भारत में मानसिक स्वास्थ्य संकट: चुनौतियां और समाधान !

 


​भारत वर्तमान में एक गंभीर मानसिक स्वास्थ्य आपातकाल का सामना कर रहा है। हालिया आर्थिक सर्वेक्षण और बजट घोषणाओं ने इस मुद्दे को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है। विशेष रूप से बच्चों और किशोरों में बढ़ती डिजिटल लत (Digital Addiction) और स्क्रीन से जुड़ी समस्याओं ने विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है।

​1. मानसिक स्वास्थ्य का बढ़ता बोझ

​आंकड़े एक डरावनी तस्वीर पेश करते हैं:

​वैश्विक हिस्सेदारी: दुनिया की कुल आत्महत्याओं, अवसाद और नशे की लत के मामलों में भारत की हिस्सेदारी लगभग एक-तिहाई है।
​युवाओं पर प्रभाव: 15 से 29 वर्ष की आयु के भारतीयों में मृत्यु का एक प्रमुख कारण आत्महत्या है।
​आर्थिक नुकसान: WHO के अनुसार, 2012 से 2030 के बीच मानसिक स्वास्थ्य स्थितियों के कारण भारत को लगभग $1.03 ट्रिलियन का आर्थिक नुकसान होने का अनुमान है।
​इलाज का अंतर: लगभग 70% से 90% लोगों को जागरूकता की कमी, सामाजिक कलंक और पेशेवरों की कमी के कारण उचित उपचार नहीं मिल पाता है।

​2. बुनियादी ढांचे की कमी

​भारत में मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की भारी कमी है। भारतीय मनोचिकित्सा जर्नल के अनुसार:

​भारत में प्रति 1,00,000 लोगों पर केवल 0.75 मनोचिकित्सक हैं।
​जबकि WHO का मानक प्रति 1,00,000 लोगों पर कम से कम 3 मनोचिकित्सक होना चाहिए।

​3. सरकारी पहल और बजट

​सरकार ने इस दिशा में कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं:

​संस्थानों की स्थापना: उत्तर भारत में एक दूसरे NIMHANS की स्थापना का प्रस्ताव दिया गया है। साथ ही रांची और तेजपुर के संस्थानों को अपग्रेड किया जा रहा है।
​Tele MANAS: यह एक 24x7 मुफ्त हेल्पलाइन सेवा है (14416 या 1800-891-4416), जो 36 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में 53 सेल के साथ काम कर रही है।
​आयुष्मान आरोग्य मंदिर: प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को एकीकृत किया गया है।
​बजट आवंटन: पिछले पांच वर्षों में बजट 683 करोड़ रुपये (2020-21) से बढ़कर 1,098 करोड़ रुपये (2024-25) हो गया है।

​4. मुख्य कमियां और चुनौतियां

​बजट बढ़ने के बावजूद विशेषज्ञों का मानना है कि यह पर्याप्त नहीं है:

​कम आवंटन: मानसिक स्वास्थ्य के लिए बजट अभी भी कुल स्वास्थ्य बजट के 1% के आसपास ही है।
​केंद्रीकृत दृष्टिकोण: अधिकांश धन बड़े संस्थानों (जैसे NIMHANS) को जाता है, जबकि जमीनी स्तर पर सामुदायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता है।
​फंड का उपयोग: आवंटित राशि का भी राष्ट्रीय स्तर पर पूर्ण उपयोग नहीं हो पाता है।

​5. भविष्य की राह

​विशेषज्ञों के अनुसार, केवल इलाज (Curative) पर ध्यान देने के बजाय बचाव (Preventive) पर ध्यान देना होगा:

​समुदाय-आधारित मॉडल: मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को स्कूलों के पाठ्यक्रम और कार्यस्थलों की नीतियों में शामिल करना होगा।
​सस्ती पहुंच: उपचार को सस्ता और निरंतर (Continuity of care) बनाना होगा।
​पेशेवरों की संख्या बढ़ाना: अधिक पीजी विभागों और उत्कृष्टता केंद्रों (Centres of Excellence) की स्थापना कर विशेषज्ञों की कमी को दूर करना होगा।

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