बिहार: समृद्धि का अभिशाप और 'डंपिंग यार्ड' अर्थव्यवस्था!

 




बिहार की इंडस्ट्री में आज एक ऐसा बदलाव आया है, जहां प्रोडक्ट्स की बिक्री शुरू हो गई है और राज्य में केवल दूसरे उत्पादों के लिए एक 'बाज़ार' उभर कर सामने आई है। 21 साल के "सुशासन" और "डबल इंजन" के बीच की सच्चाई यह है कि बिहार से जाने वाले क्लासिक्स से मिलते-जुलते हैं और आने वाले ट्रकों से मिलते हैं।

1. कच्चे माल का निर्यातक , निर्मित माल का आयातक

बिहार की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि यहां कच्चे माल का जन्म तो होता है, लेकिन उसका "वैल्यू एडिशन" (मूल्य वृद्धि) सामने आता है।

मखाना: विश्व का 80-90% मखाना मिथिला  उपजाता है, लेकिन इसकी ब्रांडिंग और बाजार में गुजरात और महाराष्ट्र में बाजी मार ले जाते हैं।

फल एवं सब्जी: सब्जी की लीची हो या हाजीपुर का केला, बिहार कंपनी (प्रसंस्करण) के अभाव में औने-सुथरा दाम पर बेचती है, और वही फल 'जूस' या 'चिप्स' पांच गुनी कीमत पर वापस बिहार के उत्पाद में बिकते हैं।

आलू: बिहार देश के शीर्ष आलू उत्पादक राज्यों में है, फिर भी चिप्स की एक बड़ी टीम यहां नहीं लग पाई।

2. जल संसाधन के बावजूद 'आंध्र की मछली' पर शुरुआत

बिहार में 218 से अधिक नदियाँ और हज़ारों नक्षत्र में फाल चौर (जैसे कांवर और गोगाबिल झील) हैं। इसके बावजूद बिहार में लगभग 8 लाख टन मछली की मांग के कारण उत्पादन में बढ़ोतरी होती है और आंध्र प्रदेश के 'फार्मेलिन' से युक्त मछली उद्योग पर स्थिर रहता है.

आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल

अंडा/चिकन

सबसे प्रमुख राज्य

आंध्र प्रदेश और पंजाब 

'सुधा' के बावजूद कमी

अमूल और अन्य बाहरी ब्रांड 

3. 'कंजम्पशन इकोनोमी' का जाल: सुई से लेकर  लोहा डिमांड तक

बिहार आज एक डंपिंग यार्ड बन चुका है। राज्य के पास अपना कोई भी मैन्युफैक्चरिंग (विनिर्माण) आधार नहीं है।

वर्गीकरण की परिभाषा: सुई, माचिस, साबुन से लेकर कपड़े और कागज तक बाहर से दिखाई देती है।

निर्माण सामग्री: बिहार पूरी तरह से बाहरी  वस्तुओं पर निर्भर है.

इलेक्ट्रॉनिक्स: बिहार में एक पेज या स्विच बोर्ड तक नहीं बना।

4. खाली ट्रक और  कामगारों का  दर्द

अर्थशास्त्र का सरल नियम है—यदि ट्रक में भरकर माल आ रहा है और खाली जा रहा है, तो वह क्षेत्र आर्थिक रूप से दिवालिया हो गया है। बिहार से बाहर केवल दो चीजें हैं:

सस्ता श्रम (श्रम): जो दूसरे राज्य की कमाई है।

मेधा (ब्रेन ड्रेन): जो दूसरे राज्य का प्रशासन है।

21 साल की राजनीतिक स्थिरता और "सुशासन" के संस्थापक ने बिहार को औद्योगिक रूप से  अपंग बना दिया है। नीति आयोग की रिपोर्ट में बिहार स्वास्थ्य , शिक्षा और प्रति व्यक्ति आय में सबसे नीचे रहता है। जब तक बिहार "कच्चा माल पैदा करने वाले खेत" से "फैक्ट्री हब" नहीं बनेगा, तब तक हम केवल दुसरों के लाभ के साथ उपभोक्ता बने रहेंगे और हमारे युवा दूसरे राज्यों के निर्माण में अपनी हड्डियाँ गलाते रहेंगे।



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