छलावा और विरह की होली! (कविता) -प्रो प्रसिद्ध कुमार.

  


विरह की अग्नि दहक रही, फिर कैसी यह हुड़दंग है?

जले पर नमक छिड़कती दुनिया, कैसा फीका रंग है?

शब्द-बाण से हृदय बेधकर, कहते "शुभ हो पर्व यह",

प्रतिशोध की ज्वाला मन में, होंठों पर झूठा गर्व यह।

मुख पर कटु मुस्कान सजी है, भीतर गहरा द्वेष छिपा,

दोहरे चरित्र के चोलों में, यहाँ असल इंसान लापता।

जब दिल से दिल का मेल नहीं, तो कैसी यह मिलन की बेला?

दिखावे की इस भीड़ में, हर शख्स खड़ा है अकेला।

ऋतुएँ बदलीं, अंबर बदला, बदले जग के ढंग यहाँ,

अपनों के ही चेहरों पर अब, दिखते सौ-सौ रंग यहाँ।

महँगाई की मार ने छीनी, निर्धन की थाली की रोटी,

अमीरी-गरीबी की ये खाई, नीयत कर देती छोटी।

गुणों की अब पहचान कहाँ? हैसियत की बस माया है,

इंसान की क्या बिसात भला? बस मिट्टी की एक काया है।

मिट जाना है एक दिन सबको, मुट्ठी भर बस राख शेष,

फिर क्यों पालें मन में हम, ये बैर-भाव और विषैला द्वेष?

दो दिन की है ये ज़िंदगी, हँसकर गले लगाना सीखो,

घृणा त्याग कर प्रेम-रंग में, रूह को अपनी भिगो।

सच्ची होली वही, जहाँ मन का मैल धुल जाए,

इंसानियत के गुलाल से, हर आँगन महक जाए।

सभी को शुभ होली!

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