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Showing posts from May, 2026

थान का कपड़ा और हमारी व्यवस्था: जहाँ मूल्य 'नियम' नहीं, दुकानदार की 'मर्जी' तय करती है !

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   ​आधुनिकता और डिजिटल इंडिया के इस दौर में जहाँ एक ओर हम पारदर्शी बाजार और 'वन नेशन, वन टैक्स' (GST) जैसे बड़े सुधारों का दावा करते हैं, वहीं दूसरी ओर हमारी जमीनी व्यवस्था की एक ऐसी कड़वी हकीकत है जो आज भी उपभोक्ताओं का मौन शोषण कर रही है। देश के पारंपरिक कपड़ा बाजारों में मिलने वाला 'थान का कपड़ा' (Unstitched Fabric Rolls) इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है। ​1. मूल्य नियंत्रण और पारदर्शिता का अभाव ​थान वाले कपड़ों की सबसे बड़ी विसंगति यह है कि इनमें आम तौर पर प्रति मीटर का कोई निश्चित और स्पष्ट खुदरा मूल्य (MRP) अंकित नहीं होता। यदि कुछ थान के किनारों या टैग पर मूल्य अंकित होता भी है, तो वह केवल थोक व्यापारी या बड़े डीलरों के समझने योग्य कोड भाषा में होता है, जिसे आम क्रेता कभी नहीं समझ पाता। परिणाम यह होता है कि कीमत पारदर्शी होने के बजाय पूरी तरह से गोपनीय बनी रहती है। ​2. 'जो मुँह में आया, वही कीमत' – उपभोक्ता की लाचारी ​जब किसी उत्पाद पर स्पष्ट और वैधानिक मूल्य अंकित नहीं होता, तो वहाँ बाजार के नियम समाप्त हो जाते हैं और दुकानदार का एकाधिकार शुरू हो जाता है। जहाँ...

बिहार में 'जीरो टॉलरेंस' के रंगमंच पर कमीशन का 'क्लासिक' नाटक! -​प्रो प्रसिद्ध कुमार का एक व्यंग्यात्मक विवेचना!

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   जब बढ़े हुए बिल ईमानदारी का प्रमाणपत्र बन जाएं और व्यवस्था रिश्वत को 'जायज बिजनेस' का सिंदूर लगा दे! ​बिहार की पावन धरती पर इन दिनों 'भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टॉलरेंस' का एक बेहद अनूठा और कलात्मक मंचन चल रहा है। इस नाटक के मुख्य निर्देशक हैं—'ऋशु श्री' उर्फ ऋशु रंजन सिन्हा, जो अपनी प्रशासनिक 'महिमा' के कारण आजकल प्रवर्तन निदेशालय (ED) और विशेष निगरानी इकाई (SVU) के मेहमान बने हुए हैं। आम जनता जिसे 'घोटाला' समझकर छाती कूट रही है, दरअसल वह आधुनिक अर्थशास्त्र का एक ऐसा अद्भुत 'सिंडिकेट' मॉडल है, जिस पर हार्वर्ड में रिसर्च होनी चाहिए। ​1. 'जायज बिजनेस' की गंगा में अनैतिकता का स्नान ​हमारी व्यवस्था की रचनात्मकता देखिए! जब आम आदमी रिश्वत देता है, तो उसे 'पाप' कहा जाता है। लेकिन जब ऋशु श्री जैसे 'महान कलाकार' उप-ठेकेदार (सब-कॉन्ट्रेक्टर) की जादुई छड़ी घुमाते हैं, तो वही काली कमाई रातों-रात 'वैध व्यापारिक भुगतान' (बिजनेस पेमेंट) का पवित्र जल बनकर सामने आती है। फर्ज़ी और बढ़े हुए बिल केवल कागज़ के टुकड़े नहीं हैं...

आदिवासी पहचान और आस्था पर बहुसंख्यकवाद का साया!

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    ​जल, जंगल और जमीन की लूट कर सरकार पूंजीपतियों को चारागाह बना रही है. ​हाल ही में देश की राजधानी दिल्ली में 'जनजाति सुरक्षा मंच' और संघ परिवार से जुड़े संगठनों द्वारा एक विशाल 'जनजाति सांस्कृतिक समागम' का आयोजन किया गया। महान आदिवासी नायक वीर बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती के अवसर पर आयोजित इस कार्यक्रम में सरकार और प्रशासन की पूरी मशीनरी शामिल थी, जिसमें केंद्रीय गृह मंत्री मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे। इस मंच से जो मांगें उठाई गईं, वे केवल सांस्कृतिक नहीं थीं, बल्कि उनके पीछे एक गहरा राजनीतिक एजेंडा छिपा हुआ था। ​इस समागम का मुख्य उद्देश्य उन आदिवासियों को 'अनुसूचित जनजाति' (ST) की सूची से बाहर करने की मांग करना था, जिन्होंने ईसाई या अन्य धर्म अपना लिया है। साथ ही, उनके संवैधानिक और कानूनी अधिकारों को छीनने की वकालत भी की गई। ​संवैधानिक मर्यादा और ऐतिहासिक मिसाल ​धर्म परिवर्तन के आधार पर आदिवासियों को आरक्षण और अन्य कानूनी लाभों से वंचित करने की मांग पूरी तरह से असंवैधानिक है। भारतीय संविधान में अनुसूचित जातियों (SC) और अनुसूचित जनजातियों (ST) के निर्धारण...

