भारत में चिकित्साकरण (Medicalisation) का बढ़ता जाल!
यह भारत में बढ़ती मोटापे की समस्या और उसके समाधान के रूप में उभरे 'फार्मास्युटिकल बाज़ार' के अंतर्संबंधों पर तीखा प्रहार है। कैसे स्वास्थ्य अब जीवनशैली के बजाय दवाइयों और व्यावसायिक हितों के इर्द-गिर्द सिमटता जा रहा है।
कॉर्पोरेट निर्णय और बाज़ार का मेल: एयर इंडिया द्वारा अधिक BMI वाले चालक दल को हटाने का निर्णय और उसी समय बाज़ार में सस्ती 'एंटी-ओबेसिटी' दवाओं (जैसे सेमाग्लूटाइड) का आना मात्र संयोग नहीं, बल्कि एक गहरे व्यावसायिक संकेत की ओर इशारा करता है।
दवाओं का आक्रामक विपणन: प्रत्यक्ष विज्ञापन पर प्रतिबंध के बावजूद, फार्मा कंपनियाँ 'जन जागरूकता' और 'सरोगेट एडवरटाइजिंग' के जरिए आम जनता के मानस को प्रभावित कर रही हैं। चिकित्सा दिशा-निर्देशों में इन दवाओं का तेजी से शामिल होना वैज्ञानिक साक्ष्यों से ज्यादा व्यावसायिक दबाव का परिणाम नजर आता है।
दुष्प्रभावों का नया चक्र: यह 'सार्कोपेनिया' (मांसपेशियों की हानि) जैसे गंभीर दुष्प्रभावों की ओर ध्यान आकर्षित है। विडंबना यह है कि अब इन दवाओं से होने वाले नुकसान को ठीक करने के लिए नई दवाएँ विकसित की जा रही हैं, जिससे इलाज का एक कभी न खत्म होने वाला चक्र (Cascading Logic) बन रहा है।
विरोधाभासी पारिस्थितिकी तंत्र: एक तरफ खाद्य उद्योग 'अल्ट्रा-प्रोसेस्ड' भोजन से मोटापा बढ़ा रहा है, तो दूसरी तरफ फार्मा उद्योग उसका इलाज बेच रहा है। यह व्यवस्था आर्थिक रूप से लाभदायक है, लेकिन सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए विनाशकारी।
दवाएँ केवल सहायक (Adjuncts) होनी चाहिए, न कि स्वस्थ जीवनशैली का विकल्प। वास्तविक स्वास्थ्य सुधार के लिए हमें निम्नलिखित की ओर लौटना होगा:
पोषण युक्त आहार और शारीरिक सक्रियता।
पर्याप्त नींद और तनाव प्रबंधन।
चिकित्सा पेशे में नैतिक शुचिता और पारदर्शिता।
मोटापा केवल एक मेडिकल समस्या नहीं, बल्कि एक सामाजिक और जीवनशैली से जुड़ी चुनौती है। स्वास्थ्य को दवाओं की परिभाषा से बाहर निकालकर पुनः टिकाऊ जीवनशैली के केंद्र में लाने की आवश्यकता है।
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