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Showing posts from April, 2026

आशुतोष का परिणय और सादगी का संकल्प!

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    ​प्रो. प्रसिद्ध कुमार ​जीवन के कुछ अध्याय हृदय पर गहरी छाप छोड़ जाते हैं, और मेरे कनिष्ठ पुत्र इंजीनियर आशुतोष कुमार का विवाह संस्कार मेरे लिए कुछ वैसा ही अनुभव रहा। आर्यभट्ट की ऐतिहासिक नगरी, खगौल में सजी बारात से लेकर विदाई तक का यह सफर केवल एक पारिवारिक आयोजन नहीं, बल्कि स्नेह, सद्भाव और एक नए सामाजिक दृष्टिकोण के उदय का साक्षी बना। ​प्रकृति की परीक्षा और आत्मीयता का संबल ​28 अप्रैल 2026 की वह पावन तिथि, जब आशुतोष के नए जीवन की शुरुआत हुई। उत्सव की मिठास अभी फिजाओं में घुली ही थी कि अगले दिन, 29 अप्रैल को प्रकृति ने अपनी चपलता दिखाई। अचानक आई आंधी और बारिश ने मानों व्यवस्थाओं को चुनौती दी, लेकिन आप सभी के अटूट प्रेम और धैर्य के आगे मौसम की वह तल्खी भी फीकी पड़ गई। ​कृतज्ञता का अर्पण: जब 'स्व' बना 'सर्व' ​एक पिता के विनम्र निमंत्रण को मान देकर, इस मांगलिक बेला में शामिल हुए तमाम आगंतुकों का मैं ऋणी हूँ। मेरे 'कॉलेज परिवार' की उपस्थिति ने इस अवसर को गरिमा के शिखर पर पहुँचा दिया। ​आदरणीय प्राचार्य प्रो. सुरेंद्र प्रसाद जी का सानिध्य, ​वरीय प्राध्यापक प्रो. राम...

अनुज का स्नेह-स्पर्श: जहाँ मर्यादा ही प्रेम की परिभाषा है!

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   ​सम्बन्धों के मरूस्थल में कभी-कभी आत्मीयता की ऐसी फुहारें पड़ती हैं कि हृदय का कोना-कोना तृप्त हो जाता है। आज अपने अनुज छबिला को देखकर मन इसी संतोष से भर उठा है। वह केवल मेरा छोटा भाई नहीं, मेरे लिए 'भरत' जैसा सहोदर है, जिसके भीतर आज के आधुनिक युग में भी त्रेतायुगीन मर्यादाएँ जीवित हैं। ​मर्यादा, जो डर नहीं... लिहाज है ​छबिला जेल पुलिस में हवलदार है—एक ऐसा पद जहाँ अनुशासन और कड़ाई उसकी दिनचर्या का हिस्सा है। पर घर की दहलीज लांघते ही वह वही छोटा 'छबिला' बन जाता है। ताज्जुब होता है देखकर कि आज भी वह मेरे सामने सीधे आँखें उठाकर बात नहीं करता। यह डर नहीं है, यह वह 'लिहाज' है जो हमारी संस्कृति की जड़ों को सींचता है। वह जानता है कि बड़ा भाई पिता का प्रतिरूप होता है, और उसी आदर की ओट में वह अपनी आत्मीयता ढूँढता है। ​एक जादुई स्पर्श: जब थकान ने घुटने टेक दिए ​विवाह की व्यस्तताओं और भागदौड़ ने देह को शिथिल कर दिया था। थकान हड्डियों तक महसूस हो रही थी। तभी अनुज आया और किसी कुशल पेशेवर की भाँति मेरे पैर दबाने लगा, मालिश करने लगा। उसके हाथों में जैसे कोई जादुई मरहम था। एक घंट...

​हंगरी का चुनाव: लोकतंत्र की वापसी और तानाशाही का अंत!

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    ​यह  हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ओर्बन की 16 साल पुरानी सत्ता के पतन और उनके उत्तराधिकारी पीटर मग्यार की जीत का विश्लेषण है। यह चुनाव न केवल हंगरी के लिए, बल्कि वैश्विक लोकतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण सबक है।  ​चुनावी निरंकुशता का अंत: हंगरी के मतदाताओं ने इस भ्रम को तोड़ दिया है कि 'अनुदार लोकतंत्र' (Illiberal Democracy) को चुनाव के जरिए नहीं हटाया जा सकता। यह जीत उन देशों के लिए एक मिसाल है जहाँ सत्ता को अजेय मान लिया जाता है। ​लोकतांत्रिक लचीलापन: यह परिणाम उन दावों को खारिज करता है कि उदार लोकतंत्र अब अप्रासंगिक हो गया है। जनता ने साबित किया है कि बहुमत के आधार पर तानाशाही थोपने वाले शासन के खिलाफ बदलाव की इच्छा एक स्वाभाविक मानवीय प्रेरणा है। ​यूक्रेन युद्ध का प्रभाव: ओर्बन ने चुनाव को अपने और जेलेंस्की के बीच के मुकाबले के रूप में पेश किया था। मतदाताओं ने ओर्बन के 'रूसी समर्थक' रुख और आर्थिक संकट के लिए यूक्रेन की मदद को दोष देने वाली थ्योरी को नकार दिया। ​भ्रष्टाचार और विदेशी प्रभाव:  जनता ने ओर्बन के 'क्रोनी कैपिटलिज्म' (सांठगांठ वाली पूंजीवाद) और रूस...

"मूर्खता का महोत्सव" - (कविता) - प्रो प्रसिद्ध कुमार.

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  ​चढ़ा दो थाली, लुटा दो माल, यहाँ अक्ल की विदाई है, बगल में दबाए ढोंग की पोटली, पाखंडियों की तो अब कमाई है। ​समय की होली घंटों कतार में खड़े रहो, पत्थर को अपना 'कल' सौंप दो, जो वक्त बदलना था खुद को तराश कर, उसे बाबा के चरणों में झोंक दो। फुर्सत कहाँ है तुम्हें तरक्की सोचने की, अभी तो शनि और राहु को टोकना है, जिंदगी की दौड़ में पीछे रह गए, पर बिल्ली का रास्ता अभी रोकना है। ​धन का विसर्जन जेब खाली है, घर में तंगी है, पर चंदे की रसीद कटानी है, दवा के पैसे बाबा को दे दिए, अब भभूत से बीमारी भगानी है। सोना चढ़ाया उस मूरत पर, जिसने कभी भूख नहीं देखी, और पड़ोसी भूखा सो गया— पर तुम्हारी भक्ति तो बड़ी 'नेकी' है! ​बुद्धि का दीवाला पढ़े-लिखे गधे घूम रहे हैं, डिग्री को ताबीज बना कर, तर्क को खूंटी पर टांग दिया, अंधविश्वास का सुरमा लगा कर। ईश्वर भी सोचता होगा ऊपर बैठकर, कि मैंने तो 'इंसान' बनाया था, पर इसने तो डर और पाखंड के बीच, खुद का ही 'दिवाला' निकाला था। 

"मृतक भोज': सामाजिक पाखंड और विवशता का जीवंत दस्तावेज़

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  झूठी सामाजिक प्रतिष्ठा!  ​1. कथानक और विषय-वस्तु ​प्रेमचंद ने इस कहानी के माध्यम से समाज में व्याप्त उस कुप्रथा को उजागर किया है जहाँ परिवार के सदस्य की मृत्यु के शोक के बीच भी व्यक्ति को समाज (बिरादरी) को भोजन कराने के लिए मजबूर किया जाता है। कहानी का मुख्य पात्र, जो पहले से ही दरिद्रता और अपनों को खोने के गम से जूझ रहा है, समाज के तथाकथित ठेकेदारों के दबाव में आकर कर्ज लेने को विवश हो जाता है। ​2. सामाजिक विडंबना का चित्रण ​प्रेमचंद दिखाते हैं कि किस तरह 'धर्म' के नाम पर शोषण का चक्र चलता है। बिरादरी के लोग सहानुभूति दिखाने के बजाय इस बात पर अधिक ध्यान देते हैं कि भोजन में घी कितना है और पकवान क्या-क्या बने हैं। यह कहानी यह सवाल उठाती है कि: ​क्या किसी की मृत्यु पर किया जाने वाला आडंबरपूर्ण भोज वाकई मृतक की आत्मा को शांति देता है? ​या यह केवल जीवितों के अहंकार और समाज के डर का परिणाम है? ​3. पात्र चित्रण ​कहानी के पात्र अत्यंत सजीव हैं। एक तरफ वह लाचार व्यक्ति है जो लोक-लाज के भय से तिल-तिल मर रहा है, और दूसरी तरफ वे लालची पुरोहित और स्वार्थी बिरादरी के लोग हैं जो ...

