आवश्यकतानुसार न्यायपालिका में विविधता और सुलभता: कॉलेजियम प्रणाली और सुधार की चुनौतियाँ!
1. न्यायपालिका में सामाजिक प्रतिनिधित्व का अभाव
यह इस कड़वी सच्चाई को उजागर करता है कि भारतीय उच्चतर न्यायपालिका में सामाजिक विविधता की भारी कमी है।
आंकड़े: 2018 से 2024 के बीच नियुक्त न्यायाधीशों में केवल 20% SC, ST और OBC समुदायों से थे।
लैंगिक और धार्मिक असंतुलन: महिलाओं और धार्मिक अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व क्रमशः 15% और 5% से भी कम है।
आलोचना: यह आंकड़े दर्शाते हैं कि 'योग्यता' (Merit) के नाम पर अनजाने में एक विशिष्ट वर्ग का वर्चस्व बना हुआ है, जो न्यायपालिका की समावेशी छवि को प्रभावित करता है।
2. कॉलेजियम प्रणाली: स्वतंत्रता बनाम पारदर्शिता
विकास: 1993 के 'दूसरे न्यायाधीश मामले' के बाद न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए इसे लाया गया।
समस्या: इस प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी है। भाई-भतीजावाद (Nepotism) के आरोपों और बंद दरवाजों के पीछे होने वाली नियुक्तियों ने इसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं।
NJAC की विफलता: 2015 में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) को सुप्रीम कोर्ट द्वारा रद्द करना न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच सत्ता के संघर्ष को दर्शाता है।
3. भौगोलिक पहुंच और क्षेत्रीय पीठ (Regional Benches)
न्याय केवल निष्पक्ष ही नहीं, बल्कि सुलभ भी होना चाहिए।
चुनौती: सुप्रीम कोर्ट का केवल दिल्ली में होना दक्षिण और पूर्वी भारत के नागरिकों के लिए आर्थिक और शारीरिक बाधा उत्पन्न करता है। वर्तमान में लगभग 90,000 मामले लंबित हैं।
प्रस्ताव: विधेयक में दिल्ली, कोलकाता, मुंबई और चेन्नई में क्षेत्रीय पीठ स्थापित करने का सुझाव दिया गया है। यह 'न्याय के लोकतंत्रीकरण' की दिशा में एक बड़ा कदम हो सकता है।
4. विधेयक के प्रमुख प्रावधान और समाधान
विधेयक न केवल आरक्षण की बात करता है, बल्कि एक निश्चित समय सीमा (90 दिन) का भी प्रस्ताव रखता है ताकि नियुक्तियों में देरी न हो।
सुझाव: दक्षिण अफ्रीका और यूके की तर्ज पर चयन प्रक्रिया को व्यापक बनाना, जिसमें शिक्षाविदों और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों को शामिल किया जाये.न्याय" के बीच संतुलन बनाने की वकालत करता है।

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