भारतीय रक्षा बजट और रणनीति: आधुनिकीकरण की चुनौतियाँ!

  


 यह भारत की रक्षा तैयारियों, बजटीय आवंटन और रणनीतिक योजना के अंतर्विरोधों का विश्लेषण  है।  भारत को केवल अधिक खर्च करने की नहीं, बल्कि सही दिशा में खर्च करने की आवश्यकता है। 

​रणनीतिक तालमेल का अभाव: भारतीय रक्षा नीति वर्तमान में 'साइलो'  में काम कर रही है। सेना के तीनों अंगों (थल, जल और नभ) के बीच एक एकीकृत 'थिएटर कमान' का अभाव है। इससे संसाधन बिखरे हुए हैं और योजनाएँ 20वीं सदी के युद्धों की धारणा पर आधारित लगती हैं, न कि आधुनिक युद्धों पर।

​आयात पर अत्यधिक निर्भरता: भारत का अधिकांश रक्षा पूंजीगत व्यय (Capex) विदेशी हथियारों और प्लेटफॉर्म्स (जैसे राफेल जेट, जर्मन पनडुब्बियां) पर खर्च होता है। यह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक 'टैक्स' की तरह है, क्योंकि इससे घरेलू रक्षा उद्योगों या अर्थव्यवस्था को वह 'मल्टीप्लायर इफेक्ट' नहीं मिलता जो अमेरिका या चीन जैसे देशों को मिलता है।

​घरेलू अनुसंधान (R&D) की उपेक्षा: विदेशी प्लेटफॉर्म्स को खरीदने और उनके रखरखाव में इतना पैसा खर्च हो जाता है कि भविष्य की तकनीकों जैसे AI, क्वांटम कंप्यूटिंग और साइबर ऑपरेशंस के लिए बहुत कम बजट बचता है। उदाहरण के तौर पर, कावेरी इंजन प्रोजेक्ट को तीन दशकों में मात्र $300 मिलियन मिले, जो आधुनिक रक्षा मानकों में बहुत कम है।

​बंद वास्तुकला आयातित हथियार प्रणालियाँ अक्सर विदेशी आपूर्ति श्रृंखलाओं पर निर्भर होती हैं। आपात स्थिति में (जैसे ऑपरेशन सिंदूर के दौरान), भारत को गोला-बारूद के लिए विदेशी बाजारों की ओर भागना पड़ता है, जो रणनीतिक रूप से जोखिम भरा और महंगा है।

 भारत को पारंपरिक और भारी हथियारों की खरीद के बजाय असममित युद्ध क्षमताओं और घरेलू नवाचार पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। संसाधनों की सीमित उपलब्धता को देखते हुए, रक्षा व्यय का प्राथमिकता निर्धारण करना अनिवार्य है ताकि भारत भविष्य की चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना कर सके। 

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