# भारत में बढ़ता साइबर अपराध: आंकड़े डराने वाले हैं, लेकिन सतर्कता ही सबसे बड़ा बचाव है!

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   आज के डिजिटल युग में जहाँ एक क्लिक पर बैंकिंग, शॉपिंग और मनोरंजन की सुविधाएं हमारे हाथ में हैं, वहीं इस डिजिटल क्रांति का एक स्याह पहलू भी सामने आया है—**साइबर धोखाधड़ी**। हाल ही में सामने आए सरकारी आंकड़े न सिर्फ चौंकाने वाले हैं, बल्कि यह चेतावनी भी दे रहे हैं कि हमारी एक छोटी सी लापरवाही कितनी भारी पड़ सकती है। आइए समझते हैं कि भारत में साइबर अपराध का ग्राफ कितनी तेजी से बढ़ रहा है और इससे बचने के पुख्ता उपाय क्या हैं। ## साइबर अपराध के चौंकाने वाले सरकारी आंकड़े नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल (NCRC) और सरकारी रिपोर्टों के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में साइबर धोखाधड़ी के मामलों में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है: | वर्ष | दर्ज किए गए कुल मामले | नागरिकों को हुआ वित्तीय नुकसान | | :--- | :--- | :--- | | **2022** | 10.29 लाख मामले | — | | **2023** | 15.96 लाख मामले | — | | **2024** | 22.68 लाख मामले | ₹22,845 करोड़ | | **2025** | **28.15 लाख मामले** | **₹22,495 करोड़** | इन आंकड़ों से साफ है कि डिजिटल ठग हर साल लाखों लोगों को अपनी जाल में फंसा रहे हैं और देश को अरबों रुपये का चूना ल...

​डिजिटल महत्वाकांक्षा और प्रशासनिक पतन: सीबीएसई (CBSE) के ऑन-स्क्रीन मार्किंग संकट का एक विश्लेषण

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     शिक्षा और नीति ब्लॉग  -प्रो प्रसिद्ध कुमार. ​हाल ही में घोषित सीबीएसई कक्षा 12 के परिणामों ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था में एक गंभीर बहस को जन्म दे दिया है। नए सिरे से लागू की गई 'ऑन-स्क्रीन मार्किंग' (OSM) प्रणाली, जिसे मूल्यांकन में पारदर्शिता और तेजी लाने के लिए लाया गया था, वह आज छात्रों के असंतोष, अंकों में भारी विसंगतियों और प्रशासनिक विफलता का मुख्य कारण बन चुकी है। यह ब्लॉग इस पूरे संकट का एक निष्पक्ष और विश्लेषण प्रस्तुत करता है। ​1. संकट की पृष्ठभूमि: डिजिटल सुधार या जल्दबाजी का शिकार? ​सीबीएसई द्वारा इस वर्ष शुरू की गई ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) प्रणाली का मुख्य उद्देश्य मानवीय त्रुटियों (जैसे योग की गलतियां) को समाप्त करना, त्वरित मूल्यांकन सुनिश्चित करना और भौतिक कॉपियों के रख-रखाव से मुक्ति पाना था। सैद्धांतिक रूप से, इस प्रणाली के तहत हस्तलिखित उत्तर पुस्तिकाओं को डिजिटल रूप से स्कैन करके एक सुरक्षित प्लेटफॉर्म पर अपलोड किया जाता है, जहाँ शिक्षक कंप्यूटर स्क्रीन पर उनका मूल्यांकन करते हैं। ​हालांकि, जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल विपरीत रही। जैसे ही कक्षा 1...

# हिंदी पत्रकारिता दिवस विशेष: क्या 'लोकतंत्र का चौथा स्तंभ' अपनी पहचान खो रहा है? प्रो प्रसिद्ध कुमार! ( MJMC)

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    आज 30 मई है। आज ही के दिन साल 1826 में पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने कोलकाता से हिंदी भाषा के पहले साप्ताहिक समाचार पत्र **'उदन्त मार्तण्ड'** का प्रकाशन शुरू किया था। यह दिन भारतीय इतिहास में हिंदी पत्रकारिता की नींव रखने और लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में इसके अमूल्य योगदान को सराहने का अवसर है।  लेकिन आज इस ऐतिहासिक दिन पर जहाँ हमें गर्व होना चाहिए, वहीं एक गंभीर आत्मचिंतन की भी ज़रूरत है। प्रो. प्रसिद्ध कुमार (मास्टर इन मास कम्युनिकेशन एंड जर्नलिज्म) के विचारों के आलोक में यदि हम देखें, तो कल की 'मिशन' रही पत्रकारिता आज महज़ एक 'प्रोफेशन' और 'बिज़नेस' बनकर रह गई है। आइए विश्लेषण करते हैं कि पत्रकारिता का सुनहरा अतीत क्या था और आज यह किस दौर से गुज़र रही है। --- ## 1. अतीत का आईना: जब पत्रकारिता 'जनता की आवाज़' थी एक समय था जब पत्रकारिता को लोकतंत्र का सबसे मजबूत और निष्पक्ष स्तंभ माना जाता था। इसके मूल में कुछ बेहद खास विशेषताएं थीं: *   **निष्पक्षता और वस्तुनिष्ठता:** पत्रकारों का मुख्य उद्देश्य तथ्यों को बिना किसी लाग-लपेट या निजी पूर्वाग्...

​राम लखन सिंह यादव कॉलेज, अनीसाबाद (पटना) में एडमिशन शुरू: जानें कोर्स, सुविधाएं और पूरी जानकारी!

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   ​यदि आप इंटरमीडिएट के बाद पटना में एक बेहतरीन कॉलेज की तलाश कर रहे हैं, तो आपके लिए एक शानदार अवसर है। पाटलिपुत्र यूनिवर्सिटी, पटना से संबद्ध राम लखन सिंह यादव कॉलेज (Ram Lakhan Singh Yadav College), अनीसाबाद में शैक्षणिक सत्र के लिए BA, B.Sc और B.Com पाठ्यक्रमों में नामांकन (Admission) की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। ​"चुनें राम लखन सिंह यादव कॉलेज, अनीसाबाद, पटना – चुनें सफलता!" के नारे के साथ यह कॉलेज विद्यार्थियों को उनके सुनहरे भविष्य की ओर ले जाने के लिए तैयार है। आइए जानते हैं इस कॉलेज से जुड़ी सभी महत्वपूर्ण बातें। ​📚 उपलब्ध स्ट्रीम और विषय (Subjects Offered) ​कॉलेज मुख्य रूप से तीन प्रमुख स्ट्रीमों में शिक्षा प्रदान करता है। छात्र अपनी रुचि के अनुसार निम्नलिखित विषयों का चयन कर सकते हैं: ​1. साइंस स्ट्रीम (Science Stream - B.Sc) ​विज्ञान के क्षेत्र में करियर बनाने वाले छात्रों के लिए यहाँ सभी मुख्य विषय उपलब्ध हैं: ​भौतिक विज्ञान (Physics) ​रसायन विज्ञान (Chemistry) ​गणित (Mathematics) ​वनस्पति विज्ञान (Botany) ​जंतु विज्ञान (Zoology) ​2. कॉमर्स स्ट्रीम (Commerce S...