प्रदर्शन की राजनीति: आधुनिक पार्टियों का बदलता स्वरूप !

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    आधुनिक पार्टियाँ अब आनंद और गर्मजोशी का माध्यम न रहकर केवल प्रदर्शन और सामाजिक हैसियत का जरिया बन गई हैं। जहाँ पहले पार्टियाँ बौद्धिक विमर्श और वास्तविक संबंधों का केंद्र होती थीं, वहीं अब वे एक व्यवसाय या 'कंटेंट' निर्माण का केंद्र बन चुकी हैं।  जहाँ अलग-अलग क्षेत्रों के दिग्गज केवल एक-दूसरे के साथ समय बिताने और चर्चा करने आते थे। वहाँ मेजबान का व्यक्तित्व और आत्मीयता मुख्य आकर्षण होती थी। आज की पार्टियों को सोशल मीडिया के हिसाब से डिजाइन किया जाता है। मेहमान अब केवल एक 'प्रॉप' की तरह होते हैं, जिनका उद्देश्य केवल तस्वीरों के माध्यम से एक भव्य छवि पेश करना होता है। इसे "सिंबल ओवर एक्सपीरियंस" (अनुभव से ऊपर प्रतीक) कह सकते  हैं।  भारत  में गहरी आर्थिक असमानता  है। जहाँ एक ओर सुपर-रिच वर्ग अपनी शादियों और पार्टियों में करोड़ों खर्च कर रहा है, वहीं दूसरी ओर आंकड़े बताते हैं कि देश का एक बड़ा किसान वर्ग ऋण और गरीबी के कारण आत्महत्या करने को मजबूर है। बड़े आयोजनों के लिए सड़कों को बंद करना और आम जनता को परेशान करना एक प्रकार के "आधुनिक साम्राज्यवा...

'कोटा के भीतर कोटा' की मांग: क्या यही बना महिला आरक्षण बिल के गिरने का मुख्य कारण?

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   ​भारतीय राजनीति के इतिहास में महिला आरक्षण बिल एक बार फिर से सुर्खियों में है। हालिया विधायी कार्यवाही के दौरान सदन में हुई वोटिंग के परिणाम ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। हालाँकि बिल के पक्ष में 278 वोट पड़े, लेकिन दो-तिहाई बहुमत की कमी और विशेषकर "कोटा के भीतर कोटा" की मांग पर असहमति ने इस महत्वपूर्ण विधेयक की राह रोक दी। ​क्या है 'कोटा के भीतर कोटा' का विवाद? ​महिला आरक्षण बिल का मूल प्रस्ताव लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% सीटें आरक्षित करने का है। लेकिन, विपक्षी दलों और सामाजिक न्याय के पैरोकारों की यह प्रमुख मांग रही है कि इस 33% आरक्षण के भीतर ही: ​अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की महिलाओं के लिए अलग से कोटा सुनिश्चित किया जाए। ​अल्पसंख्यक (Minority) समुदायों की महिलाओं को प्रतिनिधित्व मिले। ​तर्क यह दिया जा रहा है कि बिना इस उप-वर्गीकरण (Sub-categorization) के, आरक्षण का लाभ केवल उच्च वर्ग या साधन संपन्न महिलाओं तक ही सीमित रह जाएगा, और पिछड़े वर्गों की महिलाएं मुख्यधारा से कटी रहेंगी। ​संसद में गतिरोध के प्रमुख बिंदु ​सामाजिक न्याय बनाम लैंगिक समान...

भारत-चीन ऊर्जा सहयोग: कूटनीति से परे एक व्यावहारिक दृष्टिकोण!

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   ​यह  भारत और चीन के बीच के तनावपूर्ण कूटनीतिक और विनिर्माण संबंधों के विपरीत, ऊर्जा क्षेत्र में उनके सफल और दीर्घकालिक सहयोग का विश्लेषण है।  दोनों देशों को अपने आर्थिक विकास और ऊर्जा सुरक्षा के लिए आपसी "साझा भेद्यता" (Shared Vulnerability) को आधार बनाकर हाथ मिलाना चाहिए। ​राजनीतिक बनाम व्यापारिक यथार्थ: जहाँ एक ओर विनिर्माण और सीमा विवाद को लेकर दोनों देशों में तनाव है (जैसे 'प्रेस नोट 3' और बीवाईडी (BYD) के निवेश प्रस्ताव का खारिज होना), वहीं दूसरी ओर ऊर्जा क्षेत्र में एक अलग ही कहानी दिखती है। ​सूडान का सफल मॉडल: यह  'ग्रेटर नाइल पेट्रोलियम ऑपरेटिंग कंपनी' (GNPOC) का उदाहरण  हैं। दक्षिण सूडान में भारत की ONGC विदेश और चीन की CNPC पिछले दो दशकों से गृहयुद्ध, तख्तापलट और वित्तीय संकट के बावजूद एक साथ काम कर रही हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि व्यावसायिक हित कठिन परिस्थितियों में भी टिके रह सकते हैं। ​वैश्विक भू-राजनीति और दबाव: पश्चिम एशिया में युद्ध और अमेरिकी प्रतिबंधों (ईरान और रूस पर) ने भारत और चीन दोनों के लिए चुनौतियाँ पैदा की हैं। दोनों देशों के...

भारतीय रक्षा बजट और रणनीति: आधुनिकीकरण की चुनौतियाँ!

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    यह भारत की रक्षा तैयारियों, बजटीय आवंटन और रणनीतिक योजना के अंतर्विरोधों का विश्लेषण  है।  भारत को केवल अधिक खर्च करने की नहीं, बल्कि सही दिशा में खर्च करने की आवश्यकता है।  ​रणनीतिक तालमेल का अभाव: भारतीय रक्षा नीति वर्तमान में 'साइलो'  में काम कर रही है। सेना के तीनों अंगों (थल, जल और नभ) के बीच एक एकीकृत 'थिएटर कमान' का अभाव है। इससे संसाधन बिखरे हुए हैं और योजनाएँ 20वीं सदी के युद्धों की धारणा पर आधारित लगती हैं, न कि आधुनिक युद्धों पर। ​आयात पर अत्यधिक निर्भरता: भारत का अधिकांश रक्षा पूंजीगत व्यय (Capex) विदेशी हथियारों और प्लेटफॉर्म्स (जैसे राफेल जेट, जर्मन पनडुब्बियां) पर खर्च होता है। यह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक 'टैक्स' की तरह है, क्योंकि इससे घरेलू रक्षा उद्योगों या अर्थव्यवस्था को वह 'मल्टीप्लायर इफेक्ट' नहीं मिलता जो अमेरिका या चीन जैसे देशों को मिलता है। ​घरेलू अनुसंधान (R&D) की उपेक्षा: विदेशी प्लेटफॉर्म्स को खरीदने और उनके रखरखाव में इतना पैसा खर्च हो जाता है कि भविष्य की तकनीकों जैसे AI, क्वांटम कंप्यूटिंग और साइबर ऑपरेशंस क...

