जातीय श्रेष्ठता की विडंबना: रहीम का साहित्य और समाज !
मध्यकालीन भारतीय समाज में जाति एक पत्थर की लकीर बन चुकी थी। रहीम ने अपनी लेखनी से इस विडंबना पर प्रहार किया कि मनुष्य का मूल्य उसके 'कुल' या 'जाति' से नहीं, बल्कि उसके गुणों और व्यवहार से होना चाहिए।
रहीम कहते हैं कि ऊंचे कुल में जन्म लेने मात्र से कोई महान नहीं हो जाता, यदि उसके कर्म नीच हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि श्रेष्ठता 'लेबल' में नहीं, 'स्वभाव' में होती है:
"ऊंचे कुल का जनमिया, जे करनी ऊंच न होय।
सुबरन कलस सुरै भरा, साधू निंदत सोय॥"
साहित्यिक विश्लेषण: यहाँ रहीम 'स्वर्ण कलश' (ऊंची जाति) और 'मदिरा' (बुरे कर्म) का रूपक बांधते हैं। जैसे सोने के घड़े में शराब भर देने से वह पवित्र नहीं हो जाती और सज्जन उसकी निंदा ही करते हैं, वैसे ही उच्च जाति में जन्म लेकर यदि व्यक्ति के संस्कार निम्न हैं, तो वह समाज के लिए त्याज्य है।
जातीय श्रेष्ठता का अहंकार तब टूटता है जब व्यक्ति को किसी ऐसे काम की आवश्यकता पड़ती है जिसे वह 'छोटा' समझता है। रहीम ने इस सामाजिक विसंगति को बड़े मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है:
"रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिये डारि।
जहाँ काम आवै सुई, कहा करै तरवारि॥"
साहित्यिक विश्लेषण: यह दोहा जातिगत पदानुक्रम (Hierarchy) पर सीधा प्रहार है। समाज जिसे 'तलवार' (ऊंची जाति/शक्तिशाली) समझकर पूजता है और 'सुई' (तथाकथित छोटी जाति) को तुच्छ मानकर त्याग देता है, वह भूल जाता है कि फटे हुए रिश्तों और समाज को जोड़ने का काम सुई ही करती है, तलवार नहीं।

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