​डिजिटल युग का नया सच: 'आप उत्पाद हैं'!

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    ​होम सर्विसेज और एआई के दौर में दांव पर लगती हमारी निजता !  जब भी हम इंटरनेट पर खुद को 'इंसान' साबित करने के लिए ग्रिड इमेज (कैप्चा) में ट्रैफिक लाइट या मोटरसाइकिल चुनते हैं, तो असल में हम बिना जाने स्वायत्त वाहनों (ड्राइवरलेस कारों) को प्रशिक्षित कर रहे होते हैं। हमारे ईमेल और डिजिटल फुटप्रिंट्स एआई टूल्स को स्मार्ट बना रहे हैं। सीधे शब्दों में कहें तो डिजिटल स्पेस में हम जो कुछ भी करते हैं, वह एआई के लिए डेटा बन जाता है। लेकिन अब यह डेटा कलेक्शन सिर्फ स्क्रीन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह हमारे घरों के भीतर तक पैर पसार चुका है। ​1. होम सर्विसेज की आड़ में डेटा का खेल ​हाल ही में चर्चा में आई 'प्रोंटो' (Pronto) जैसी होम सर्विसेज स्टार्टअप्स, जो घरों में कैमरे लगाकर काम कर रही हैं, इस नए संकट का उदाहरण हैं। निवेशकों के अनुसार, इस प्रकार की कंपनियों का वास्तविक मूल्यांकन उनकी सेवाओं से अधिक इस बात पर निर्भर करता है कि वे 'फिजिकल एआई और रोबोटिक्स' के लिए घरों के अंदर का डेटा कितना जुटा पाती हैं। ​रोबोटिक्स के लिए डेटा क्यों जरूरी है? विशेषज्ञों के अनुसार, इंसानी ...

​शुचिता का सरेंडर: जब परीक्षाओं की सुरक्षा के लिए 'सेना' बुलानी पड़े !

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    ​डिजिटल इंडिया के दौर में सिस्टम का सबसे बड़ा 'लॉजिस्टिकल और नैतिक' फेलियर!  ​किसी भी संप्रभु राष्ट्र के लिए इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि जिस देश का प्रशासनिक ढांचा खुद को 'हाई-टेक' और डिजिटल कहता हो, उसे देश के बच्चों की एक परीक्षा कराने के लिए देश की सरहदों की रक्षा करने वाली वायुसेना का सहारा लेना पड़ रहा है। नीट-यूजी (NEET-UG) पेपर लीक मामले के बाद उपजा यह नया संकट सिर्फ एक परीक्षा के रद्द होने की कहानी नहीं है, बल्कि यह हमारे पूरे सिस्टम, राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) और राज्य पुलिस तंत्र के पूरी तरह से पंगु हो जाने का आधिकारिक घोषणापत्र है। ​22 लाख सपनों की बलि और 'ऊंची कीमतों' का बाजार ​जब परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक होता है, तो सिर्फ एक कागज का टुकड़ा बाहर नहीं आता; बल्कि ईमानदारी से दिन-रात एक करने वाले करीब 22 लाख छात्रों की मेहनत, उनके माता-पिता के त्याग और इस देश की योग्यता (Merit) का खुलेआम सौदा होता है। ​भ्रष्ट लेनदेन का खेल: पैसे के दम पर भविष्य खरीदने वाले माफिया आज भी खुलेआम घूम रहे हैं। ​शोर में दबी पीड़ा: पेपर लीक होने के बाद मचे राजनीतिक...

​नाम की परछाई, चरित्र का आईना! ​जब लंपटता ने ओढ़ा ओज का मुकुट!

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    ​मगध के उस विशाल और ऐतिहासिक प्रांत में, जहाँ कभी चाणक्य की नीतियां और बुद्ध की करुणा गूंजती थी, समय का चक्र कुछ यूँ घूमा कि भाषा के संस्कार लुप्त होने लगे। नगर के चौराहे पर एक नया 'चौधरी' उभरा था। नाम तो उसने सम्राटों जैसा रख लिया था, पर उसकी वाणी में न तो सम्राटों की गरिमा थी और न ही सुसंस्कृत समाज की शालीनता। ​वह एक ऐसे संवैधानिक मंच पर आसीन था, जहाँ से निकलने वाले शब्द कभी कानून की मर्यादा तय करते थे। किंतु, वर्तमान का दृश्य वीभत्स था। उस चौधरी ने जान लिया था कि आज के युग में जितनी फुहड़, सतही और कटु बातें की जाएं, भीड़ उतनी ही जल्दी आकर्षित होती है। वह स्वयं को 'तीसमार खां' समझने लगा था। उसका एकमात्र लक्ष्य था—सत्ता के शीर्ष पर बैठे अपने 'आकाओं' को प्रसन्न रखना और मनमाफिक पुरस्कार पाना। यह ठीक वैसा ही था, जैसे कोई कौआ मोर के पंख लगाकर खुद को हंसों की सभा का नायक घोषित कर दे। योग्यता (मेरिट) के नाम पर उसके पास केवल वाक-चातुर्य और मर्यादाविहीन लंपटता थी। ​शिक्षा का पराभव और अज्ञानता का अंधकार ​जब वह मंच से बोलता, तो शिक्षा सिसकने लगती। 'हफ़ितडीफिट' औ...

सत्य का हलाहल और व्यवस्था की चौखट!

