एक बागी किसान पुत्र: मनेर से मुंबई तक का सफर !
रामायण तिवारी का जन्म सन 1917 के आसपास बिहार की राजधानी पटना के निकट स्थित मनेर के एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। किशोरावस्था तक आते-आते उनके भीतर देशभक्ति की ज्वाला धधकने लगी थी। अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों के खिलाफ वे आवाज उठाना चाहते थे, लेकिन परिवार की जिम्मेदारियों ने उन्हें कुछ समय तक खेतों तक सीमित रखा।
ट्रेन की वह घटना जिसने बदल दी किस्मत
आजाद हिंद फौज से जुड़ने के बाद, एक बार ट्रेन यात्रा के दौरान रामायण जी का विवाद एक अंग्रेज मुसाफ़िर से हो गया। आवेश में आकर उन्होंने उस अंग्रेज को चलती ट्रेन से बाहर फेंक दिया। गिरफ्तारी से बचने के लिए वे अगले स्टेशन पर उतरकर दूसरी ट्रेन में चढ़ गए। उन्हें नहीं पता था कि वह ट्रेन कहाँ जा रही है, लेकिन जब आँख खुली तो वे सपनों की नगरी बंबई (मुंबई) पहुँच चुके थे।
जब घरवालों ने समझ लिया था 'मृत'
मुंबई में शुरुआती संघर्ष के बाद उन्हें एक फिल्म स्टूडियो में काम मिला। वे दिन में नौकरी करते और रात में स्वतंत्रता आंदोलन की गतिविधियों में शामिल होते। इसी बीच, फिल्म 'मन मंदिर' की शूटिंग के दौरान एक अभिनेता के न आने पर निर्देशक की नजर उन पर पड़ी और उन्हें एक छोटा सा रोल मिला। यहीं से उनके अभिनय करियर की नींव पड़ी।
मजे की बात यह है कि लगभग 10 सालों तक उन्होंने घर पर कोई संपर्क नहीं किया। घरवालों ने उन्हें मृत मानकर उनके अंतिम संस्कार की तैयारी तक कर ली थी। लेकिन तभी गाँव का एक युवक शहर से फिल्म देखकर लौटा और चिल्लाते हुए बोला— "मैंने रामायण को बड़े परदे पर देखा है!" पूरा गाँव सिनेमाहॉल उमड़ पड़ा और जब कुछ दिनों बाद वे खुद मनेर पहुँचे, तो मानों त्यौहार जैसा माहौल हो गया।
सिनेमा जगत में 'तिवारी' का दबदबा
फिल्म जगत में उन्हें 'तिवारी' नाम से शोहरत मिली। उन्होंने लगभग पांच दशकों तक अभिनय किया और भारतीय सिनेमा की कई कालजयी फिल्मों का हिस्सा रहे।
उनकी यादगार फिल्में:
यहूदी (दिलीप कुमार के साथ)
मधुमति और दो बीघा ज़मीन (बिमल रॉय की फिल्में)
जिस देश में गंगा बहती है (राज कपूर के साथ)
नीलकमल, पत्थर के सनम, गोपी, दुश्मन, और पोस्ट बॉक्स नंबर 999।
भोजपुरी सिनेमा के भीष्म पितामह
रामायण तिवारी सिर्फ एक अभिनेता नहीं, बल्कि भोजपुरी सिनेमा के विजनरी भी थे। भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने स्वयं रामायण जी से भोजपुरी फिल्म बनाने की चर्चा की थी।
गंगा मइया तोहरे पियरी चढ़इबो: इस पहली भोजपुरी फिल्म के संगीत और रिलीज की कमान रामायण जी ने ही संभाली थी। इसकी पूरी शूटिंग उनके गाँव मनेर में हुई थी।
लागी छूटे नाही राम (1963): इस फिल्म का निर्माण उन्होंने स्वयं किया। दिलचस्प तथ्य यह है कि इस फिल्म ने बिहार के सिनेमाघरों में प्रसिद्ध फिल्म 'ताजमहल' से भी बेहतर प्रदर्शन किया था।
दिग्गजों से संबंध और विरासत
रामायण तिवारी जी का व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली था कि लोकनायक जय प्रकाश नारायण जब भी मुंबई जाते, सायन स्थित तिवारी जी के घर पर ही ठहरते थे। यहाँ तक कि शिवसेना संस्थापक बाला साहब ठाकरे की जीवनी के पृष्ठ संख्या 55 पर भी उनका विशेष उल्लेख मिलता है।
9 मार्च 1980 को इस महान कलाकार ने दुनिया को अलविदा कह दिया। उनकी विरासत को उनके पुत्र भूषण तिवारी ने आगे बढ़ाया, जो स्वयं एक प्रसिद्ध चरित्र अभिनेता बने। आज उनके पौत्र सुजीत तिवारी भोजपुरी फिल्म उद्योग के एक बड़े निर्माता और फाइनेंसर के रूप में उनके नाम को रोशन कर रहे हैं।
"रामायण तिवारी जी की कहानी हमें सिखाती है कि मिट्टी से जुड़ा इंसान अगर ठान ले, तो वह समंदर पार जाकर भी अपनी जड़ों और अपनी भाषा का परचम लहरा सकता है।"

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