प्रवासी श्रमिक: नीतिगत वादे और कड़वी जमीनी हकीकत!

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   कोविड-19 लॉकडाउन के छह साल बाद भी भारत में प्रवासी श्रमिकों की दयनीय स्थिति  है।  ​असंतोष की वापसी: गुड़गांव और नोएडा जैसे औद्योगिक केंद्रों में श्रमिकों का हालिया विरोध प्रदर्शन यह दर्शाता है कि उनकी स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हुआ है। न्यूनतम मजदूरी में ठहराव, काम के खराब हालात और बढ़ती महंगाई (विशेषकर पश्चिम एशिया युद्ध के कारण एलपीजी की कीमतों में उछाल) इस असंतोष के मुख्य कारण हैं। ​प्रशासनिक देरी: हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में न्यूनतम मजदूरी का संशोधन लगभग एक दशक की देरी से किया गया है, जो बढ़ती जीवन लागत के सामने अपर्याप्त है। ​डिजिटल पंजीकरण बनाम आर्थिक सुरक्षा: 'ई-श्रम पोर्टल'  के माध्यम से 31.4 करोड़ से अधिक श्रमिकों का पंजीकरण तो हुआ है, लेकिन डेटा बताता है कि 94% श्रमिक प्रति माह ₹10,000 से कम कमाते हैं। इनमें से अधिकांश अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) समुदायों से हैं, जिनके लिए शहरी क्षेत्रों में गरिमापूर्ण जीवन और वित्तीय सुरक्षा अभी भी एक सपना है। ​विफल योजनाएं: 'अफोर्डेबल रेंटल हाउसिंग कॉम्प्लेक्स' (ARHC) जैसी आवास योजनाएं औ...

बिहार के वित्त रहित शिक्षकों की जगी उम्मीद: मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से प्रतिनिधिमंडल की खास मुलाकात!

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    ​पटना, 16 अप्रैल 2026 ​बिहार के शिक्षा जगत और वित्त रहित शिक्षकों के भविष्य के लिए आज का दिन बेहद महत्वपूर्ण रहा। 'वित्त रहित शिक्षक-शिक्षकेतर कर्मचारी संयुक्त संघर्ष मोर्चा' के एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने आज बिहार के माननीय मुख्यमंत्री श्री सम्राट चौधरी जी से उनके आवास पर मुलाकात की। ​यह मुलाकात न केवल शिष्टाचार भेंट थी, बल्कि उन हजारों शिक्षकों की आवाज को सत्ता के शीर्ष तक पहुँचाने का एक प्रयास भी थी जो लंबे समय से अपनी मांगों को लेकर संघर्ष कर रहे हैं। ​🤝 शिष्टाचार भेंट और बधाई का सिलसिला ​प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों ने मुख्यमंत्री जी को पुष्पगुच्छ भेंट कर अपनी शुभकामनाएं दीं। इस दौरान माहौल काफी सकारात्मक रहा। मुलाकात में मुख्य रूप से मोर्चा के अध्यक्ष मंडल के सदस्य शामिल थे: ​श्री रामविनेश्वर सिंह ​श्री जय नारायण सिंह मधु ​श्री शम्भू कुमार सिंह ​राजेन्द्र कुमार बनफुल ​विजय कुमार सिंह ​📋 समस्याओं के समाधान पर हुई चर्चा ​बधाई देने के साथ-साथ, प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री जी का ध्यान वित्त रहित अनुदानित शिक्षकों एवं कर्मचारियों की गंभीर समस्याओं की ओर आकर्षित किया। बैठ...

​महंगाई की मार: सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच पिसता आम आदमी !

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    ​यह एक विडंबना ही है कि जब भी सरकारी आंकड़े जारी होते हैं, वे अक्सर 'नियंत्रण' और 'संतुलन' का गुलाबी चित्र पेश करते हैं, लेकिन बाजार जाते ही आम आदमी की जेब का खालीपन एक अलग ही कहानी बयां करता है। हालिया आंकड़ों ने एक बार फिर विकास के दावों की कलई खोल दी है। ​आंकड़ों का मायाजाल बनाम वास्तविकता ​सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, खुदरा महंगाई दर मार्च में बढ़कर 3.4% हो गई है, जो फरवरी में 3.2% थी। हालांकि सरकार इसे रिजर्व बैंक के 4% के औसत अनुमान से नीचे बताकर अपनी पीठ थपथपा सकती है, लेकिन विश्लेषण के कुछ गहरे बिंदु चिंताजनक हैं: ​ग्रामीण बनाम शहरी खाई: शहरी इलाकों में महंगाई दर 3.11% है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह 3.63% तक जा पहुँची है। यह आंकड़ा डराने वाला है क्योंकि ग्रामीण भारत में आय के साधन सीमित हैं और वहां की आबादी पहले से ही आर्थिक दबाव में है। ​दैनिक उपयोग की वस्तुओं में उछाल: भले ही आलू-प्याज की कीमतों में कुछ कमी आई हो, लेकिन टमाटर, फूलगोभी, नारियल और सोने-चांदी की कीमतों में भारी बढ़ोत्तरी हुई है। बिजली, गैस और ईंधन श्रेणी में भी वृद्धि दर्ज की गई है, जिसका सीधा...

भारत में चिकित्साकरण (Medicalisation) का बढ़ता जाल!

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    ​यह  भारत में बढ़ती मोटापे की समस्या और उसके समाधान के रूप में उभरे 'फार्मास्युटिकल बाज़ार' के अंतर्संबंधों पर तीखा प्रहार है।  कैसे स्वास्थ्य अब जीवनशैली के बजाय दवाइयों और व्यावसायिक हितों के इर्द-गिर्द सिमटता जा रहा है। ​कॉर्पोरेट निर्णय और बाज़ार का मेल: एयर इंडिया द्वारा अधिक BMI वाले चालक दल को हटाने का निर्णय और उसी समय बाज़ार में सस्ती 'एंटी-ओबेसिटी' दवाओं (जैसे सेमाग्लूटाइड) का आना मात्र संयोग नहीं, बल्कि एक गहरे व्यावसायिक संकेत की ओर इशारा करता है। ​दवाओं का आक्रामक विपणन: प्रत्यक्ष विज्ञापन पर प्रतिबंध के बावजूद, फार्मा कंपनियाँ 'जन जागरूकता' और 'सरोगेट एडवरटाइजिंग' के जरिए आम जनता के मानस को प्रभावित कर रही हैं। चिकित्सा दिशा-निर्देशों में इन दवाओं का तेजी से शामिल होना वैज्ञानिक साक्ष्यों से ज्यादा व्यावसायिक दबाव का परिणाम नजर आता है। ​दुष्प्रभावों का नया चक्र: यह  'सार्कोपेनिया' (मांसपेशियों की हानि) जैसे गंभीर दुष्प्रभावों की ओर ध्यान आकर्षित  है। विडंबना यह है कि अब इन दवाओं से होने वाले नुकसान को ठीक करने के लिए नई दवाएँ विक...

