गया की गलियों में गूँजती वो आख़िरी ठुमरी: जद्दनबाई की हवेली का अंत ! उनकी बेटी नरगिस और नाती संजय दत्त ने भारतीय सिनेमा के शिखर तक पहुँचाया।
इतिहास कभी-कभी ईंट-गारों की दीवारों में नहीं, बल्कि उन हवाओं में बसता है जो किसी दौर की महफिलों की गवाह रही हों। बिहार के गया शहर के पंचायती अखाड़ा रोड पर खड़ी वह हवेली अब मिट्टी में मिल चुकी है, लेकिन उसकी रूह में आज भी ठुमरी के वो सुर और घुँघरुओं की वो खनक दफ़न है, जिसने कभी राजा-रजवाड़ों को मंत्रमुग्ध कर दिया था।
कला की 'मल्लिका' और गया का नाता
यह हवेली सिर्फ़ एक इमारत नहीं थी, बल्कि भारतीय कला जगत की एक गौरवशाली विरासत थी। यहाँ देश की प्रसिद्ध नर्तकी और गायिका जद्दनबाई का बसेरा था। वही जद्दनबाई, जिनकी विरासत को आगे चलकर उनकी बेटी नरगिस और नाती संजय दत्त ने भारतीय सिनेमा के शिखर तक पहुँचाया।
कहा जाता है कि करीब 100 साल पहले इस हवेली में जब जद्दनबाई अपनी महफ़िल सजाती थीं, तो वक्त ठहर जाया करता था। ठुमरी के सुरों पर जब वे थिरकती थीं, तो दूर-दूर से रईस और कला-पारखी उनके फन का दीदार करने खिंचे चले आते थे। वह दौर कला की कद्रदानी का स्वर्णिम युग था।
विकास की भेंट चढ़ी विरासत
विडंबना देखिए, जिस विरासत को एक 'म्यूज़ियम' या कला केंद्र होना चाहिए था, वह समय की मार और सरकारी उपेक्षा की भेंट चढ़ गई। डायट (DIET) परिसर में स्थित यह हवेली पहले ही जर्जर हो चुकी थी, और अब 'बिहार शिक्षा परियोजना' के नए एकेडमिक भवन के निर्माण के लिए इसे पूरी तरह ध्वस्त कर दिया गया है।
"पुरानी यादें जब ढहती हैं, तो सिर्फ़ मलबा नहीं निकलता, बल्कि एक समूचा युग मौन हो जाता है।"
सहेजने की ज़रूरत क्यों थी?
एक ऐसे दौर में जब हम अपनी सांस्कृतिक जड़ों को तलाश रहे हैं, जद्दनबाई की हवेली का गिरना एक बड़ी क्षति है:

Comments
Post a Comment