समझौते की प्रकृति: कूटनीति या दबाव?
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भारत ने अमेरिकी टैरिफ के डर से रूस से सस्ता तेल खरीदने की अपनी संप्रभुता (Sovereignty) का त्याग किया है।
अमेरिकी टैरिफ में जो कटौती की गई है, वह वास्तव में कोई 'तोहफा' नहीं बल्कि पूर्व में लगाए गए अनुचित टैरिफ की आंशिक वापसी है।
डोनाल्ड ट्रंप की "अस्थिरता" इस समझौते को कभी भी खतरे में डाल सकती है, क्योंकि ट्रंप ने पहले भी दक्षिण कोरिया जैसे देशों के साथ हुए समझौतों से हाथ पीछे खींचे हैं।
2. दीर्घकालिक लाभ बनाम तात्कालिक नुकसान
यह समझौता भारत को ग्लोबल सप्लाई चेन (जैसे सेमीकंडक्टर और एआई) में एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में स्थापित करता है।
भारत अब केवल 'असेंबली' तक सीमित नहीं है, बल्कि इनोवेशन और अनुसंधान की ओर बढ़ रहा है।
चंद्रशेखरन के अनुसार, एआई (AI) और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर में भारत की बढ़त इस सौदे को भारत के पक्ष में मोड़ती है।
3. एआई (AI) और मानव संसाधन की शक्ति
संदेह: हालांकि भारत के पास लाखों स्टेम (STEM) स्नातक हैं, लेकिन उनकी गुणवत्ता पर सवाल हैं। ट्रंप की नीतियां भविष्य में भारतीय आईटी पेशेवरों (H-1B वीजा) के लिए मुश्किलें पैदा कर सकती हैं।
उम्मीद: भारत का एआई इकोसिस्टम और यहाँ का डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर उसे एक "AI Superpower" बनाने की राह पर है, जो किसी भी व्यापारिक खींचतान से ऊपर है।

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