लालू युग का तीसरा चरण शुरू ! त्रिवेणी संघ के तीसरे हिस्से को मिली बिहार की सत्ता ! --- वीरेंद्र यादव, वरिष्ठ पत्रकार, पटना ---

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   (तस्वीर में एक घटना में सम्राट चौधरी के साथ प्रसिद्ध यादव)  बिहार के लालू प्रसाद यादव। सवर्ण जातियों के लिए भय और दहशत का पर्याय। नीतीश कुमार लालू की हस्ती मिटाने की कोशिश करते-करते खुद मिट गये। मिट्टी में मिलने की उनकी इच्छा भी, कोईरी सम्राट चौधरी ने पूरी कर दी। लालू यादव सवर्णों की साजिश के बावजूद दरख्त की तरह लहलहा रहे हैं। आज भाजपा ने सम्राट चौधरी को बिहार की सत्ता सौंपी है तो उसकी जड़ में भी लालू यादव की ताकत है, लालू यादव का आधार है। लालू यादव के सामाजिक पावर हाउस के प्रकाश से ही पहले कुर्मी नीतीश भकभका रहे थे और अब कोईरी सम्राट भकभकायेंगे। सवर्णों की किस्मत में अभी अंधेरे का साया ही लिखा है।  14 अप्रैल यानी संविधान निर्माता डाॅ भीमराव अंबेदकर की जयंती के मौके पर लालू युग के तीसरे चरण शुरुआत हुई है। बिहार में त्रिवेणी संघ तीन जातियों का संगठन था। इसमें यादव, कुर्मी और कोईरी एक साथ मिलकर सवर्णों और सामंतों के खिलाफ लड़ रहे थे। त्रिवेणी संघ का सबसे मजबूत धड़ा यादव बिहार में 15 वर्षों तक राज किया। दूसरा धड़ा कुर्मी 20 वर्षों तक राज किया और अब तीसरे हिस्से कोईरी राज...

न्यायपालिका में आर्थिक विशेषज्ञता: समय की मांग!

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    ​आर्थिक साक्षरता (Economic Literacy)  जरूरी है. ​हाल के वर्षों में भारत के कानूनी परिदृश्य में दिवाला और दिवालियापन संहिता (IBC) जैसे आर्थिक कानूनों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आर्थिक कानून केवल कानूनी दस्तावेज नहीं हैं, बल्कि वे बाजार की बुनियादी संरचना (Infrastructure) हैं। इसलिए, अदालतों द्वारा इनका निर्वाचन करते समय केवल कानूनी बारीकियों को ही नहीं, बल्कि उनके आर्थिक प्रभावों को भी समझना अनिवार्य है। ​मुख्य बिंदु एवं विश्लेषण ​1. न्यायिक व्याख्या बनाम वैधानिक मंशा  कैसे न्यायपालिका के कुछ निर्णयों ने IBC की मूल संरचना को अस्थिर किया था। उदाहरण के तौर पर, विदर्भ इंडस्ट्रीज मामले में 'मई' (may) शब्द की व्याख्या ने ऋण और चूक के वस्तुनिष्ठ परीक्षण को एक विवेकाधीन जांच में बदल दिया था, जिससे प्रक्रिया में देरी होने लगी। हालांकि, बाद के फैसलों ने इसे सुधारते हुए पुनः स्थापित किया कि चूक सिद्ध होने पर प्रक्रिया अनिवार्य होनी चाहिए। ​2. समय का आर्थिक मूल्य ​आर्थिक संकट में फंसी कंपनियों के लिए समय सबसे बड़ा कारक है। ​देरी से कंपनी की परिसंपत्ति के मूल्य (Asset Va...

रुपया: केवल मुद्रा नहीं, साख का पैमाना!

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  मुद्रा का अवमूल्यन (Depreciation) हमेशा निर्यात के लिए फायदेमंद नहीं होता, बल्कि यह देश की आर्थिक साख और स्थिरता के लिए एक गंभीर चुनौती भी बन सकता है। अवमूल्यन का मिथक: सामान्यतः माना जाता है कि कमजोर मुद्रा निर्यात को बढ़ावा देती है, लेकिन यह एक "फाउस्टियन सौदा" (महंगा सौदा)  हैं। मुद्रा में निरंतर गिरावट से आयात महंगा होता है, जिससे 'कॉस्ट-पुश' मुद्रास्फीति बढ़ती है और अंततः निर्यात से होने वाला लाभ समाप्त हो जाता है। असंभव त्रिकोण : यह 'मुंडेल-फ्लेमिंग मॉडल' का  है, जिसके अनुसार कोई भी देश एक साथ स्थिर विनिमय दर, स्वतंत्र मौद्रिक नीति और मुक्त पूंजी प्रवाह को बनाए नहीं रख सकता। मुद्रा को बचाने के लिए ब्याज दरें बढ़ाने से घरेलू विकास रुकता है, और इसे छोड़ देने से महंगाई बढ़ती है। ऐतिहासिक संदर्भ (2008 और 2013): भारत ने 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट और 2013 के 'टेपर टैंट्रम' का मजबूती से सामना किया है। उस समय आरबीआई (RBI) ने रेपो दरों में कटौती, विशेष डॉलर विंडो और राजकोषीय प्रोत्साहन जैसे उपायों से स्थिति को संभाला था। वर्तमान परिदृश्य (2026): वर्तमान मे...

अंतरराष्ट्रीय कानून का संकट और 'शक्ति ही सत्य है' का उदय!

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    ​वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में अंतरराष्ट्रीय कानूनों की प्रासंगिकता समाप्त होती प्रतीत हो रही है। यूक्रेन, गाजा और ईरान में जारी संघर्षों ने यह सिद्ध कर दिया है कि जब राष्ट्रों के निजी हित अंतरराष्ट्रीय नियमों से टकराते हैं, तो नियम गौण हो जाते हैं। अमेरिका, रूस और इजरायल जैसे शक्तिशाली राष्ट्रों ने कानून के शासन को शक्ति ही सत्य है के सिद्धांत से बदल दिया है। ​ ​दोहरा मापदंड और उत्तरदायित्व का अभाव: जहाँ रूस के कार्यों की आलोचना की जाती है, वहीं अमेरिका और इजरायल द्वारा किए गए मानवाधिकारों के उल्लंघन पर कई राष्ट्र मौन रहते हैं। यह 'डबल स्टैंडर्ड' अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की विश्वसनीयता को कम करता है। ​आर्थिक और सामाजिक प्रभाव: यह अराजकता केवल सीमाओं तक सीमित नहीं है। इसका सीधा असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। ऊर्जा संकट (गैस और पेट्रोल की कमी) और खाद की किल्लत ने भारत, श्रीलंका और फिलीपींस जैसे देशों को गंभीर संकट में डाल दिया है। भारत के पास पेट्रोल का सीमित स्टॉक और उर्वरकों की संभावित कमी खाद्य सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा है। ​प्रभुसत्ता का उल्लंघन: रूस द्वारा यूक्रेन क...

​युगपुरुष: बाबा साहब! (कविता) -प्रो प्रसिद्ध कुमार.