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    ​   ​आदर्शों के अवसान और अकेले संघर्ष की एक मर्मभेदी दास्तान !  ​अदालतें जब युवाओं को 'परजीवी' या 'तेलचट्टा' कहकर संबोधित करती हैं. ​- एक वैचारिक रिपोर्ताज ​सुकरात का विष और आधुनिक बौनापन ​इतिहास गवाह है कि अमरता की कीमत हमेशा हलाहल पीकर ही चुकाई गई है। सुकरात आज भी जीवित है क्योंकि उसने सच की वेदी पर समझौते का अमृत पीने से इनकार कर दिया था। विडंबना देखिए कि आज का बहुसंख्यक समाज सुबह उठने, कमाने, बच्चों की फीस भरने और ईएमआई (EMI) के चक्रव्यूह में उलझकर केवल सांसें गिन रहा है। इतिहास उन्हें बिसरा देता है जो रीढ़विहीन होकर जीते हैं, और उन्हें याद रखता है जो सच के सामने चट्टान की तरह अड़े रहते हैं। ​चौखट पर झुके सर: कलम का आत्मसमर्पण ​हाल ही में न्यायपालिका की विसंगतियों और भ्रष्टाचार को आठवीं की पाठ्यपुस्तक में शामिल करने वाले तीन शिक्षाविदों का प्रसंग देश के बौद्धिक मानस को झकझोर गया। जब सर्वोच्च अदालत की भृकुटि तनी, नौकरी जाने और भविष्य के सरकारी कार्यों पर प्रतिबंध का संकट आया, तो वे तीनों शीर्ष अदालत की चौखट पर नतमस्तक हो गए। "मीलार्ड! गलती हो गई, माफ कर दीजि...

​₹100 का मनोवैज्ञानिक स्तर: प्रतीक बनाम वास्तविकता!

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    ​भारतीय रुपये में गिरावट के मायने, वैश्विक दबाव और देश की आर्थिक बुनियाद का एक विश्लेषणात्मक मूल्यांकन ​1.  गिरावट और उसके कारण ​हाल के दिनों में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये का मूल्य ₹85 से गिरकर लगभग ₹96 के स्तर पर आ गया है, और यह लगातार ₹100 के मनोवैज्ञानिक आंकड़े की ओर बढ़ रहा है। इस गिरावट के पीछे मुख्य रूप से निम्नलिखित बाह्य और आंतरिक कारक ज़िम्मेदार हैं: ​कच्चे तेल का संकट: भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए लगभग 90% कच्चे तेल का आयात करता है। पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव और 'स्ट्रेट ऑफ़ हारमुज़'  की नाकेबंदी के कारण ब्रेंट क्रूड की कीमतें $100 प्रति बैरल पार कर चुकी हैं, जिससे देश का आयात बिल काफी बढ़ गया है। ​पूंजी की निकासी : विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की भारतीय शेयर बाजार (NSE) में हिस्सेदारी 17 वर्षों के सबसे निचले स्तर पर आ गई है। वर्ष 2024 और 2025 में विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) ने हर साल करीब ₹3 लाख करोड़ की निकासी की है, और 2026 में यह स्थिति और भी गंभीर दिख रही है। ​डॉलर रिटर्न में कमी: यद्यपि भारतीय शेयर सूचकांक 'निफ्टी 50...

​प्रतिशोध का नया व्याकरण: "तू नहीं, तो तेरी परछाई सही" ! ( कहानी)

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​. ठुकराए हुए अहम् की गूँज!  ​वह केवल एक शादी का प्रस्ताव नहीं था, आर्यन के लिए वह उसकी मर्दानगी और उसके अस्तित्व की स्वीकार्यता की कसौटी थी। बरेली की उस उमस भरी शाम, जब लड़की ने साफ़ शब्दों में उसके 'सिस्टम' और उसके प्रेम को ख़ारिज कर दिया, तो आर्यन के भीतर कुछ टूट गया। वह कोई कोमल हृदय प्रेमी नहीं था, जिसका दिल टूटता तो वह आँसू बहाता। वह एक ऐसे समाज का हिस्सा था जहाँ पुरुष का अहम् काँच के बर्तन से भी ज़्यादा नाज़ुक और नुकीला होता है—ज़रा सी ठेस लगते ही वह दूसरों को लहूलुहान करने की ताक में रहता है। ​लड़की का 'ना' कहना आर्यन के दिमाग़ में एक अंतहीन गूँज बन गया। मनोविज्ञान कहता है कि जब किसी अत्यधिक आत्ममुग्ध (Narcissist) व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध अस्वीकार किया जाता है, तो उसका दिमाग़ उस अस्वीकृति को एक गहरे अपमान की तरह लेता है। वह अब उस लड़की को पाना नहीं चाहता था, वह उस परिवार को उसकी 'औकात' दिखाना चाहता था। ​. एक विकृत प्रतिस्थापन  ​"तू नहीं तो तेरी माँ सही..." > यह महज़ एक जुमला नहीं था, यह उस विकृत सोच की पराकाष्ठा थी जहाँ संबंध और भावनाएँ विनिमेय...

व्यक्तिगत क्षमता और स्वावलंबन का मार्ग !

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   ​हर व्यक्ति के भीतर असीम और पूर्ण क्षमता छिपी होती है। यह पूरी तरह से स्वयं व्यक्ति की इच्छाशक्ति और उसके निर्णयों पर निर्भर करता है कि वह अपने जीवन को किस दिशा में ले जाना चाहता है। यदि वह चाहे, तो अपनी सोच और कर्मों से कल्पना से भी अधिक निचले स्तर पर गिर सकता है, और यदि संकल्प कर ले, तो ऊंचाइयों के उस शिखर को छू सकता है जिसकी कल्पना भी सामान्यतः असंभव लगती है। ​वास्तव में, पतन का मार्ग अत्यंत सुगम होता है, परंतु जीवन में ऊपर उठने की प्रक्रिया एक कठिन चढ़ाई की तरह है। जिस प्रकार किसी पर्वत की चढ़ाई करने में शारीरिक और मानसिक बल की आवश्यकता होती है, ठीक उसी प्रकार जीवन में उन्नति और श्रेष्ठता प्राप्त करने में कड़ी मेहनत, अनुशासन और दृढ़ता लगती है। ​इसके विपरीत, समाज में भीड़ के पीछे चलना बेहद आसान माना जाता है। बहुसंख्यक लोग उसी रास्ते पर चल पड़ते हैं जहाँ बाकी सब जा रहे हैं, क्योंकि ऐसी स्थिति में व्यक्ति को स्वयं का विवेक, बुद्धि और दिमाग नहीं लगाना पड़ता। वह बिना किसी अतिरिक्त प्रयास या जिम्मेदारी के बस प्रवाह के साथ बहता चला जाता है। वास्तविक प्रगति और आत्म-विकास का मार...

