वैश्विक व्यापार नीति और भारतीय हितों का टकराव !

 


​यह भारत और विकसित राष्ट्रों के बीच की गहरी आर्थिक और नीतिगत खाई को रेखांकित करता है। वैश्विक व्यापार के नियम अक्सर उन देशों द्वारा बनाए जाते हैं जिनकी प्राथमिकताएँ भारत जैसी विकासशील अर्थव्यवस्थाओं से पूर्णतः भिन्न हैं।

​मुख्य विश्लेषण और आलोचना

1. विकसित देशों का दोहरा चरित्र:

एक तरफ ये देश 'नियम-आधारित बहुपक्षीय व्यवस्था' की दुहाई देते हैं, वहीं दूसरी तरफ अपने लाभ के लिए गुप्त क्षेत्रीय समझौतों का सहारा लेते हैं। यह दर्शाता है कि वैश्विक मंच पर 'समान अवसर' की बात केवल एक छलावा है, जहाँ शक्तिशाली राष्ट्र नियमों को अपनी सुविधानुसार मोड़ते हैं।

2. प्राथमिकताओं का बुनियादी अंतर:

​भारत का लक्ष्य: यहाँ प्राथमिकता 'जीवन रक्षा' और 'बुनियादी अधिकार' (भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य) हैं।
​विकसित देशों का लक्ष्य: उनकी प्राथमिकता 'जीवन की गुणवत्ता' और 'पूंजी का संरक्षण' (बौद्धिक संपदा, नवाचार) है। यह अंतर यह सिद्ध करता है कि एक ही 'ग्लोबल पॉलिसी' दोनों वर्गों पर समान रूप से लागू नहीं की जा सकती।

3. व्यापारिक बाधाओं के नए स्वरूप:

विकसित देश अक्सर 'पर्यावरण मानकों' और 'श्रम नियमों' को एक नैतिक आवरण के रूप में इस्तेमाल करते हैं, जबकि वास्तव में ये विकासशील देशों के उत्पादों को रोकने के लिए 'गैर-टैरिफ बाधाएं' (Non-tariff barriers) होती हैं। भारत के लिए सामाजिक न्याय और कृषि का विकास केवल आर्थिक मुद्दा नहीं, बल्कि एक मानवीय आवश्यकता है।

4. संतुलित उदारीकरण की आवश्यकता:

मुक्त व्यापार का अर्थ आत्मसमर्पण नहीं होना चाहिए। भारत को अपनी घरेलू क्षमताओं (Domestic Capacity) को बढ़ाते हुए ही वैश्विक बाजार में उतरना होगा, अन्यथा विदेशी प्रतिस्पर्धा स्थानीय उद्योगों को निगल जाएगी।

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