वंदे मातरम बिना किसी संसदीय कानून या संवैधानिक संशोधन के थोपा गया।
1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और 1937 का समझौता
1937 में कांग्रेस कार्य समिति ने यह निर्णय लिया था कि केवल पहले दो अंतरा ही 'राष्ट्रीय गीत' के रूप में गाए जाएंगे।
यह निर्णय इसलिए लिया गया था क्योंकि बाद के अंतराओं में हिंदू देवियों (दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती) का आह्वान किया गया है, जो एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में अन्य धर्मों के नागरिकों की मान्यताओं से टकरा सकता था।
रवींद्रनाथ टैगोर और महात्मा गांधी जैसे नेताओं ने भी केवल पहले दो अंतराओं को ही सर्वस्वीकार्य माना था।
2. संवैधानिक और कानूनी तर्क
अनुच्छेद 51A: संविधान के मौलिक कर्तव्यों में 'राष्ट्र ध्वज' और 'राष्ट्रगान' (जन गण मन) का सम्मान करने की बात है, लेकिन 'राष्ट्रीय गीत' (वंदे मातरम) का उल्लेख जानबूझकर नहीं किया गया है।
बिजोय इमैनुएल केस (1986): सुप्रीम कोर्ट ने इस ऐतिहासिक फैसले में कहा था कि यदि कोई व्यक्ति राष्ट्रगान के दौरान सम्मानपूर्वक खड़ा रहता है लेकिन अपनी धार्मिक मान्यताओं के कारण उसे गाता नहीं है, तो उसे मजबूर नहीं किया जा सकता।
जब राष्ट्रगान (जिसका उल्लेख संविधान में है) गाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, तो राष्ट्रीय गीत (जिसका संवैधानिक अनिवार्य उल्लेख कम है) के लिए मजबूर करना कानूनी रूप से गलत है।
3. 'संवैधानिक बर्बरता' और अंतरात्मा का प्रश्न
यह "संवैधानिक बर्बरता" है। किसी मुस्लिम, ईसाई या सिख नागरिक को उन छंदों पर खड़े होने या गाने के लिए मजबूर करना, जिनमें दूसरे धर्म के देवताओं की स्तुति है, उनकी अंतरात्मा और अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) का उल्लंघन है।
आदेश की आलोचना इसलिए भी की गई है क्योंकि यह बिना किसी संसदीय कानून या संवैधानिक संशोधन के, केवल एक कार्यकारी आदेश (Executive Order) के जरिए थोपा गया है।

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