​भारत में निर्धनता की स्थिति: एक सतत आर्थिक चुनौती !

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      आर्थिक संवृद्धि के बीच क्षेत्रीय असमानता और उपभोग व्यय का एक विश्लेषणात्मक मूल्यांकन ​1.  भारतीय अर्थव्यवस्था में तीव्र समष्टि आर्थिक संवृद्धि के बावजूद, 'गरीबी' या 'निर्धनता' एक निरंतर नीतिगत चिंता बनी हुई है। आर्थिक असमानता को दूर करने के लिए विशेष रूप से कृषि और खनिज-समृद्ध क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है। ​2. निर्धनता मापन और उपभोग व्यय  ​रंगराजन विशेषज्ञ समूह की सिफारिशें: वर्ष 2011-12 के मूल्यों के आधार पर ग्रामीण क्षेत्रों के लिए ₹972 और शहरी क्षेत्रों के लिए ₹1,407 प्रति व्यक्ति मासिक व्यय को निर्धनता रेखा माना गया था। ​वर्तमान अनुमानित सीमा: नवीनतम उपभोग व्यय के आधार पर, ग्रामीण क्षेत्रों में यह सीमा ₹2,802 प्रति व्यक्ति प्रति माह (लगभग ₹93.4 प्रति दिन) तथा शहरी क्षेत्रों में ₹3,778 प्रति व्यक्ति प्रति माह (लगभग ₹126 प्रति दिन) आंकी गई है। ​3. प्रमुख सांख्यिकीय आंकड़े एवं प्रवृत्तियाँ     वर्तमान समय में देश की कुल आबादी का 26.8% हिस्सा निर्धनता रेखा के नीचे जीवनयापन कर रहा है। ​ग्रामीण बनाम शहरी विभाजन: ग्रामीण...

ज़िंदगी का शायर: बशीर बद्र की याद में एक भावपूर्ण श्रद्धांजलि!

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   ​"आम लोगों के गहरे ज़ख्मों को जीवंत शब्द देने वाले आधुनिक गज़ल के उस्ताद" ​आम लोगों के जीवन के गहरे ज़ख्मों को जीवंत और मखमली शब्द देने वाले प्रख्यात शायर डॉ. बशीर बद्र अब भले ही भौतिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन अपनी रूह को छू लेने वाली कालजयी शायरी के ज़रिए वे अदब की दुनिया में हमेशा अमर रहेंगे। वे जितने सरल और सहज इंसान थे, उनकी रचनाओं में भी उतनी ही सादगी और तरलता थी। बशीर साहब की लेखनी में इस कदर भाव अभिव्यक्ति होती थी कि हर कोई उनकी पंक्तियों में खुद की ज़िंदगी का अक्स देखता था। आधुनिक गज़ल के इस अज़ीम उस्ताद के रचना संसार में ज़िंदगी का हर वह लम्हा शामिल था, जिसे एक आम इंसान रोज़ जीता है, तड़पकता है और मुस्कुराता है। ​"उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो," "न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।" ​बशीर बद्र अपने शब्दों में तन्हाई, जुदाई और इंसानी पीड़ा को बखूबी उकेरते थे। उनकी गज़लें सीधे दिल पर दस्तक देती थीं। वे चुभती ज़रूर थीं, मगर मन के किसी कोने में एक मरहम बनकर दर्ज हो जाती थीं। वे अपनी शायरी में उस शहर को भी जीते रहे, जहाँ वक़्त ...

​विकसित भारत के लिए केवल विकास नहीं, उत्पादकता है जरूरी!

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    ​भारत ने हाल के वर्षों में, विशेषकर कोविड-19 महामारी के बाद, व्यापक आर्थिक स्थिरता के साथ तेज आर्थिक विकास दर हासिल की है। वित्तीय वर्ष 2024-25 में भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर 6.5% रही, जो इसे दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक बनाती है। हालांकि, वर्ष 2047 तक 'विकसित भारत' के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए केवल इस विकास दर को बनाए रखना काफी नहीं है; इसके लिए सभी क्षेत्रों में उत्पादकता को बढ़ाना और गहरे संरचनात्मक सुधार करना अनिवार्य है। ​1. विनिर्माण क्षेत्र: गहराई और पैमाने की कमी ​भारत के विकास की कहानी में सेवाओं  का योगदान बड़ा रहा है, लेकिन विनिर्माण क्षेत्र उम्मीद के मुताबिक रोजगार पैदा करने और उत्पादकता बढ़ाने में पीछे रह गया है। ​असंतुलित ढांचा: भारतीय विनिर्माण क्षेत्र में बहुत सारी छोटी और कम उत्पादक फर्में हैं, जबकि मध्यम और बड़ी फर्मों की संख्या बेहद कम है। यह स्थिति पूर्वी एशिया के उन देशों के विपरीत है जिन्होंने बड़ी फर्मों के दम पर निर्यात और उत्पादकता में ऐतिहासिक वृद्धि की थी। ​अकुशल आवंटन: इस असंतुलन के कारण श्रम का एक...

भावुकता: एक शुद्ध हृदय की अभिव्यक्ति!

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   ​आज की भागदौड़ भरी और व्यावसायिक दुनिया में, जहाँ लोग हर चीज़ को अपनी सुविधा और व्यक्तिगत लाभ के तराजू में तौलते हैं, वहाँ एक भावुक या संवेदनशील व्यक्ति बिल्कुल अलग खड़ा नजर आता है। ऐसे लोग जीवन को केवल अपने फायदे के लिए नहीं जीते, बल्कि वे अपने आस-पास के परिवेश से गहरे से जुड़े होते हैं। ​सुविधा से परे है संवेदनशीलता ​एक गहरा संवेदनशील और भावुक व्यक्ति कभी भी 'सुविधावादी' नहीं होता। वह केवल तब दुखी या विचलित नहीं होता जब उसकी अपनी सुख-सुविधाओं में कोई कमी आती है, बल्कि उसकी सहानुभूति का दायरा बहुत व्यापक होता है। वह प्रकृति और समाज के दर्द को भी उतनी ही शिद्दत से महसूस करता है, जितना अपने व्यक्तिगत संकट को। ​इसे एक बेहद सुंदर उदाहरण से समझा जा सकता है: ​एक आम इंसान शायद केवल तब परेशान होगा जब गर्मी के दिनों में उसके अपने घर में दो दिन पानी न आए। लेकिन एक सच्चा भावुक व्यक्ति किसी सूखी हुई नदी या बंजर खेत को देखकर भी उतना ही गहरा दुःख और तड़प महसूस कर सकता है। उसके लिए प्रकृति का सूखा, उसके अपने घर के सूखे के समान ही कष्टदायी होता है। ​शुद्धता का प्रतीक: भावनात्मक होना ​अक्स...

