एआई का 'स्मार्ट' भविष्य: प्रगति और पर्यावरण के बीच का द्वंद्व !
आज की डिजिटल दुनिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को मानव जाति की हर समस्या के अचूक समाधान के रूप में देखा जा रहा है। चिकित्सा से लेकर अंतरिक्ष विज्ञान तक, एआई हमारी क्षमताओं को नए पंख लगा रहा है। लेकिन इस 'स्मार्ट' क्रांति की एक स्याह हकीकत भी है, जो हमारे डेटा केंद्रों (Data Centers) की बिजली की भूख और पानी की खपत के पीछे छिपी है।
1. बढ़ता ऊर्जा संकट और एआई
एआई जितना विकसित हो रहा है, उसे उतनी ही अधिक कंप्यूटिंग शक्ति की आवश्यकता पड़ रही है। अधिकांश डेटा सेंटर आज भी कोयला और गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों से चलने वाली बिजली पर निर्भर हैं।
तथ्य: एक अनुमान के मुताबिक, एआई के जरिए एक सामान्य ईमेल लिखने या इमेज जनरेट करने में उतनी ही ऊर्जा खर्च हो सकती है जितनी कि कई स्मार्टफोन्स को चार्ज करने में।
2. जल संकट: एक अनकहा पहलू
एआई के सर्वरों को ठंडा रखने के लिए भारी मात्रा में ताजे पानी की जरूरत होती है। जब जमीन पर बने ये डेटा केंद्र लाखों गैलन पानी 'गटकने' लगते हैं, तो स्थानीय जल स्तर पर इसका सीधा असर पड़ता है। यह विकास की वह कीमत है जिसे हमारा पर्यावरण चुका रहा है।
3. आज की जरूरत और पर्यावरण में सामंजस्य कैसे बने?
प्रगति को रोका नहीं जा सकता, लेकिन उसे सस्टेनेबल (सतत) बनाया जा सकता है। सामंजस्य बिठाने के लिए निम्नलिखित कदम अनिवार्य हैं:

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