पटना से दिल्ली तक: राजनीतिक महत्वाकांक्षा और 'जनहित की चांदमारी'!
सत्ता की चमक और जनसरोकार का धुंधलापन !नागार्जुन की यह प्रसिद्ध पंक्तियाँ उनकी सत्ता-विरोधी चेतना को दर्शाती हैं:
स्वर्ग है पार्लियामेंट,
महक रहा इत्र-सेंट,
करता है बहुमत
जनहित की चांदमारी!
बिहार की राजनीति हमेशा से भारतीय लोकतंत्र की प्रयोगशाला रही है। वर्तमान परिदृश्य में, जब किसी बड़े क्षेत्रीय नेता का मोह पटना की गलियों से हटकर दिल्ली के सत्ता गलियारों (पार्लियामेंट) की ओर बढ़ता है, तो आम जनता के मन में नागार्जुन की ये पंक्तियाँ स्वतः कौंध जाती हैं।
1. पार्लियामेंट का 'इत्र-सेंट' और आम आदमी:
कवि ने 'इत्र-सेंट' शब्द का प्रयोग सत्ता के उस ऐश्वर्य और चकाचौंध के लिए किया है जो नेताओं को आम जनता की 'पसीने वाली गंध' से दूर कर देती है। जब बिहार के नेता राष्ट्रीय राजनीति में अपनी जगह तलाशते हैं, तो अक्सर वे राज्य की बुनियादी समस्याओं—बाढ़, बेरोजगारी और शिक्षा—को पीछे छोड़ देते हैं। उनके लिए दिल्ली का 'स्वर्ग' पटना की मिट्टी से अधिक लुभावना हो जाता है।
2. बहुमत और जनहित की 'चांदमारी':
'चांदमारी' का अर्थ होता है निशाना लगाना। नागार्जुन व्यंग्य करते हैं कि लोकतंत्र में जिस 'बहुमत' को जनता की सेवा करनी चाहिए, वही बहुमत अक्सर जनता के हितों को ही अपना निशाना (Target) बना लेता है। बिहार की राजनीति में गठबंधन के बदलते स्वरूप और सत्ता के समीकरणों का खेल इसी 'चांदमारी' का आधुनिक उदाहरण है, जहाँ कुर्सी बचाने या पाने के फेर में जनमत की बलि चढ़ा दी जाती है।
3. अप्रत्यक्ष निहितार्थ:
"बेटे के लिए बाप कुछ भी कर सकता है" । बिहार की राजनीति में 'पुत्र मोह' या विरासत सौंपने की छटपटाहट नई नहीं है। नागार्जुन की कविता इस बात पर मुहर लगाती है कि जब राजनीति व्यक्तिगत लाभ और परिवार को सुरक्षित करने का साधन बन जाती है, तब संसद और विधानसभाएँ केवल विशिष्ट वर्ग के लिए 'स्वर्ग' बनकर रह जाती हैं, जबकि आम आदमी बाहर खड़ा न्याय की प्रतीक्षा करता रहता है।

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