक: प्रो प्रसिद्ध कुमार।

दिनांक: 8 फरवरी, 2026

श्रेणी: लोक संस्कृति / बिहार की विरासत

​आज बात उस कलाकार की, जिसकी कला की गूँज सात समंदर पार तक जानी चाहिए थी, लेकिन वह अपनों के बीच ही 'अजनबी' बनकर रह गया। यह कहानी है बक्सर के देकुली गाँव के उस ब्राह्मण बेटे की, जिसने समाज की रूढ़ियों को पैरों तले रौंदकर 'लौंडा नाच' के घुंघरू बाँध लिए।

कुलीनता की जंजीरें और कला का विद्रोह

​सन् 1942, जब पूरा देश महात्मा गांधी के 'अंग्रेजों भारत छोड़ो' के आह्वान पर सड़कों पर था, उसी दौर में बक्सर के इटाड़ी थाना स्थित देकुली गाँव में एक किशोर विद्रोह कर रहा था। वह विद्रोह किसी बाहरी सत्ता के खिलाफ नहीं, बल्कि सदियों पुरानी उस सामाजिक जंजीर के खिलाफ था जो कला को 'जाति' के चश्मे से देखती थी।

राम सिंगासन उर्फ चाईं ओझा। नाम तो था ब्राह्मणों वाला, पर दिल धड़कता था लोक कला के लिए। इंद्र देव ओझा (झक्कड़ बाबा) जैसे जमींदार और रसूखदार पिता की इकलौती संतान होने के बावजूद चाईं ओझा ने 'नचनिया' बनना स्वीकार किया।

"बिना नाच और गान के चाईं जिंदा तो रह सकते थे, मगर जी नहीं सकते थे।"

अपनों की घृणा और कला का जुनून

​उस दौर में एक ब्राह्मण का नाचना समाज के लिए किसी भूकंप से कम नहीं था। नतीजा यह हुआ कि चाईं ओझा को जीते-जी अपनों के तिरस्कार की आग में जलना पड़ा:

​पिता का पछतावा: झक्कड़ बाबा ने अंत तक चाईं को स्वीकार नहीं किया। उनके लिए उनका बेटा कुल का कलंक था।
​सामाजिक बहिष्कार: गांव वालों की नफरत और रिश्तेदारों का नाता तोड़ लेना।
​अकेलापन: पट्टीदारों ने बोलना-चालना तक बंद कर दिया।

​लेकिन चाईं ओझा तो 'भोजपुरिया मीरा' थे। जैसे मीरा ने कृष्ण के लिए लाज छोड़ी, वैसे ही चाईं ने कला के लिए कुल की झूठी मर्यादा छोड़ दी।

जब चाईं ओझा 'भोजपुरिया माइकल जैक्सन' बने

​60 और 70 का दशक चाईं ओझा के नाम था। वे उस दौर के सुपरस्टार थे। बनारस के कलाकार चंद्रिका जी के साथ उनकी जोड़ी ने वह धूम मचाई कि लोग आज भी याद करते हैं।

​HMV का दौर: उनके गाने ग्रामोफोन रिकॉर्ड्स पर बजते थे।
​हजारों की भीड़: जब चाईं मंच पर आते, तो हजारों का मजमा उनके सम्मान में खड़ा हो जाता। बच्चे उन्हें देखने के लिए तरस जाते क्योंकि भीड़ इतनी होती कि कुछ दिखाई नहीं देता था।
​अद्वितीय कलाकार: जहाँ भिखारी ठाकुर ने समाज सुधार के नाटकों से नाम कमाया, वहीं चाईं ओझा का प्रदर्शन शुद्ध मनोरंजन और कलात्मक बारीकियों का शिखर था।

साजिश या उपेक्षा?

​यह एक कड़वा सच है कि भोजपुरी साहित्य और राजनीति ने चाईं ओझा जैसे कलाकारों को वह स्थान नहीं दिया जिसके वे हकदार थे। ब्राह्मण होने के कारण सवर्ण समाज उन्हें अपना नहीं पाया, और लोक विधाओं के बुद्धजीवियों ने उन्हें 'पहुंच से दूर का स्टार' मानकर दरकिनार कर दिया। बाबा महेंद्र मिश्र की तरह वे भी उपेक्षा के शिकार रहे।

चाईं ओझा की अमर विरासत

​चाईं ओझा के गाए गीत आज भी लोक स्मृति का हिस्सा हैं:

​"जन्मते भी लकड़ी, मरते भी लकड़ी, देख तमाशा लकड़ी का" (जीवन का सार)
​"सड़ीया में आग लागल, महुली में जाके"
​"लौंडा के नाच देखे दू दू कोस जाले"

​भले ही उनके पिता को जीवन भर चाईं का बाप होने पर अफसोस रहा, लेकिन आज भोजपुरी माटी को उन पर गर्व है। चाईं ओझा ने साबित किया कि कला किसी जाति या पंथ की जागीर नहीं होती।

Comments

Popular posts from this blog

डीडीयू रेल मंडल में प्रमोशन में भ्रष्टाचार में संलिप्त दो अधिकारी सहित 17 लोको पायलट गिरफ्तार !

अलविदा! एक जन-नेता का सफर हुआ पूरा: प्रोफेसर वसीमुल हक़ 'मुन्ना नेता' नहीं रहे !

एक परिवार की पुकार: रामलड्डू की सकुशल वापसी के लिए सरकार से गुहार !😢प्रो प्रसिद्ध कुमार।