देश में विजनहीन कृषि नीति ! ठगा सा रह गये किसान!
1. विजनहीन कृषि नीति
अभी कृषि नीति में 'स्पष्ट लक्ष्यों' का अभाव है।
यह संकेत देता है कि सरकारें योजनाएं तो बनाती हैं, लेकिन उनका उद्देश्य किसानों की आय बढ़ाना है या केवल आंकड़ों का खेल, यह स्पष्ट नहीं हो पाता।
बिना ठोस लक्ष्य के कोई भी नीति केवल कागजी खानापूर्ति बनकर रह जाती है।
2. उचित मूल्य और सरकारी खरीद की विफलता
है. जिन फसलों की खरीद केंद्रीय एजेंसियां (जैसे FCI आदि) करती हैं, वहां किसानों को वाजिब दाम (Fair Price) मिलना सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
वास्तविकता यह है कि बिचौलियों और जटिल प्रक्रियाओं के कारण किसान अक्सर न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के लाभ से वंचित रह जाता है।
3. भंडारण (Warehousing) का गंभीर संकट
भंडारण क्षमता का अभाव: किसानों के पास फसल रखने की जगह नहीं है।
पुराना स्टॉक: गोदामों में पहले से ही खाद्य वितरण के लिए अनाज भरा पड़ा है।
कुप्रबंधन: पिछले सत्र (Session) के अनाज का सही उपयोग नहीं हो पाया और नई फसल आ गई।
भारत में समस्या 'उत्पादन' की नहीं, बल्कि 'प्रबंधन' और 'रखरखाव' की है। जब तक पुराने अनाज के निपटान और नए अनाज के भंडारण के लिए ठोस नीति नहीं बनेगी, तब तक किसान अपनी मेहनत को सड़कों पर फेंकने या औने-पौने दाम पर बेचने को मजबूर रहेगा।

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