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    ​कितने झेले दंश आपने, कितने पिए जहर के घूंट, ऊँच-नीच की बेड़ियाँ देखीं, देखी जाति और छुआछूत। पिया हलाहल नीलकंठ बन, हर पग पर अपमान सहा, शहर, गाँव या पाठशाला हो—हर पथ पर व्यवधान रहा। ​कट्टरपंथी, पाखंडी और ढोंगियों के वे प्रहार थे, पशुओं से बदतर जीवन था, बंद सभी द्वार थे। न कुआँ अपना, न ताल अपना, न साथ बैठने का अधिकार, किंतु आपके अडिग संकल्प ने कर डाला सबका उद्धार। ​त्याग दिया वह संकीर्ण धर्म, जो मनुष्य में भेद करे, अपनाया वह धम्म बुद्ध का, जो जन-जन में स्नेह भरे। ज्ञान-पुंज बन उभरे आप, दलितों के तुम बने विधान, रच डाला वह महाकाव्य—भारत का पावन संविधान। ​दीप जलाया मानवता का, राष्ट्र प्रेम का बोध दिया, वंचित वर्ग को गौरव और जीने का अधिकार दिया। आज भले ही कोई नफरत में प्रतिमा पर चोट करे, पर हृदय-सिंहासन से तुमको, बोल कौन निष्कासित करे? ​अटल ध्रुव के तारा हो तुम, अमर रहेगी यह गाथा, जब तक यह वसुंधरा रहेगी, झुकेगा उनके आगे माथा। ढोंग और पाखंड खंडित कर, स्वाभिमान की लौ जलाई, अंधकारमय जीवन में तुमने, ज्ञान की पावन भोर दिखाई। ​"शिक्षित बनो, संगठित रहो और करो तुम संघर्ष" यही मंत्र अब ग...

राम लखन सिंह यादव कॉलेज में अंबेडकर जयंती की पूर्व संध्या पर विचार संगोष्ठी का आयोजन!

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अनिसाबाद/पटना: स्थानीय राम लखन सिंह यादव कॉलेज में बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर की जयंती की पूर्व संध्या पर 'संवैधानिक मूल्यों का महत्व' विषय पर एक भव्य विचार संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता कॉलेज के प्राचार्य प्रो. सुरेंद्र प्रसाद ने की। ​संवैधानिक मूल्यों पर जोर संगोष्ठी के मुख्य वक्ता प्रो. डॉ. महेंद्र सिंह ने विषय पर प्रकाश डालते हुए कहा कि संवैधानिक मूल्यों का पालन करना हर नागरिक का परम कर्तव्य है। उन्होंने बाबा साहेब के विजन को आधुनिक भारत की आधारशिला बताया। वहीं, प्रो. सतेंद्र प्रसाद ने डॉ. अंबेडकर के जीवन संघर्षों और समाज में व्याप्त कुरीतियों के विरुद्ध उनके द्वारा झेले गए दंश का भावुक और गहरा विवरण प्रस्तुत किया। ​सामाजिक समानता का संदेश संगोष्ठी की शुरुआत करते हुए प्रो. प्रसिद्ध कुमार ने विषय प्रवेश कराया और बताया कि 14 अप्रैल का दिन मात्र एक तिथि नहीं, बल्कि सामाजिक समानता, जातिगत भेदभाव के खिलाफ संघर्ष और शिक्षा के माध्यम से सशक्तिकरण का प्रतीक है। वक्ताओं ने रेखांकित किया कि अंबेडकर जयंती 2026 आज एक ऐसे आंदोलन का रूप ले चुकी है जो स्वतंत्रता, स...

अलविदा 'सुरों की मल्लिका': आशा भोंसले का 92 वर्ष की आयु में निधन!

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   ​भारतीय संगीत प्रेमियों के लिए आज का दिन एक गहरे शोक की लहर लेकर आया है। अपनी जादुई आवाज़ से सात दशकों तक दुनिया पर राज करने वाली दिग्गज गायिका आशा भोंसले अब हमारे बीच नहीं रहीं। 92 वर्ष की आयु में, 12 अप्रैल 2026 को मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली। ​वे पिछले कुछ समय से चेस्ट इन्फेक्शन और अत्यधिक थकान से जूझ रही थीं। उनके जाने से भारतीय संगीत के एक युग का अंत हो गया है। ​सात दशकों का सुरीला सफर ​आशा ताई केवल एक गायिका नहीं, बल्कि एक संस्था थीं। उनके करियर पर एक नज़र डालें तो उनकी बहुमुखी प्रतिभा देखकर हैरानी होती है: ​हजारों गीतों का संगम: उन्होंने अपने करियर में 12,000 से भी अधिक गाने गाए। ​हर विधा में माहिर: चाहे वो चंचल कैबरे हो, गंभीर गज़लें हों, या भक्ति से भरे भजन—आशा जी ने हर शैली को अपनी आवाज़ से अमर बना दिया। ​वर्सेटैलिटी की मिसाल: उन्होंने 'दम मारो दम' जैसे बोल्ड गानों से लेकर 'इन आँखों की मस्ती के' जैसी नज़ाकत भरी गज़लों तक, संगीत के हर रंग को बखूबी जिया। ​संगीत की दुनिया का एक अटूट स्तंभ ​लता दीदी के जाने के बाद, आशा जी ही थीं जिन्होंने ...

न्याय की जीत: तमिलनाडु के साथनकुलम कस्टोडियल डेथ केस में 9 पुलिसकर्मियों को फांसी की सजा!

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    मानवाधिकार और न्याय व्यवस्था!  ​भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में 6 अप्रैल 2026 का दिन एक ऐतिहासिक मोड़ के रूप में दर्ज हो गया है। मदुरै की एक अदालत ने तमिलनाडु के चर्चित 'साथनकुलम कस्टोडियल डेथ केस' में अपना फैसला सुनाते हुए 9 पुलिसकर्मियों को मृत्युदंड (Death Penalty) की सजा दी है। कोर्ट ने इस मामले को 'दुर्लभ से दुर्लभतम' (Rarest of Rare) करार दिया है। ​क्या था पूरा मामला? ​यह घटना जून 2020 की है, जब पूरा देश कोविड-19 लॉकडाउन की पाबंदियों के बीच था। तूतीकोरिन जिले के साथनकुलम में रहने वाले एक व्यापारी पी. जयराज (59) और उनके बेटे जे. बेनिक्स (31) को पुलिस ने हिरासत में लिया था। उनका "जुर्म" सिर्फ इतना बताया गया था कि उन्होंने लॉकडाउन के समय के बाद भी अपनी मोबाइल की दुकान खुली रखी थी। ​हिरासत के दौरान पुलिस स्टेशन में इन दोनों पर जो बर्बरता हुई, उसने पूरे देश की रूह कपा दी थी। गंभीर चोटों के कारण अस्पताल में बाप-बेटे की मौत हो गई। इस घटना के बाद देशभर में 'Black Lives Matter' की तर्ज पर पुलिस बर्बरता के खिलाफ गुस्सा फूट पड़ा था। ​अदालत का कड़ा रुख ​...

दुर्लभ मृदा तत्व : चीन पर निर्भरता और भविष्य की चुनौतियाँ !

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    ​चीन का एकाधिकार: यद्यपि 'दुर्लभ मृदा' तत्व दुनिया के कई हिस्सों (भारत, ब्राजील, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया) में पाए जाते हैं, लेकिन चीन वर्तमान में इनके खनन का 70% और शोधन  का लगभग 90% नियंत्रित करता है। ​रणनीतिक महत्व: लिथियम, कोबाल्ट, डिस्प्रोसिम और सीरियम जैसे तत्व इलेक्ट्रिक वाहनों की मोटरों, सैन्य इलेक्ट्रॉनिक्स और उच्च-तकनीकी विनिर्माण के लिए महत्वपूर्ण हैं। पश्चिमी देशों की इन पर बढ़ती निर्भरता ने उन्हें भू-राजनीतिक रूप से असुरक्षित  बना दिया है। ​आउटसोर्सिंग और 'NIMBY' प्रभाव: पश्चिमी देशों ने पर्यावरण प्रदूषण और उच्च लागत के डर से इन तत्वों के निष्कर्षण को उन देशों में आउटसोर्स कर दिया जहाँ नियम शिथिल हैं। इस मेरे घर के पीछे नहीं  वाली सोच ने चीन को इस क्षेत्र में अपनी स्थिति मज़बूत करने का अवसर दिया। ​भविष्य की राह:  यूरोप और अन्य देशों को अपनी पुरानी उदासीनता छोड़नी होगी। यूरोप के पास रीसाइक्लिंग तकनीकों और पेटेंट में बढ़त हासिल है, जिसका उपयोग करके वह अपनी आपूर्ति श्रृंखला को सुरक्षित कर सकता है और चीन पर अपनी निर्भरता कम कर सकता है। ​ यदि दुनिया को ...

