आधुनिक भू-राजनीति में आर्थिक अंतर्निर्भरता का संकट!

 






पारंपरिक मान्यता रही है कि राष्ट्रों के बीच बढ़ती आर्थिक अंतर्निर्भरता युद्ध की संभावना को कम करती है। यूरोपीय संघ इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहाँ कोयले और स्टील के व्यापारिक गठबंधन ने कभी शत्रु रहे देशों को शांति के सूत्र में बांध दिया। लेकिन वर्तमान वैश्विक परिदृश्य, विशेषकर ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच बढ़ते तनाव ने इस धारणा पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।

ईरान का भू-राजनीतिक लाभ और जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz)

ईरान के विरुद्ध सैन्य कार्रवाई करते समय उसकी आर्थिक शक्ति का तो सही आकलन किया गया, लेकिन उसकी भौगोलिक स्थिति के प्रभाव को कम आंका गया।

रणनीतिक मार्ग: वैश्विक व्यापार का एक बड़ा हिस्सा, विशेषकर 84% कच्चा तेल और 83% एलएनजी (LNG) इसी मार्ग से एशिया की ओर जाता है।

प्रहार क्षमता: ईरान ने अपनी भौगोलिक निकटता और कम लागत वाले 'शाहेद-136' ड्रोन जैसी तकनीकों के माध्यम से खाड़ी देशों (GCC) के व्यापार और बुनियादी ढांचे पर दबाव बनाने की क्षमता प्रदर्शित की है।

वैश्विक अर्थव्यवस्था और एशिया पर प्रभाव

इस संघर्ष ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) को बुरी तरह प्रभावित किया है, जिसका सर्वाधिक प्रभाव एशियाई देशों पर दिख रहा है:

ऊर्जा संकट: भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे तेल आयातक देश ऊर्जा आपूर्ति में व्यवधान और महंगाई का सामना कर रहे हैं।

आसियान (ASEAN) की चुनौती: वियतनाम, थाईलैंड और फिलीपींस जैसे देशों में ऊर्जा बचत के लिए वर्क-फ्रॉम-होम और छोटे कार्य-सप्ताह जैसे कदम उठाने पड़े हैं। इनके लिए यह संघर्ष 'दोहरी मार' जैसा है क्योंकि ये देश पहले से ही 'समय पूर्व वि-औद्योगीकरण' की चुनौती झेल रहे थे।

चीन की स्थिति: चीन इस स्थिति में तुलनात्मक रूप से सुरक्षित है क्योंकि उसके पास तेल का बड़ा भंडार है, रूस से पाइपलाइन द्वारा गैस की आपूर्ति है और वह हरित ऊर्जा (EV और सोलर) का सबसे बड़ा उत्पादक है।

सुरक्षा निहितार्थ: ताइवान का उदाहरण

अमेरिका का ध्यान पश्चिम एशिया में केंद्रित होने से पूर्वी एशिया में सुरक्षा शून्य पैदा हो सकता है। ताइवान, जो दुनिया का सबसे बड़ा सेमीकंडक्टर उत्पादक है, इस ऊर्जा संकट और हीलियम की कमी (जो कतर से आती है) के कारण अत्यधिक संवेदनशील स्थिति में है। यह स्थिति क्षेत्रीय अस्थिरता को बढ़ा सकती है।

 आज की दुनिया इतनी जटिल रूप से जुड़ी हुई है कि एक स्थानीय युद्ध भी वैश्विक स्तर पर विनाशकारी आर्थिक परिणाम ला सकता है। आर्थिक अंतर्निर्भरता जो कभी शांति का साधन थी, अब संघर्ष की स्थिति में एक हथियार (Leverage) के रूप में इस्तेमाल की जा रही है।

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