युद्ध की मार और आम आदमी: भारतीय अर्थव्यवस्था पर संकट और समाधान ! -प्रो प्रसिद्ध कुमार, अर्थशास्त्र विभाग.
यह पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के कारण भारतीय उपभोक्ताओं और अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों का विश्लेषण है। कैसे एक दूरस्थ युद्ध भारत में एलपीजी (LPG), ईंधन, खाद्य सामग्री और यात्रा की कीमतों को बढ़ा रहा है। सरकार ने अब तक स्थिति को संभालने के लिए सक्रिय कदम उठाए हैं, लेकिन युद्ध लंबा खिंचने पर चुनौतियां और गंभीर हो सकती हैं।
आपूर्ति श्रृंखला में बाधा: पश्चिम एशिया विश्व के 20% पेट्रोलियम तरल पदार्थों की आपूर्ति करता है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से जहाजों के मार्ग बदलने के कारण आपूर्ति में देरी और लागत में वृद्धि हुई है।
महंगाई का दोहरा प्रहार: ईंधन और एलपीजी की बढ़ती कीमतों का सीधा असर परिवहन और खाद्य पदार्थों पर पड़ रहा है। घरेलू बजट बिगड़ने से उपभोक्ता मांग में कमी आने की संभावना है।
रुपये की कमजोरी: डॉलर के मुकाबले रुपये के कमजोर होने (94 के स्तर तक पहुँचने) से आयात, विशेषकर तेल और इलेक्ट्रॉनिक्स, और भी महंगे हो गए हैं।
क्षेत्रीय प्रभाव: पर्यटन क्षेत्र हवाई किराए बढ़ने से प्रभावित है, वहीं रेस्टोरेंट और डिलीवरी प्लेटफॉर्म्स भी कम ऑर्डर के कारण आर्थिक दबाव महसूस कर रहे हैं।
सरकारी प्रयास: सरकार ने 'अनिवार्य वस्तु अधिनियम 1955' लागू करने और एलपीजी की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने जैसे महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। हालांकि, बढ़ती सब्सिडी वित्तीय घाटे (fiscal deficit) को बढ़ा सकती है।
केवल सरकारी हस्तक्षेप पर्याप्त नहीं है। कालाबाजारी और जमाखोरी रोकने के लिए राज्यों द्वारा सख्त निगरानी, पारदर्शी संचार और उपभोक्ता जागरूकता की अत्यंत आवश्यकता है ताकि युद्ध का बोझ आम जनता की जेब पर कम से कम पड़े।

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