रचनात्मक अर्थव्यवस्था: भारत की नई आर्थिक नियति !

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   इसे निम्नलिखित बिंदुओं से समझें. ​1 कल्पना से व्यापार तक का सफर  टिकाऊ उद्यम केवल वित्तीय आंकड़ों से नहीं, बल्कि कल्पना और एक निश्चित दृष्टिकोण से शुरू होते हैं। 'ऑरेंज इकोनॉमी' विचारों को बौद्धिक संपदा में बदलती है, जो अंततः आजीविका का साधन बनती है। यह एक पुनर्योजी  क्षेत्र है जहाँ एक कहानी या डिजिटल निर्माण बिना किसी प्राकृतिक संसाधन के क्षरण के, वैश्विक स्तर पर फैल सकता है। ​2. आर्थिक प्रभाव और सांख्यिकी ​रचनात्मकता अब केवल एक 'सॉफ्ट स्किल' नहीं, बल्कि एक आर्थिक बुनियादी ढांचा है: ​वैश्विक प्रभाव: यह क्षेत्र विश्व स्तर पर सालाना $2 ट्रिलियन से अधिक का राजस्व उत्पन्न करता है। ​भारतीय परिदृश्य: भारतीय मीडिया और मनोरंजन उद्योग $30 बिलियन को पार कर चुका है और 2029 तक $47 बिलियन तक पहुँचने का अनुमान है। ​भविष्य की संभावना: 2030 तक भारत की व्यापक रचनात्मक अर्थव्यवस्था $100 बिलियन तक पहुँच सकती है, जिससे 50 लाख नौकरियों के अवसर पैदा होंगे। ​3. दुर्गा पूजा: एक जीवंत उदाहरण ​कोलकाता की दुर्गा पूजा (यूनेस्को द्वारा मान्यता प्राप्त) का उदाहरण  हैं कि कैसे एक सांस्कृत...

2026: अंतरिक्ष अन्वेषण का नया सवेरा!

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  प्रतियोगियों के लिए विशेष!  ​हाल ही में संपन्न हुआ आर्टेमिस 2 (Artemis 2) मिशन केवल एक अंतरिक्ष यात्रा नहीं, बल्कि मानवता के गहन अंतरिक्ष (Deep Space) में स्थायी निवास की दिशा में एक निर्णायक कदम है। 1 अप्रैल को शुरू हुई इस यात्रा ने इतिहास रच दिया है, जहाँ चार अंतरिक्ष यात्रियों ने पृथ्वी से लगभग 4,06,788 किलोमीटर की दूरी तय की—जो मानव इतिहास में अब तक की सर्वाधिक दूरी है। ​मिशन की मुख्य उपलब्धियाँ और तकनीक ​आर्टेमिस 2 का प्राथमिक उद्देश्य नासा के ओरियन (Orion) अंतरिक्ष यान और स्पेस लॉन्च सिस्टम (SLS) की मानव सुरक्षा मानकों पर पुष्टि करना था। इस मिशन की कुछ खास बातें इस प्रकार रहीं: ​फ्री-रिटर्न प्रक्षेपवक्र (Free-return Trajectory): यान ने चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण का उपयोग कर स्वयं को वापस पृथ्वी की ओर मोड़ा, जिससे ईंधन की बचत हुई और सुरक्षा सुनिश्चित हुई। ​अंधेरे का अनुभव: मिशन के दौरान अंतरिक्ष यात्रियों ने चंद्रमा के 'दूरस्थ भाग' (Far Side) पर रेडियो सन्नाटे और पूर्ण अंधकार का अनुभव किया, जो वैज्ञानिक शोध के लिए एक उत्कृष्ट वातावरण प्रदान करता है। ​पृथ्वी का उदय (Earthr...

प्रो. संगीता कुमारी बनीं राम लखन सिंह यादव कॉलेज की उप-प्राचार्य!

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   पटना (अनीसाबाद): राम लखन सिंह यादव कॉलेज, अनीसाबाद के शैक्षणिक एवं प्रशासनिक सुदृढ़ीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए प्रो. संगीता कुमारी को कॉलेज का नया उप-प्राचार्य (Vice-Principal) नियुक्त किया गया है। प्रो. कुमारी वर्तमान में कॉलेज के हिंदी विभागाध्यक्ष के पद पर कार्यरत हैं। अनुशासन और शैक्षणिक विकास पर जोर पदभार ग्रहण करने के अवसर पर प्रो. संगीता कुमारी ने अपनी प्राथमिकताओं को स्पष्ट करते हुए कहा: "सभी के सहयोग से मैं कॉलेज को विकास की नई ऊंचाइयों पर ले जाने का प्रयास करूंगी। मेरी सभी सहकर्मियों और छात्रों से अपेक्षा है कि वे अनुशासन बनाए रखें ताकि संस्थान में एक उत्कृष्ट एकेडमिक वातावरण निर्मित हो सके।" प्राचार्य ने बताया 'ऐतिहासिक दिन' कॉलेज के प्राचार्य प्रो. सुरेंद्र प्रसाद ने इसे संस्थान के लिए एक ऐतिहासिक दिन बताया। उन्होंने प्रो. कुमारी को पुष्पगुच्छ भेंट कर सम्मानित किया और भरोसा जताया कि उनके अनुभव से कॉलेज की शैक्षणिक गरिमा और बढ़ेगी। डॉ प्रो महेंद्र सिंह ने कहा कि प्रो कुमारी, शालीन, कुशाग्र बुद्धि व मिलनसार हैं, इनके नेतृत्व में कॉलेज  शि...

​ट्रंप का 'आर्ट ऑफ द रिट्रीट' और मध्य-पूर्व का बदलता समीकरण!

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    ​हालिया भू-राजनीतिक घटनाक्रमों ने विश्व मंच पर अमेरिका की साख और उसकी कूटनीतिक सीमाओं को एक बार फिर बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है। जिसे कभी एक 'निर्णायक सैन्य अभियान' के रूप में प्रचारित किया गया था, वह अंततः एक अस्थायी युद्धविराम और रणनीतिक वापसी में तब्दील होता दिख रहा है। इसे आलोचक ट्रंप की 'आर्ट ऑफ द डील' के बजाय 'आर्ट ऑफ द रिट्रीट' का नाम दे रहे हैं। ​सैन्य दबाव बनाम जमीनी हकीकत ​अमेरिका ने ईरान के प्रति कड़े तेवर अपनाते हुए परमाणु कार्यक्रमों को ध्वस्त करने और शासन परिवर्तन जैसे बड़े लक्ष्य निर्धारित किए थे। लेकिन हफ्तों की बमबारी के बाद भी ईरान की मिसाइल क्षमताएं और उसका परमाणु भंडार काफी हद तक सुरक्षित है। यहाँ तक कि 'स्ट्रैट ऑफ होर्मुज', जिसे बंद करने की धमकी दी गई थी, अब एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर 'फिर से खोलने' की बात कही जा रही है, जबकि वास्तव में वह कभी पूरी तरह बंद हुआ ही नहीं था। ​मध्यस्थों की नई भूमिका: पाकिस्तान और चीन ​इस पूरे घटनाक्रम में एक दिलचस्प मोड़ पाकिस्तान की भूमिका रहा। रिपोर्टों के अनुसार, पाकिस्तानी नेतृत्व ने...

