आपदा राहत का गणित: क्या हम लोगों की गिनती कर रहे हैं या जोखिम की?
यह भारत के 16वें वित्त आयोग द्वारा राज्यों को दिए जाने वाले आपदा राहत कोष (SDRF) के नए फॉर्मूले पर एक गंभीर सवाल उठाता है। इसका मुख्य तर्क है कि आपदा राहत के लिए केवल 'जनसंख्या' को आधार बनाना वैज्ञानिक और नैतिक रूप से गलत है।
प्रमुख विसंगतियां:
जनसंख्या बनाम जोखिम: वर्तमान फॉर्मूला 'Exposure' (जोखिम के दायरे) को राज्य की कुल जनसंख्या से मापता है। इसका मतलब है कि यदि किसी बड़े राज्य में आपदा का खतरा कम भी है, तो भी उसे केवल अधिक आबादी के कारण ज्यादा फंड मिलेगा। इसके विपरीत, ओडिशा जैसे राज्य, जो बार-बार चक्रवात झेलते हैं, अपनी कम आबादी के कारण पिछड़ रहे हैं।
आय का गलत पैमाना: फॉर्मूले में राज्यों की 'सुभेद्यता' (Vulnerability) को प्रति व्यक्ति आय से जोड़ा गया है। इससे केरल जैसे विकसित राज्य नुकसान में रहते हैं, क्योंकि उनकी बेहतर आर्थिक स्थिति को उनकी भौगोलिक चुनौतियों (बाढ़ और भूस्खलन) से ऊपर रख दिया जाता है।
वैज्ञानिक आधार की कमी: संयुक्त राष्ट्र (IPCC) के अनुसार, जोखिम वह है जो खतरनाक इलाकों (जैसे समुद्र तट या बाढ़ क्षेत्र) में रहने वाले लोगों पर निर्भर करे, न कि पूरे राज्य की आबादी पर।
समाधान की राह:
यह सुझाव है कि भारत को 'सेंसस ब्लॉक' और 'वल्नरेबिलिटी एटलस' के आंकड़ों का मिलान करना चाहिए। हमें यह देखना होगा कि कितने कच्चे घर आपदा प्रभावित क्षेत्रों में हैं और वहां स्वास्थ्य सुविधाएं कैसी हैं। जब तक हम 'सिरों की गिनती' (Headcount) छोड़कर वास्तविक जोखिम को नहीं मापेंगे, तब तक जलवायु परिवर्तन से लड़ रहे राज्यों को न्याय नहीं मिल पाएगा।

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