सरला माहेश्वरी: जहाँ चेहरा नहीं, शब्द और चरित्र बोलते थे!

 



​आज की कानफोड़ू 'ब्रेकिंग न्यूज़' और चकाचौंध भरे स्टूडियो के शोर में जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो एक सौम्य चेहरा आंखों के सामने तैर जाता है—सरला माहेश्वरी। दूरदर्शन के उस श्वेत-श्याम और शुरुआती रंगीन दौर की वह एक ऐसी आवाज़ थीं, जिसने पत्रकारिता को 'ग्लैमर' से नहीं, बल्कि 'गरिमा' से परिभाषित किया था।

​सादगी का सौंदर्य और शब्दों का संस्कार

​सरला जी का व्यक्तित्व भारतीय संस्कृति की उस शालीनता का प्रतिबिंब था, जिसे आज के दौर में ढूँढना कठिन है। सीधा पल्लू, माथे पर एक छोटी सी बिंदी और चेहरे पर वह ठहराव, जो दर्शकों को सहज ही अपना बना लेता था। उनके लिए समाचार पढ़ना केवल एक पेशा नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी थी। जब वे स्क्रीन पर अवतरित होती थीं, तो ऐसा लगता था मानो परिवार का कोई सदस्य घर के बैठक में बैठकर देश-दुनिया का हाल सुना रहा हो।

​संयम की प्रतिमूर्ति

​1982 से समाचार वाचन की कमान संभालने वाली सरला जी ने कभी आवाज़ की तीव्रता से खबरों को बड़ा दिखाने की कोशिश नहीं की। उनकी आवाज़ में वह गंभीरता थी, जो बिना चिल्लाए भी गहरा असर छोड़ती थी।

​"उनकी पत्रकारिता का मूल मंत्र था—शब्दों की पवित्रता। वे समाचारों को सुनाती नहीं थीं, बल्कि उन्हें महसूस करवाती थीं।"


​इतिहास गवाह है कि जब देश ने राजीव गांधी के निधन जैसी हृदयविदारक खबर सुनी, तो वह सरला जी की ही आवाज़ थी। उस अत्यंत कठिन क्षण में भी उनकी आवाज़ का संयम और आँखों की गरिमा विचलित नहीं हुई। यही एक महान समाचार वाचक की असली पहचान होती है—अपनी भावनाओं को कर्तव्य के अनुशासन में बाँध लेना।

​विद्वत्ता और भाषा का संगम

​हंसराज कॉलेज में लेक्चरर रहीं सरला जी का भाषा पर असाधारण अधिकार था। हिंदी का शुद्ध उच्चारण और शब्दों का सही चयन उनकी सबसे बड़ी शक्ति थी। उन्होंने सिद्ध किया कि पत्रकारिता का स्तर ऊँचा रखने के लिए शोर की नहीं, बल्कि शोध और शुद्धता की आवश्यकता होती है।

​एक युग का अवसान, पर मिसाल कायम है

​71 वर्ष की आयु में जब उन्होंने इस संसार से विदा ली, तो भारतीय टेलीविजन के एक युग का अंत हो गया। आज जब एंकरिंग के मायने बदल गए हैं, सरला माहेश्वरी जी की यादें हमें याद दिलाती हैं कि:

  • ​पत्रकारिता का धर्म सत्य है।
  • ​प्रस्तुति का गहना सादगी है।
  • ​और एंकर की असली ताकत उसकी आवाज़ की गहराई है।

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