ऊर्जा का 'हथियारीकरण' (Weaponization of Energy) !

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   आधुनिक युग में युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि आपूर्ति श्रृंखलाओं पर लड़े जाते हैं। संसाधन उपलब्ध होना काफी नहीं है, बल्कि उन तक 'पहुंच' बनाए रखना असली शक्ति है। भारत के लिए यह केवल व्यापार का मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संप्रभुता का विषय है। ​ 'हॉर्मुज जाल' और रणनीतिक स्वायत्तता: भारत एक कठिन संतुलन बना रहा है। एक तरफ उसे अमेरिका के साथ अपने संबंधों को बचाना है, तो दूसरी तरफ रूस और ईरान जैसे 'प्रतिबंधित' देशों से ऊर्जा खरीदनी है। भारत को किसी एक पक्ष में झुकने के बजाय अपनी 'डी-रिस्किंग' रणनीति खुद विकसित करनी होगी। ​घरेलू तकनीक की उपेक्षा: महत्वपूर्ण बिंदु 'कोयला गैसीकरण' है। भारत के पास विशाल कोयला भंडार है, लेकिन तकनीक और नीतिगत स्पष्टता के अभाव में हम अब भी आयातित गैस और तेल पर निर्भर हैं। चीन ने जिस तरह सासोल (Sasol) जैसी कंपनियों से तकनीक सीखकर खुद को आत्मनिर्भर बनाया, वह भारत के लिए एक सबक है। ​ भविष्य की राह: भारत को केवल अंतरराष्ट्रीय बंदरगाहों (जैसे चाबहार या अन्य द्विपक्षीय समझौते) पर निर्भर नहीं रहना चाहिए, बल्कि अपनी आंतरिक ऊर्ज...

डिजिटल अर्थव्यवस्था का नया अध्याय: सरहदों के पार UPI !

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  पिछले एक दशक में भारत ने वित्तीय समावेशन और तकनीकी नवाचार के क्षेत्र में जो उपलब्धि हासिल की है, उसने दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। भारत का 'सॉफ्ट पावर' अब उसके डिजिटल बुनियादी ढांचे, विशेष रूप से UPI के माध्यम से चमक रहा है। जिस तरह UPI ने रेहड़ी-पटरी वालों से लेकर बड़े शोरूम तक भुगतान को सरल बनाया, अब वही मॉडल वैश्विक स्तर पर धूम मचाने को तैयार है। प्रेषण का महत्व भारत के लिए सीमा पार भुगतान केवल तकनीक का विषय नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर अर्थव्यवस्था से जुड़ा है। भारत का विशाल प्रवासी समुदाय हर साल अरबों डॉलर घर भेजता है। वर्तमान में, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पैसा भेजने में लगने वाला शुल्क और समय, प्रेषक और प्राप्तकर्ता दोनों के लिए एक बड़ी समस्या है। यदि इन शुल्कों को 3% से कम कर दिया जाए और लेनदेन को वास्तविक समय में बदला जाए, तो करोड़ों परिवारों को सीधा लाभ होगा। बाधाएं और तकनीकी एकीकरण सीमा पार लेनदेन की राह में सबसे बड़ी बाधा 'पहुंच' या तकनीक नहीं, बल्कि अलग-अलग देशों के भिन्न-भिन्न नियम, टाइम-ज़ोन का अंतर और अनुपालन प्रक्रियाएं हैं। लेख स्पष्ट करता है कि के...

​सुर्खियां जापान की, व्यथा बिहार की: क्या यही है पत्रकारिता का बदलता स्वरूप?

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    ​पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है, जिसकी पहली जिम्मेदारी अपने पाठकों तक सटीक और स्पष्ट जानकारी पहुँचाना है। परंतु, आज ही  'प्रभात खबर' जैसे प्रतिष्ठित समाचार पत्र में प्रकाशित एक लेख ने इस स्तंभ की बुनियाद पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। जब शीर्षक और खबर के बीच का तालमेल पूरी तरह गायब हो जाए, तो समझ लेना चाहिए कि संपादन डेस्क अब 'आंखें बंद कर' काम कर रहा है। ​शीर्षक और कथ्य का विरोधाभास ​लेख का शीर्षक चिल्ला-चिल्ला कर 'जापानियों की औसत उम्र सबसे अधिक' होने का दावा कर रहा है, जबकि उसके नीचे की इबारत बिहार के 1799 पुलिस अवर निरीक्षक भर्ती परीक्षा के अभ्यर्थियों का दर्द बयां कर रही है। यह महज एक "टाइपिंग एरर" नहीं है, बल्कि यह समाचार पत्रों के गिरते मानक और संपादन की प्रक्रिया में आई भारी शिथिलता का प्रमाण है। ​पाठकों के साथ कैसा खिलवाड़? ​एक पाठक अखबार इसलिए उठाता है ताकि वह कम समय में देश-दुनिया की महत्वपूर्ण खबरों से रूबरू हो सके। ​भ्रामक सूचना: अभ्यर्थी जो अपनी परीक्षा के नतीजों और धांधली की खबर पढ़ना चाहते हैं, वे शीर्षक देखकर इसे नजरअं...

आधुनिक परवरिश: टूटते परिवेश और सिमटता बचपन!

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   बच्चा वह नहीं करता जो आप उसे 'कहते' हैं, वह वह करता है जो आपको 'करते' हुए देखता है।  मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, और उसकी सीखने की प्रक्रिया जन्म के पहले क्षण से ही शुरू हो जाती है।  "कोई भी बच्चा सब कुछ सीख कर धरती पर जन्म नहीं लेता।" मनोविज्ञान की भाषा में कहें तो बच्चा एक 'तबुला रासा' (Tabula Rasa) यानी एक कोरी स्लेट के समान होता है, जिस पर समाज और परिवार अपने अनुभवों की कलम से भविष्य की इबारत लिखते हैं। ​मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण: प्राथमिक समाजीकरण की भूमिका ​बच्चे के मानसिक विकास में 'प्राथमिक समाजीकरण' का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र उसका परिवार होता है। ​अनुकरण की शक्ति: बच्चा वही बनता है जो वह अपने आसपास देखता है। यदि माता-पिता धैर्यवान हैं, तो बच्चा धैर्य सीखता है। ​सुरक्षा का भाव: माता-पिता का साथ बच्चे को 'अटैचमेंट थ्योरी' के अनुसार भावनात्मक सुरक्षा प्रदान करता है। जब यह साथ कम होता है, तो बच्चे में असुरक्षा और एकाकीपन (Loneliness) की भावना पनपने लगती है। ​सामाजिक विश्लेषण: बदलता परिवेश और बाहरी प्रभाव ​आज के दौर में "अफसोस क...

वैश्विक अस्थिरता और भारतीय अर्थव्यवस्था!