चुनौतियाँ—आत्म-साक्षात्कार और प्रगति का मार्ग!

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  जीवन एक घने वन के समान है, जहाँ कभी घनी छाया का सुख मिलता है, तो कभी कठिन डगर की बाधाएं सामने आती हैं। अक्सर हम कठिनाइयों को केवल बाधा मानकर उनसे भागने या उन्हें खत्म करने की कोशिश करते हैं, लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अधिक गहरी है। कठिनाइयाँ: हमारी वास्तविक शिक्षक  वन की कठिन परिस्थितियाँ हमें बहुत कुछ सिखाती हैं। जब हम किसी आरामदायक स्थिति  में होते हैं, तो हम अपनी सीमाओं से कभी परिचित नहीं हो पाते। लेकिन जैसे ही कोई समस्या आती है, वह हमारे भीतर छिपी हुई उस 'वास्तविक शक्ति' को बाहर लाती है जिसे हम स्वयं भी नहीं जानते थे। दृष्टिकोण का परिवर्तन समस्याओं के प्रति हमारा नजरिया ही हमारे भविष्य का निर्माण करता है। आलेख के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं: आत्म-बोध: चुनौतियाँ हमें बताती हैं कि हम वास्तव में कितने मजबूत हैं और कहाँ हमें अभी और सुधार करने की आवश्यकता है। बचने के बजाय समझना: समस्याओं से भागना केवल अस्थाई समाधान है। जब हम उन्हें समझने की दृष्टि (Insight) विकसित करते हैं, तो वे डरावनी कम और शिक्षाप्रद अधिक लगने लगती हैं। अनुभव से प्रगति: एक सफल व्यक्ति वह नहीं है जिसके ज...

लोकतंत्र की शुचिता बनाम 'बहुमत की तानाशाही'!

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​चयन समिति की निष्पक्षता पर सुलगते सवाल!  ​लोकतंत्र में चुनाव की निष्पक्षता उसकी रीढ़ होती है। यदि रीढ़ की हड्डी ही कमजोर या झुकी हुई हो, तो लोकतांत्रिक ढांचा ढहने में देर नहीं लगती। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर जो टिप्पणियां की हैं, वे न केवल सरकार की मंशा पर सवाल उठाती हैं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के भविष्य के प्रति एक गंभीर चेतावनी भी हैं। ​1. चयन समिति का ढांचा: एक पूर्व-निर्धारित खेल? ​वर्तमान कानून के तहत चयन समिति में प्रधानमंत्री, एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री और विपक्ष के नेता शामिल हैं। कोर्ट ने इसे "बहुमत की तानाशाही" करार दिया है। तर्क सीधा और स्पष्ट है: तीन सदस्यों वाली समिति में दो सदस्य सत्तापक्ष के (पीएम और उनके द्वारा नामित मंत्री) होने का मतलब है कि विपक्ष के नेता की असहमति का कोई व्यावहारिक मूल्य नहीं रह जाता। निर्णय हमेशा 2:1 के अनुपात में सरकार के पक्ष में ही होगा। ​2. 'स्वतंत्र' और 'स्वतंत्र दिखने' के बीच की खाई ​सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति दत्ता की यह टिप्पणी अत्यंत महत्वपूर्ण है कि "चुनाव आयो...

फिल्म ' द इंडियन लेनिन: बाबू जगदेव ' - शोषितों के संघर्ष की एक जीवंत दास्तान !

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   इसे टैक्स फ्री होना चाहिए! -प्रो प्रसिद्ध कुमार. ​मुख्य विषय: यह फिल्म 29 मई को रिलीज हो रही है, जो 1932 से 1974 तक के सामाजिक-राजनीतिक परिवेश और बाबू जगदेव प्रसाद के "सौ में नब्बे शोषित" के विचार को दर्शाती है। ​विशेषता: बिहार और झारखंड के 200 स्थानीय कलाकारों ने इसमें काम किया है। ​टैक्स फ्री मांग: फिल्म के सामाजिक महत्व और जागरूकता को देखते हुए इसे टैक्स फ्री करने की अपील की गई है ताकि यह संदेश हर घर तक पहुँच सके। 

ऊर्जा संकट और आर्थिक विवशता: भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक चुनौतीपूर्ण विकल्प !

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    ​आर्थिक झटका:  यदि कच्चे तेल की कीमत $100 प्रति बैरल रहती है, तो यह भारत की जीडीपी (GDP) पर 2% का सीधा प्रभाव डालेगी। यह $80 बिलियन के अतिरिक्त खर्च के बराबर है। ​राजकोषीय दबाव: सरकार वर्तमान में उत्पाद शुल्क में कटौती और सब्सिडी के माध्यम से इस बोझ का एक बड़ा हिस्सा (जीडीपी का 1.2%) खुद वहन कर रही है। अब समय आ गया है कि सरकार कीमतों को बाजार के अनुरूप बढ़ने दे। ​कठिन निर्णय: पेट्रोल और डीजल की कीमतों में ₹10 प्रति लीटर की वृद्धि करने से राजकोषीय घाटे में 0.4% की कमी आ सकती है। हालांकि यह कदम महंगाई बढ़ा सकता है, लेकिन यह डॉलर की मांग को कम करने और रुपये को स्थिर करने के लिए आवश्यक है। भारत को अब सब्सिडी के बजाय 'नई ऊर्जा वास्तविकताओं' को स्वीकार करना होगा। अर्थव्यवस्था को स्थिर रखने के लिए उपभोक्ताओं को उच्च कीमतों का बोझ उठाना पड़ सकता है, ताकि भविष्य में बड़े आर्थिक संकट से बचा जा सके। 

आर्थिक सुधार या दबाव: सोने-चांदी पर आयात शुल्क में भारी वृद्धि का विश्लेषण!

