व्यवस्था की चक्की में पिसती मानवीय संवेदनाएँ !

 




प्रस्तुत पंक्तियाँ केवल शब्द नहीं, बल्कि आधुनिक समाज की उस विसंगति का दस्तावेज़ हैं जहाँ 'न्याय' की अवधारणा प्रतीक्षालयों में दम तोड़ रही है। आम आदमी की मासूमियत और उसके अधिकारों की बलि चढ़ाकर खड़ा हुआ है।

 प्रतीक्षा का त्रासद अंत

एक ऐसी स्थिति जहाँ उम्मीदें धुंधली पड़ चुकी हैं। यह व्यवस्था की विफलता का प्रमाण है कि न्याय पाने की प्रक्रिया ही इतनी लंबी और बोझिल है कि व्यक्ति न्याय मिलने से पहले ही 'पथरा' (संवेदनाहीन या मृतप्राय) जाता है। 

भीड़ के पहियों तले कुचले पंख: यह लोकशाही या भीड़तंत्र की उस अराजकता को दर्शाता है जहाँ व्यक्ति की स्वतंत्रता और उसके सपने (पंख) निर्दयता से कुचल दिए जाते हैं।

व्यवस्था की चक्की" एक ऐसा रूपक है जो दर्शाता है कि नियम और कानून के पहिए इतने भारी हैं कि उनके बीच "कोमल न्याय की मानवीय संवेदनाएँ" पिसकर अपना अस्तित्व खो चुकी हैं। आज न्याय केवल प्रक्रिया (Procedure) बनकर रह गया है, जिसमें मानवीय करुणा और संवेदनशीलता के लिए कोई स्थान नहीं बचा है। 

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