"मूर्खता का महोत्सव" - (कविता) - प्रो प्रसिद्ध कुमार.

 


​चढ़ा दो थाली, लुटा दो माल,

यहाँ अक्ल की विदाई है,

बगल में दबाए ढोंग की पोटली,

पाखंडियों की तो अब कमाई है।

​समय की होली

घंटों कतार में खड़े रहो,

पत्थर को अपना 'कल' सौंप दो,

जो वक्त बदलना था खुद को तराश कर,

उसे बाबा के चरणों में झोंक दो।

फुर्सत कहाँ है तुम्हें तरक्की सोचने की,

अभी तो शनि और राहु को टोकना है,

जिंदगी की दौड़ में पीछे रह गए,

पर बिल्ली का रास्ता अभी रोकना है।

​धन का विसर्जन

जेब खाली है, घर में तंगी है,

पर चंदे की रसीद कटानी है,

दवा के पैसे बाबा को दे दिए,

अब भभूत से बीमारी भगानी है।

सोना चढ़ाया उस मूरत पर,

जिसने कभी भूख नहीं देखी,

और पड़ोसी भूखा सो गया—

पर तुम्हारी भक्ति तो बड़ी 'नेकी' है!

​बुद्धि का दीवाला

पढ़े-लिखे गधे घूम रहे हैं,

डिग्री को ताबीज बना कर,

तर्क को खूंटी पर टांग दिया,

अंधविश्वास का सुरमा लगा कर।

ईश्वर भी सोचता होगा ऊपर बैठकर,

कि मैंने तो 'इंसान' बनाया था,

पर इसने तो डर और पाखंड के बीच,

खुद का ही 'दिवाला' निकाला था। 

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