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   ​यह  सरकार द्वारा सोने और चांदी पर आयात शुल्क को 6% से बढ़ाकर 15% करने के निर्णय का विश्लेषण  है। मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं: ​कीमतों में उछाल: शुल्क वृद्धि के कारण सोने की कीमतों में ₹10,000/10 ग्राम और चांदी में ₹19,000/किलो तक की भारी वृद्धि हुई है। ​उद्देश्य: सरकार का मुख्य लक्ष्य कीमती धातुओं की मांग को कम करना है ताकि बढ़ते व्यापार घाटे (Trade Deficit) को नियंत्रित किया जा सके और गिरते रुपये को संभाला जा सके। ​आर्थिक चुनौतियां: रुपया डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर पर है और वैश्विक तेल संकट के कारण ईंधन की कीमतों पर भी दबाव बढ़ रहा है। ​रणनीतिक कदम: एक तरफ सरकार घरेलू खपत पर नियंत्रण लगा रही है, वहीं दूसरी तरफ प्रधानमंत्री UAE के साथ ऊर्जा सुरक्षा (LPG और पेट्रोलियम भंडार) को लेकर महत्वपूर्ण समझौते कर रहे हैं। ​विकास पर ध्यान: इन कड़े फैसलों के बावजूद, सरकार ने स्पष्ट किया है कि बुनियादी ढांचे (Capex) और विकास कार्यों के बजट में कोई कटौती नहीं की जाएगी। 

बिहार के वित्त रहित डिग्री कॉलेजों के शिक्षकों ने उच्च शिक्षा मंत्री को सौंपा ज्ञापन; 7 वर्षों के बकाया अनुदान और वेतन-पेंशन की मांग !

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    ​पटना | दिनांक: 14 मई, 2026 उच्च शिक्षा मंत्री ने मांगों को शीघ्र पुरा करने का दिया आश्वासन!  ​बिहार राज्य संबद्ध डिग्री महाविद्यालय शिक्षक-शिक्षकेतर कर्मचारी महासंघ के एक प्रतिनिधिमंडल ने नवनियुक्त उच्च शिक्षा मंत्री, बिहार सरकार से मुलाकात की और उन्हें अपनी लंबित मांगों के संबंध में एक ज्ञापन सौंपा। इस अवसर पर महासंघ के अध्यक्ष श्री राम बिनेश्वर सिंह ने मंत्री जी को बधाई देते हुए राज्य के हजारों शिक्षकों और कर्मचारियों की दयनीय स्थिति से अवगत कराया। ​ज्ञापन की मुख्य मांगें: महासंघ द्वारा प्रस्तुत पत्र में निम्नलिखित प्रमुख बिंदुओं पर तत्काल कार्रवाई का आग्रह किया गया है: ​बकाया अनुदान का भुगतान: राज्य के वित्त रहित/अनुदानित संबद्ध डिग्री महाविद्यालयों में कार्यरत शिक्षकों और कर्मचारियों के पिछले 7 वर्षों के बकाया अनुदान का एकमुश्त भुगतान किया जाए। ​वेतन एवं पेंशन की व्यवस्था: संबद्ध कॉलेजों के कर्मियों को अनुदान के स्थान पर नियमित वेतन, पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभ प्रदान किए जाएं। ​समिति की सिफारिशों पर अमल: वेतन-पेंशन के मुद्दों को सुलझाने के लिए पूर्व मुख्य सचि...

भोजपुर-बक्सर उपचुनाव में राजद की बड़ी जीत: तेजस्वी यादव के नेतृत्व पर लगी मुहर

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    ​पटना | 14 मई 2026 ​बिहार की राजनीति में एक बार फिर राष्ट्रीय जनता दल (RJD) का परचम लहराया है। भोजपुर-बक्सर स्थानीय प्राधिकार विधान परिषद के उपचुनाव में राजद उम्मीदवार सोनू कुमार राय की शानदार जीत ने पार्टी कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा भर दी है। इस जीत का जश्न आज पटना स्थित राजद के राज्य कार्यालय में देखते ही बना, जहाँ नेताओं और कार्यकर्ताओं ने एक-दूसरे को मिठाइयां खिलाकर अपनी खुशी का इजहार किया। ​पार्टी कार्यालय में जश्न का माहौल ​राजद कार्यालय परिसर में आयोजित इस विजय उत्सव में पार्टी के दिग्गज नेता शामिल हुए। प्रदेश अध्यक्ष श्री मंगनी लाल मंडल, पूर्व केंद्रीय मंत्री मो. अली अशरफ फातिमी, मुख्य प्रवक्ता श्री शक्ति सिंह यादव और प्रवक्ता एजाज अहमद समेत बड़ी संख्या में पदाधिकारियों ने इस जीत को लोकतंत्र की जीत बताया। नेताओं ने भोजपुर और बक्सर के पंचायत प्रतिनिधियों व कार्यकर्ताओं के प्रति आभार व्यक्त किया। ​नेतृत्व और लोकतंत्र पर बढ़ता विश्वास ​जीत के बाद नेताओं के संबोधन में आत्मविश्वास और विरोधियों के प्रति तीखे तेवर साफ दिखाई दिए: ​मंगनी लाल मंडल (प्रदेश अध्यक्ष): उन्होंने क...

स्पर्श: आत्मा की मूक अभिव्यक्ति!