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  वर्तमान में वैश्विक मंच पर जारी युद्ध और तनाव ने केवल सीमाओं को ही नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था की नींव को भी हिला दिया है। भारत में इसका सीधा असर शेयर बाजार के सूचकांकों में 12% तक की गिरावट और रुपये के अवमूल्यन के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, आर्थिक प्रभाव केवल यहीं तक सीमित नहीं हैं; असली खतरा उन आंतरिक और सूक्ष्म दरारों में छिपा है जो संकट के समय उभरकर सामने आती हैं। निजी ऋण: एक उभरता हुआ खतरा? दुनिया भर में 'प्राइवेट क्रेडिट' (निजी ऋण) का बाजार तेजी से बढ़ा है, लेकिन अब इसमें रेडेंप्शन (निकासी) का दबाव बढ़ रहा है। भारत में यद्यपि यह क्षेत्र बैंकिंग क्षेत्र के मुकाबले छोटा (लगभग $30-40 बिलियन) है, लेकिन इसकी 'अपारदर्शिता' और बैंकों के साथ इसका 'अंतर्संबंध' चिंता का विषय है। RBI की 'वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट' पहले ही इस ओर इशारा कर चुकी है कि निजी ऋण में आने वाला तनाव पूरे वित्तीय तंत्र को संक्रमित कर सकता है। प्रशासनिक विफलता और घोटाले हाल ही में बैंकिंग क्षेत्र में दो प्रमुख घटनाएं सामने आई हैं जिन्होंने नियामकों की नींद उड़ा दी है: गवर्नेंस...

FCRA बिल 2026 चिंताएं!

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    केंद्र सरकार द्वारा हाल ही में बजट सत्र के दौरान विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 पेश किया गया। इस विधेयक का उद्देश्य भारत में गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) को मिलने वाले विदेशी फंड के प्रबंधन और नियंत्रण को और अधिक कड़ा बनाना है। हालाँकि, विपक्षी दलों और नागरिक समाज के भारी विरोध के कारण फिलहाल इसे टाल दिया गया है। विधेयक के प्रमुख प्रस्तावित बदलाव इस नए संशोधन में कुछ ऐसे प्रावधान शामिल किए गए हैं जिन्होंने नई बहस को जन्म दिया है: संपत्तियों पर नियंत्रण: विधेयक में एक 'नामित प्राधिकरण' (Designated Authority) की नियुक्ति का प्रस्ताव है। यदि किसी NGO का पंजीकरण रद्द या निलंबित होता है, तो यह प्राधिकरण उनकी संपत्तियों का प्रबंधन या निपटान करने का अधिकार रखेगा। 'मुख्य पदाधिकारी' की व्यापक परिभाषा: अब ट्रस्टी, हिंदू अविभाजित परिवार के कर्ता और संगठन को नियंत्रित करने वाले अन्य लोगों को भी 'मुख्य पदाधिकारी' माना जाएगा, जिससे उनकी कानूनी जिम्मेदारी बढ़ जाएगी। जांच के लिए पूर्व अनुमति: किसी भी कानून प्रवर्तन एजेंसी को FCRA संबंधी शिकायतों की जांच शुरू करने स...

नाटो और अमेरिका: क्या डगमगा रही है दशकों पुरानी दोस्ती?

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  ​   ​हाल के घटनाक्रमों ने दुनिया के सबसे शक्तिशाली सैन्य गठबंधन, नाटो (NATO), और उसके सबसे बड़े सहयोगी अमेरिका के बीच बढ़ती दरार को उजागर कर दिया है। एक हालिया साक्षात्कार में पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा नाटो से अमेरिका की सदस्यता वापस लेने की बात को "पुनर्विचार से परे" बताए जाने के बाद वैश्विक राजनीति में हलचल तेज हो गई है। ​विवाद की जड़: आखिर ट्रम्प नाटो से नाराज क्यों हैं? ​ट्रम्प की नाराजगी का मुख्य कारण 'एकतरफा बोझ' और 'सहयोग की कमी' है। उनके अनुसार: ​सैन्य सहयोग का अभाव: हालिया ईरान संघर्ष के दौरान, नाटो सहयोगियों ने अमेरिका को सैन्य और हवाई क्षेत्र (Airspace) के उपयोग की अनुमति देने से इनकार कर दिया। ट्रम्प इसे विश्वासघात मानते हैं, क्योंकि अमेरिका दशकों से यूरोप की रक्षा करता आया है। ​वित्तीय असंतुलन: अमेरिका नाटो के रक्षा खर्च का लगभग 62% वहन करता है। हालांकि 2025 के हेग शिखर सम्मेलन में सदस्य देशों ने 2035 तक अपने रक्षा खर्च को जीडीपी के 5% तक बढ़ाने पर सहमति जताई है, लेकिन ट्रम्प इसे नाकाफी मानते हैं। ​अनुच्छेद 5 की व्याख्या: ट्रम्प...

सामूहिक स्वर और कला की शक्ति: पांजरी आर्टिस्ट्स यूनियन (PAU) !

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  ​ ​कला जब केवल प्रदर्शन न रहकर सामाजिक संवाद का जरिया बन जाए, तो वह समाज की गहरी परतों को झकझोरने की क्षमता रखती है। बंगाल स्थित पांजरी आर्टिस्ट्स यूनियन (PAU) इसी विचार को केंद्र में रखकर काम कर रहा है। यह कलाकारों का एक ऐसा समूह है जो राजनीति, समाज और हाशिए के समुदायों की कहानियों को प्रदर्शन कला (performance art) के माध्यम से मंच प्रदान करता है। ​कला और सामाजिक सरोकार ​21 फरवरी 2022 को गठित इस यूनियन में दृश्य कला, डिजाइन, साहित्य, फिल्म और शिक्षा जगत से जुड़े 14 अभ्यासी शामिल हैं। 'पांजरी' नाम उन पारंपरिक औजारों से प्रेरित है जिनका उपयोग बंगाल के नाविक जलमार्गों पर नेविगेशन के लिए करते थे। यह नाम इस बात का प्रतीक है कि यह समूह कला के जरिए समाज को दिशा दिखाने और अपनी जड़ों से जुड़े रहने का प्रयास कर रहा है। ​प्रमुख प्रदर्शन और उनकी प्रासंगिकता PAU के काम में 'परफॉर्मेटिविटी' (प्रदर्शनशीलता) केवल एक कला रूप नहीं, बल्कि एकजुट होने और अपनी बात रखने का एक माध्यम है। ​ट्राई टू रिमेंबर (Try to Remember): इस प्रदर्शन के जरिए कलाकारों ने जाति, हाशिए पर रहने के दर्द और राजनीति...

पहचान के दायरे: एक आकार सबके लिए सही नहीं !

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   ​समाज अक्सर लोगों को स्पष्ट और परिभाषित 'बक्सों' में रखने में सुरक्षित महसूस करता है। हम विविधता को स्वीकार करने के बजाय उसे श्रेणियों में बांटने की कोशिश करते हैं, लेकिन मानवीय पहचान अक्सर इन सीमाओं को तोड़ देती है। चपल भादुड़ी का जीवन इसी 'फ्लुइडिटी' या तरलता का एक जीवंत उदाहरण है। ​चपल रानी: लिंग भेद से परे एक कलाकार ​चपल भादुड़ी बंगाली रंगमंच के उन अंतिम महान कलाकारों में से हैं, जिन्होंने महिला पात्रों को जीवंत किया। 1960 और 70 के दशक में जब 'LGBTQ+' जैसे शब्द प्रचलित नहीं थे, तब चपल रानी के अभिनय ने महान अभिनेता उत्तम कुमार तक को अचंभित कर दिया था। वे मंच पर स्त्री थे और व्यक्तिगत जीवन में पुरुष, लेकिन उनकी पहचान इन दोनों के बीच कहीं गहराई में बसी थी। ​सादगी और सत्य: वे स्वयं को 'ट्रांसजेंडर' जैसी आधुनिक शब्दावली में नहीं बांधते थे। उन्होंने मंच के बाहर कभी महिलाओं के कपड़े पहनने की इच्छा नहीं की, लेकिन मंच पर श्रृंगार करते ही वे अपने पुरुष होने का अस्तित्व भूल जाते थे। ​समाज का विरोधाभास: पुराने समय में, बिना किसी औपचारिक आंदोलन के भी समाज ने च...