घूसखोर पंडत': विवाद और संवेदनशीलता !

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​फिल्म का शीर्षक सामने आते ही FWICE और कई सामाजिक संगठनों ने इस पर आपत्ति जताई है। विरोध का मुख्य स्वर यह है कि 'पंडत' या 'पंडित' जैसे जातिसूचक शब्द के साथ 'घूसखोर' (Corrupt) जोड़ना एक विशेष समुदाय की छवि को धूमिल करता है।

​आलोचनात्मक दृष्टिकोण

​अभिव्यक्ति की आजादी बनाम सामाजिक मर्यादा: सिनेमा समाज का दर्पण होता है, लेकिन जब शीर्षक ही किसी समुदाय को नकारात्मक रूप से लक्षित (Target) करता प्रतीत हो, तो वह रचनात्मक स्वतंत्रता और सामाजिक संवेदनशीलता के बीच की लकीर को धुंधला कर देता है।
​टाइटल का प्रभाव: फिल्म दिल्ली के एक सब-इंस्पेक्टर की कहानी है। फिल्म निर्माण में अक्सर 'कैच-फ्रेज' का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन वर्तमान सामाजिक परिवेश में फिल्मकारों को यह समझना होगा कि शीर्षक केवल ध्यान खींचने का जरिया नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी भी है।
​पुराने उदाहरण: 'पंडित और पठान', 'पंडित जी बताइए न विवाह कब होई' जैसी फिल्में पहले बनी हैं, लेकिन वहां संदर्भ या तो सकारात्मक था या हास्यपूर्ण। 'घूसखोर' शब्द सीधे तौर पर एक नैतिक प्रहार है, जो विवाद को जन्म देता है।

​फिल्म की प्रमुख टीम (Cast & Crew)

​नीरज पांडे की फिल्मों की खासियत उनका "टेक्निकल परफेक्शन" और मजबूत अभिनय होता है।

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