भारतीय अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति की चुनौतियाँ: संरचनात्मक संकट और नीतिगत दुविधा!
यह भारत की वर्तमान आर्थिक स्थिति का एक गंभीर चित्र खींचता है, जहाँ उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) की नई श्रृंखला ने नीति निर्माताओं के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। फरवरी 2026 में खुदरा मुद्रास्फीति का 3.2% के 10-माह के उच्च स्तर पर पहुँचना केवल एक सांख्यिकीय बदलाव नहीं, बल्कि गहरे संरचनात्मक संकट का संकेत है।
प्रमुख आर्थिक विश्लेषण एवं आलोचना
1. खाद्य मुद्रास्फीति और जलवायु निर्भरता
यह 36.75% के भार के साथ खाद्य और पेय पदार्थ मुद्रास्फीति के मुख्य चालक बने हुए हैं। मांस, तेल और फलों की कीमतों में वृद्धि के साथ-साथ टमाटर की कीमतों में 45% का उछाल भारतीय कृषि की आपूर्ति श्रृंखला की विफलता को दर्शाता है।
सांख्यिकीय 'बेस इफेक्ट' समाप्त होने के बाद अब वास्तविक मूल्य वृद्धि सामने आ रही है। अल नीनो के संभावित प्रभाव और मानसून की अनिश्चितता यह बताती है कि एक दशक बाद भी भारतीय कृषि 'मानसून का जुआ' बनी हुई है।
2. बाह्य झटके और इनपुट लागत
पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव ने न केवल प्राकृतिक गैस की आपूर्ति को बाधित किया है, बल्कि उर्वरक उत्पादन को भी संकट में डाल दिया है। यह सीधे तौर पर कृषि उत्पादन लागत को बढ़ाता है, जिसे 'कॉस्ट-पुश इन्फ्लेशन' कहा जाता है।
3. कीमती धातुओं का 'सेफ-हेवन' प्रभाव
सोने के आभूषणों में 48.2% और चांदी में 160% से अधिक की मुद्रास्फीति वैश्विक अनिश्चितता का परिणाम है। निवेशक अनिश्चितता के समय सुरक्षित निवेश के रूप में कीमती धातुओं की ओर भाग रहे हैं, जो घरेलू तरलता और उपभोग पैटर्न को प्रभावित कर रहा है।
मौद्रिक नीति की सीमाएँ
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की सीमित शक्ति पर प्रकाश डालता है। आमतौर पर, मांग को कम करने के लिए ब्याज दरों में वृद्धि की जाती है, लेकिन वर्तमान स्थिति में:
मुद्रास्फीति आपूर्ति पक्ष (Supply-side) की बाधाओं से प्रेरित है, न कि अत्यधिक मांग से।
ऐसे में ब्याज दरें बढ़ाना 'विकास' (Growth) को और अधिक बाधित कर सकता है, विशेषकर तब जब उद्योग पहले से ही ईंधन और एलपीजी की कमी से जूझ रहे हैं।

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