NavIC प्रणाली: वर्तमान संकट!


 




भारतीय क्षेत्रीय नेविगेशन उपग्रह प्रणाली (NavIC) वर्तमान में 'परिचालन संकट' (Operational Distress) से गुजर रही है। 2013 से अब तक 11 उपग्रह लॉन्च किए जाने के बावजूद, केवल तीन उपग्रह ही स्थिति, नेविगेशन और समय (PNT) सेवाएं प्रदान करने में सक्षम बचे हैं। उल्लेखनीय है कि इस प्रणाली के प्रभावी संचालन के लिए कम से कम चार उपग्रहों का सक्रिय होना अनिवार्य है।

प्रमुख तकनीकी और संरचनात्मक विफलताएँ

परमाणु घड़ियों की विफलता: शुरुआती उपग्रहों में लगी स्विस निर्मित रूबिडियम परमाणु घड़ियाँ लगातार खराब होती रहीं। हाल ही में IRNSS-1F की घड़ी विफल होने से संकट और गहरा गया है।

लॉन्च विफलताएं: दूसरी पीढ़ी के उपग्रह NVS-02 का प्रक्षेपण विफल रहा क्योंकि उसे गलत कक्षा में स्थापित कर दिया गया था।

संसाधनों का अभाव: इसरो पर वर्तमान में मानव अंतरिक्ष मिशन (गगनयान), नए रॉकेटों के अनुसंधान और कई पृथ्वी-अवलोकन उपग्रहों का भारी बोझ है, जिससे NavIC के लिए आवश्यक लॉन्च दर प्रभावित हुई है।

नीतिगत और संस्थागत चुनौतियां

कानूनी ढांचे की कमी: भारत में अभी तक एक राष्ट्रीय अंतरिक्ष कानून का अभाव है। इसरो वर्तमान में डिजाइनर और ऑपरेटर दोनों की भूमिका निभा रहा है, जिससे एजेंसी पर अत्यधिक दबाव है।

स्वतंत्र प्रबंधन इकाई की कमी: अमेरिका के 'जीपीएस निदेशालय' की तरह भारत में नेविगेशन प्रणालियों के प्रबंधन के लिए कोई समर्पित स्वतंत्र संस्था नहीं है।

भविष्य की राह और समाधान

इसरो ने अब स्वदेशी रूबिडियम घड़ियों का उपयोग शुरू किया है (NVS-01 से शुरू) और प्रत्येक उपग्रह में घड़ियों की संख्या तीन से बढ़ाकर पांच करने का प्रस्ताव दिया है। साथ ही, बेहतर इंटरऑपरेबिलिटी (Interoperability) के लिए L1 बैंड के समर्थन पर भी जोर दिया जा रहा है। 

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