चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में पर्दादारी ठीक नहीं ! सुप्रीम कोर्ट नियुक्ति पर हस्तक्षेप करे।

    


 जिनके कंधों पर देश की चुनाव करवाने की जिम्मेवारी है और अगर उसकी नियुक्ति जल्दबाजी में पर्दादारी हो तो यह लोकतंत्र की सफलता के लिए अच्छा संकेत नहीं है।  इस बार भी दो चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर विपक्ष के नेता अधीर रंजन चौधरी ने सवाल उठाए और आरोप लगाया कि सिर्फ एक रात पहले उन्हें दो सौ बारह नामों की सूची दी गई। फिर इससे संबंधित बैठक शुरू होने के महज दस मिनट पहले सरकार की ओर से उनके पास छह नाम भेजे गए; इतने कम समय में सूचीबद्ध किए गए लोगों की ईमानदारी और तजुर्बे की जांच करना असंभव है। उन्होंने इस प्रक्रिया का विरोध करते हुए समिति में प्रधान न्यायाधीश को भी रखने की बात कही।

अगर विपक्ष के नेता का आरोप सही है तो इसका मतलब यह है कि सरकार की ओर से शायद चुने गए नामों को लेकर आखिरी समय तक भ्रम की स्थिति बनाए रखने की कोशिश हुई। सवाल है कि देश में लोकतंत्र को जमीन पर उतारने का बड़ा दायित्व संभालने वाली जिस संस्था का गठन पूरी तरह पारदर्शी होना चाहिए, उसे लेकर किसी भी स्तर पर पर्दादारी क्यों बरती जाती है! चुनाव आयुक्त की नियुक्ति को लेकर पहले भी सरकार की मंशा पर सवाल उठे हैं। जरूरत इस बात की है कि आयुक्तों के नामों को सूचीबद्ध करने, उनके चयन से लेकर नियुक्ति तक के मामले में समूची प्रक्रिया सरकार पारदर्शी तरीके से पूरी कराए।चुनाव आयोग एक निष्पक्ष संवैधानिक संस्था है और इस पर पक्ष, विपक्ष तथा देश की जनता आँख बंद कर भरोसा करते हैं।इस मामले में सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करने की जरूरत है।


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