भक्ति की सौम्यता बनाम शक्ति का प्रदर्शन: बदलती रामनवमी और सामाजिक सरोकार !






पटना। बिहार की राजनीति के वरिष्ठ हस्ताक्षर शिवानंद तिवारी ने रामनवमी के बदलते स्वरूप पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए समाज और प्रशासन के सामने कुछ तीखे सवाल खड़े किए हैं। 1952 से पटना की संस्कृति को करीब से देखने वाले तिवारी का मानना है कि जो पर्व कभी सादगी, खीर-पूड़ी और शांतिपूर्ण झंडा बदलने तक सीमित था, वह अब 'शक्ति प्रदर्शन' के एक आक्रामक मंच में तब्दील होता जा रहा है।

परंपरा का बदलता चेहरा: सादगी से शोर तक

तिवारी जी अपने संस्मरणों को साझा करते हुए बताते हैं कि साठ के दशक में हथियारों से लैस जुलूस केवल तत्कालीन दक्षिण बिहार (अब झारखंड) के रांची, हजारीबाग और जमशेदपुर जैसे क्षेत्रों तक सीमित थे। शेष बिहार में रामनवमी 'भक्ति' का पर्याय थी। लेकिन वर्तमान परिदृश्य पूरी तरह भिन्न है:

हथियारों का प्रदर्शन: तलवारें लहराना और मोटरसाइकिलों पर आक्रामक जुलूस अब आम हो गए हैं।

बदलती भागीदारी: उत्सवों में महिलाओं और युवतियों की संख्या तो बढ़ी है, लेकिन उनकी भागीदारी में भी वही आक्रामक तेवर दिखाई दे रहे हैं जो पहले कभी नहीं देखे गए।

तनाव और हिंसा: पर्व की मूल भावना के विपरीत, कई स्थानों पर छिटपुट हिंसा और सामाजिक विद्वेष का वातावरण बन रहा है।

राजनीतिक दिशा और वैचारिक भटकाव

लेख में सत्ता और विपक्ष की भूमिका पर भी कटाक्ष किया गया है। शिवानंद तिवारी ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पुराने स्टैंड की याद दिलाते हुए कहा कि जो कभी 'आरएसएस मुक्त देश' का नारा देते थे और मोदी के विकल्प के रूप में देखे जाते थे, आज उनकी राजनीतिक स्थिति आत्मसमर्पण जैसी है। उनके अनुसार, बिहार की वर्तमान राजनीति में इस उभरती हुई सामाजिक चुनौती को समझने और उसका मुकाबला करने की क्षमता का अभाव दिख रहा है।

"धार्मिक आस्था का सम्मान होना चाहिए, लेकिन धर्म के नाम पर सामाजिक विद्वेष पैदा करना देश के भविष्य के लिए चिंताजनक है।" — शिवानंद तिवारी 

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