षड्यंत्र या संयोग? 'Not Found Suitable' के नाम पर पिछड़ों का हक मारने का सच !

 

​भारतीय लोकतंत्र में 'आरक्षण' केवल गरीबी हटाओ कार्यक्रम नहीं, बल्कि प्रशासन और सत्ता में पिछड़े वर्गों की 'भागीदारी' का संवैधानिक वादा था। लेकिन हाल के आंकड़े और संसद में उठी आवाजें एक भयावह हकीकत बयां कर रही हैं। लाखों पद सिर्फ इसलिए खाली पड़े हैं क्योंकि चयन समितियों ने ओबीसी (OBC) और दलित उम्मीदवारों को "उपयुक्त नहीं पाया" (Not Found Suitable)

1. आंकड़ों का मायाजाल: रिक्तियों का अंबार

​संसद में पेश किए गए विभिन्न आंकड़ों के अनुसार, केंद्र सरकार के विभिन्न विभागों, विशेषकर उच्च शिक्षण संस्थानों (IITs, IIMs) और केंद्रीय विश्वविद्यालयों में ओबीसी के हजारों पद रिक्त हैं।

​बैकलॉग का खेल: जब भी भर्ती निकलती है, आरक्षित सीटों को यह कहकर खाली छोड़ दिया जाता है कि "योग्य उम्मीदवार नहीं मिले।"
​कट-ऑफ का हथियार: कई बार लिखित परीक्षा पास करने के बावजूद, साक्षात्कार (Interview) में बेहद कम अंक देकर उम्मीदवारों को अयोग्य घोषित कर दिया जाता है।

2. 'योग्यता' (Merit) बनाम 'मानसिकता'

​जो वर्ग सदियों से खुद को जन्मजात श्रेष्ठ मानता आया है, उसने 'मेरिट' को एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया है।

​पूर्वाग्रह (Prejudice): चयन समितियों में विविधता का अभाव है। जब निर्णय लेने वाले लोग एक ही विशेष वर्ग से होते हैं, तो वहां 'संस्थागत जातिवाद' (Institutional Casteism) जन्म लेता है।
​साजिश का तरीका: यह कहना कि 52% से अधिक आबादी वाले ओबीसी वर्ग में 9 लाख पदों को भरने के लिए 'योग्य' लोग नहीं हैं, न केवल हास्यास्पद है बल्कि अपमानजनक भी है।

3. 'उपयुक्तता' (Suitability) तय करने का पैमाना क्या है?

​ राजद सांसद संजय यादव ने सही सवाल उठाया है कि आखिर यह 'उपयुक्तता' तय कौन करता है?

​अगर उम्मीदवार लिखित परीक्षा (जो कि निष्पक्ष मानी जाती है) पास कर चुका है, तो केवल इंटरव्यू के आधार पर उसे 'अयोग्य' करार देना पारदर्शी प्रक्रिया पर सवाल उठाता है।
​सरकार ने इन उम्मीदवारों को "सूटेबल" बनाने के लिए प्रशिक्षण या सुधारात्मक कदम (Remedial Measures) उठाने के बजाय, पदों को खाली रखना बेहतर समझा।

4. सरकार की चुप्पी और जिम्मेदारी

​संविधान के अनुच्छेद 16(4) के तहत पिछड़ों को प्रतिनिधित्व देना राज्य की जिम्मेदारी है। लेकिन वर्तमान स्थिति दिखाती है कि:

​निजीकरण का सहारा: सरकारी पदों को कम किया जा रहा है और आउटसोर्सिंग बढ़ाई जा रही है, जहाँ आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है।
​डाटा की कमी: सरकार अक्सर जातिगत जनगणना और सटीक रिक्तियों के डाटा से बचती नजर आती है, जिससे इस 'साजिश' को पर्दे के पीछे जारी रखने में मदद मिलती है।
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