वैश्विक अर्थव्यवस्था के 'चोकपॉइंट्स': दक्षता और लचीलेपन का संघर्ष ! प्रो प्रसिद्ध कुमार, अर्थशास्त्र विभाग.

 




आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था एक जटिल जाल की तरह है, जहाँ एक छोटी सी रुकावट पूरी दुनिया की रफ़्तार थाम सकती है। हाल के वर्षों में ईरान द्वारा हॉर्मुज जलडमरूमध्य की संभावित बंदी, स्वेज नहर में जहाज का फंसना और पनामा नहर की चुनौतियां इस बात का प्रमाण हैं कि हमारी आपूर्ति श्रृंखलाएं कितनी संवेदनशील भौगोलिक बिंदुओं पर टिकी हैं।

1. एकल स्रोत की निर्भरता: एक बड़ा जोखिम

किसी भी वस्तु या सेवा के लिए केवल एक स्रोत पर निर्भर रहना 'सिंगल पॉइंट ऑफ फेलियर' (विफलता का एकल बिंदु) पैदा करता है। उदाहरण के तौर पर:

सेमीकंडक्टर: आधुनिक तकनीक के लिए अनिवार्य 'अल्ट्रा-वायलेट लिथोग्राफी' उपकरणों पर केवल एक डच कंपनी (ASML) का एकाधिकार है। वहीं, 2-नैनोमीटर चिप बनाने की क्षमता केवल सैमसंग और TSMC के पास है।

दुर्लभ मृदा तत्व (Rare Earths): चीन वैश्विक स्तर पर 60% खनन और 90% प्रसंस्करण को नियंत्रित करता है, जो इलेक्ट्रिक वाहनों और सैन्य तकनीक के लिए घातक हो सकता है।

वित्तीय प्रणाली: अमेरिका नियंत्रित 'SWIFT' प्रणाली वित्तीय लेनदेन का ऐसा ही एक केंद्र है, जिसका उपयोग राजनीतिक दबाव के लिए भी किया जा सकता है।

2. दक्षता बनाम लचीलापन (Efficiency vs. Resilience)

अर्थव्यवस्था में हमेशा से दक्षता (Efficiency) को प्राथमिकता दी गई है, क्योंकि यह लागत कम करती है। लेकिन यह मॉडल झटकों को सहने में असमर्थ है। अब दुनिया लचीलेपन (Resilience) की ओर बढ़ रही है। हालाँकि, लचीलापन हासिल करना महंगा है क्योंकि इसमें विविधता लाने और बफर स्टॉक बनाने के लिए अतिरिक्त निवेश की आवश्यकता होती है।

3. समाधान और भविष्य की राह

जब बाजार खुद को लचीला बनाने में विफल रहता है, तो सरकारों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

विविधीकरण: अमेरिका और यूरोपीय संघ अब इंटेल, सैमसंग और TSMC जैसे दिग्गजों को भौगोलिक रूप से अपनी उत्पादन इकाइयां फैलाने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं।

सहयोग: देश 'फ्रेंड-शोरिंग' (मित्र देशों के साथ व्यापार) और अंतरराष्ट्रीय गठबंधन के माध्यम से वैकल्पिक आपूर्ति श्रृंखलाएं विकसित कर रहे हैं।


वैश्विक व्यापार के इन 'चोकपॉइंट्स' को कम करना कोई सस्ता विकल्प नहीं है। बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और विखंडन के इस दौर में, सुरक्षा और स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए उच्च लागत चुकाना अब अनिवार्य हो गया है। भविष्य की अर्थव्यवस्था वही होगी जो केवल कुशल न हो, बल्कि संकटों को झेलने में सक्षम हो। 

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