अंतरराष्ट्रीय कानून का संकट और 'शक्ति ही सत्य है' का उदय!

   


​वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में अंतरराष्ट्रीय कानूनों की प्रासंगिकता समाप्त होती प्रतीत हो रही है। यूक्रेन, गाजा और ईरान में जारी संघर्षों ने यह सिद्ध कर दिया है कि जब राष्ट्रों के निजी हित अंतरराष्ट्रीय नियमों से टकराते हैं, तो नियम गौण हो जाते हैं। अमेरिका, रूस और इजरायल जैसे शक्तिशाली राष्ट्रों ने कानून के शासन को शक्ति ही सत्य है के सिद्धांत से बदल दिया है।

​दोहरा मापदंड और उत्तरदायित्व का अभाव: जहाँ रूस के कार्यों की आलोचना की जाती है, वहीं अमेरिका और इजरायल द्वारा किए गए मानवाधिकारों के उल्लंघन पर कई राष्ट्र मौन रहते हैं। यह 'डबल स्टैंडर्ड' अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की विश्वसनीयता को कम करता है।

​आर्थिक और सामाजिक प्रभाव: यह अराजकता केवल सीमाओं तक सीमित नहीं है। इसका सीधा असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। ऊर्जा संकट (गैस और पेट्रोल की कमी) और खाद की किल्लत ने भारत, श्रीलंका और फिलीपींस जैसे देशों को गंभीर संकट में डाल दिया है। भारत के पास पेट्रोल का सीमित स्टॉक और उर्वरकों की संभावित कमी खाद्य सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा है।

​प्रभुसत्ता का उल्लंघन: रूस द्वारा यूक्रेन की संप्रभुता को चुनौती देना और अमेरिका का ईरान व अन्य क्षेत्रों में हस्तक्षेप करना यह दर्शाता है कि अब किसी भी देश की सीमाएं सुरक्षित नहीं हैं। यहाँ तक कि डोनाल्ड ट्रम्प जैसे नेताओं के बयान (कनाडा और ग्रीनलैंड के संदर्भ में) वैश्विक अस्थिरता को और बढ़ावा देते हैं।

​भारत और चीन की भूमिका: भारत और चीन जैसे देशों ने रूस के आक्रमण पर तटस्थ रहकर अंतरराष्ट्रीय मानदंडों की अनदेखी की है। चीन जहाँ एक ओर क्षेत्रीय अखंडता की बात करता है, वहीं दूसरी ओर हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्वयं एक खतरा बना हुआ है।

​एक ऐसी दुनिया जहाँ अंतरराष्ट्रीय कानून लागू करने का कोई तंत्र न हो, वह किसी भी राष्ट्र की संप्रभुता और अस्तित्व के लिए घातक है। यदि 'जंगल राज' इसी तरह हावी रहा, तो यह न केवल राजनीतिक अस्थिरता लाएगा बल्कि दुनिया को एक गहरे सामाजिक और आर्थिक पतन की ओर धकेल देगा। 

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