न्यायपालिका द्वारा चुनिंदा आक्रोश!
निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है.
1. न्यायपालिका की प्रतिक्रिया और 'अति-संवेदनशीलता'
सर्वोच्च न्यायालय ने पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका की आलोचना (जैसे "न्यायिक भ्रष्टाचार" और "लंबित मामले") को लेकर ज़रूरत से ज़्यादा सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट का यह कहना कि वह न्यायपालिका की गरिमा को "धरती पर किसी को भी" ठेस नहीं पहुँचाने देगा, एक प्रकार का 'ज्यूडिशियल ओवररीच' (न्यायिक अति-प्रसार) प्रतीत होता है।
2. सरकार का रुख और पाठ्यपुस्तकों का राजनीतिकरण
सरकार द्वारा उन अधिकारियों पर कार्रवाई का आश्वासन देना जिन्होंने ये संदर्भ डाले थे, न्यायपालिका के दबाव में उठाया गया कदम है।
वर्तमान सत्ता पक्ष (भाजपा) के तहत पाठ्यपुस्तकों का पुनर्लेखन एक प्रमुख एजेंडा रहा है, जहाँ अक्सर इतिहास और सामाजिक विज्ञान को एक विशेष दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने की कोशिश की जाती है।
3. आलोचना में असंतुलन
पाठ्यपुस्तकों में सरकार और कार्यपालिका की भी तीखी आलोचना की गई है (जैसे चुनावों में भ्रष्टाचार), जिस पर कोई आपत्ति नहीं हुई।
किन्तु, जैसे ही न्यायपालिका की आलोचना की बात आई, कोर्ट ने इसे स्वयं पर हमला माना।
4. इतिहास के चित्रण पर सवाल इन पाठ्यपुस्तकों में अन्य समस्याएं भी हैं, जैसे:
मध्यकालीन हिंदू साम्राज्यों का महिमामंडन और मुस्लिम शासकों का केवल नकारात्मक चित्रण।
मुगल काल की संपन्नता और ब्रिटिश शासन के दौरान गरीबी के बीच असंतुलित तुलना।

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