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   ​मानवीय संवेदनाओं के महासागर में 'स्पर्श' वह मूक लहर है, जो शब्दों के तट को छुए बिना ही हृदय के अंतस तक पहुँच जाती है। मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए, तो स्पर्श केवल त्वचा का त्वचा से मिलन नहीं, बल्कि दो चेतनाओं का एक-दूसरे में विलीन होना है। यह एक ऐसी आदिम भाषा है जिसे बोलने के लिए जिह्वा की नहीं, बल्कि भावों की शुद्धता की आवश्यकता होती है। ​१. आग्रह और पूर्वाग्रह का विसर्जन ​अक्सर मनुष्य अपने भीतर अहंकार, ईर्ष्या और दुराग्रह (पूर्वाग्रहों) की ऊँची दीवारें खड़ी कर लेता है। ये दीवारें तर्कों से नहीं ढहतीं, बल्कि संवेदना के एक कोमल स्पर्श से ताश के पत्तों की तरह बिखर जाती हैं। जब एक मित्र दूसरे के कंधे पर हाथ रखता है या एक माँ अपनी संतान को गले लगाती है, तो वर्षों की कड़वाहट और गलतफहमियां एक क्षण में तिरोहित हो जाती हैं। ​२. संघर्षों में संबल और मनोवैज्ञानिक शक्ति ​जीवन निरंतर एक संघर्ष है। जब हम मानसिक रूप से टूट रहे होते हैं, तब किसी प्रियजन का मौन स्पर्श मस्तिष्क में 'ऑक्सीटोसिन' (प्रेम और विश्वास का हार्मोन) का संचार करता है। यह हमें संघर्षों को झेलने की शक्ति प...

​बिहार के वित्त रहित शिक्षक: व्यवस्था की क्रूरता और 'खाली खजाने' का छलावा ! प्रो प्रसिद्ध कुमार.

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   ​जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं - सरकार और निर्वाचित प्रतिनिधियों की उदासीनता !  ​बिहार की शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ कहे जाने वाले 'वित्त रहित शिक्षक' आज उस मोड़ पर खड़े हैं जहाँ उन्हें न तो सम्मान मिल रहा है और न ही उनका हक। वर्षों से ज्ञान का दीप जलाने वाले ये शिक्षक स्वयं अंधकारमय भविष्य की ओर धकेले जा रहे हैं।  यह उन हजारों परिवारों की चीख है जो व्यवस्था की उपेक्षा की बलि चढ़ रहे हैं।   ​खजाना खाली है या नीयत में खोट? ​सरकार अक्सर यह दलील देती है कि वित्त रहित कर्मियों के लिए 'खजाना खाली' है। लेकिन यह तर्क तब खोखला साबित हो जाता है जब अन्य विभागों और नियमित कर्मचारियों के लिए वेतन, महंगाई भत्ता, समय पर एरियर और तमाम सुख-सुविधाओं के लिए धन की कमी नहीं होती।   ​क्या वित्त रहित शिक्षक इस राज्य के नागरिक नहीं हैं?   ​क्या उनके बच्चों को भविष्य देखने का अधिकार नहीं है?   ​यह भेदभावपूर्ण रवैया सरकार की संवेदनहीनता का सबसे बड़ा प्रमाण है।   ​"हम भी इंसान हैं... हमारे परिवार हैं... बच्चों का भविष्य है... हमें हमारा हक चाहिए, ...

बिहार में 'सुशासन' की खुली पोल: पटना जानीपुर में अपर थानेदार 1 लाख की घूस लेते रंगे हाथों गिरफ्तार, भ्रष्टाचार का खेल जारी!

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    ​पटना: बिहार सरकार भले ही सूबे में 'जीरो टॉलरेंस' और सुशासन का दावा करे, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। ताजा मामला राजधानी पटना का है, जहाँ पुलिस महकमे में व्याप्त भ्रष्टाचार एक बार फिर उजागर हुआ है। ​क्या है पूरा मामला? ​निगरानी अन्वेषण ब्यूरो की मुख्यालय टीम ने एक बड़ी कार्रवाई करते हुए जानीपुर थाना के अपर थानाध्यक्ष संजय कुमार सिंह को ₹1,00,000 (एक लाख) की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों गिरफ्तार किया है। ​गिरफ्तारी का स्थान: आरोपी को जानीपुर थाना क्षेत्र के बघ्घा टोला स्थित नहर के पूर्वी सड़क के किनारे से दबोचा गया। ​आरोप: परिवादी कौशल किशोर ने शिकायत दर्ज कराई थी कि उनकी जमीन की सरकारी मापी होने के बावजूद असामाजिक तत्व उन्हें बाउंड्री नहीं करने दे रहे थे। इसी बाउंड्री को कराने में मदद के बदले दारोगा संजय कुमार सिंह ने मोटी रकम की मांग की थी। ​निगरानी विभाग का जाल ​शिकायत के सत्यापन के बाद आरोपों को सही पाया गया, जिसके बाद पुलिस उपाध्यक्ष श्री अरुणोदय पाण्डेय के नेतृत्व में एक धावा दल का गठन किया गया। आज दिनांक 13.05.2026 को टीम ने जाल बिछाकर आरोपी पुलिस अधिकारी...

दृष्टिकोण का विकास: एक सतत प्रक्रिया !

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    ​दृष्टिकोण यानी सोचने-समझने का नजरिया, किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। यह एक कड़वा सच है कि दृष्टिकोण जन्मजात नहीं होता। हम अपने साथ इसे लेकर पैदा नहीं होते, बल्कि यह समय के साथ धीरे-धीरे विकसित होता है। ​दृष्टिकोण को निखारने के साधन ​व्यक्ति अपने नजरिए को केवल भाग्य पर नहीं छोड़ सकता। इसे परिपक्व बनाने के लिए कुछ विशेष माध्यमों की आवश्यकता होती है: ​आत्मचिंतन: स्वयं के विचारों का विश्लेषण करना। ​अध्ययन: निरंतर पढ़ना और ज्ञान अर्जित करना। ​संवाद: दूसरों के साथ विचारों का आदान-प्रदान करना। ​अनुभव: जीवन की परिस्थितियों से सीखना। ​व्यापकता का आधार ​जब हम केवल अपनी दुनिया तक सीमित न रहकर दूसरों के अनुभवों से सीखने का प्रयास करते हैं, तब हमारा दृष्टिकोण व्यापक और गहरा होता है। अंततः, एक सही और परिपक्व दृष्टिकोण ही हमें समाज में एक बेहतर इंसान के रूप में स्थापित करता है।