नाम की परछाई, चरित्र का आईना! जब लंपटता ने ओढ़ा ओज का मुकुट!
मगध के उस विशाल और ऐतिहासिक प्रांत में, जहाँ कभी चाणक्य की नीतियां और बुद्ध की करुणा गूंजती थी, समय का चक्र कुछ यूँ घूमा कि भाषा के संस्कार लुप्त होने लगे। नगर के चौराहे पर एक नया 'चौधरी' उभरा था। नाम तो उसने सम्राटों जैसा रख लिया था, पर उसकी वाणी में न तो सम्राटों की गरिमा थी और न ही सुसंस्कृत समाज की शालीनता।
वह एक ऐसे संवैधानिक मंच पर आसीन था, जहाँ से निकलने वाले शब्द कभी कानून की मर्यादा तय करते थे। किंतु, वर्तमान का दृश्य वीभत्स था। उस चौधरी ने जान लिया था कि आज के युग में जितनी फुहड़, सतही और कटु बातें की जाएं, भीड़ उतनी ही जल्दी आकर्षित होती है। वह स्वयं को 'तीसमार खां' समझने लगा था। उसका एकमात्र लक्ष्य था—सत्ता के शीर्ष पर बैठे अपने 'आकाओं' को प्रसन्न रखना और मनमाफिक पुरस्कार पाना।
यह ठीक वैसा ही था, जैसे कोई कौआ मोर के पंख लगाकर खुद को हंसों की सभा का नायक घोषित कर दे। योग्यता (मेरिट) के नाम पर उसके पास केवल वाक-चातुर्य और मर्यादाविहीन लंपटता थी।
शिक्षा का पराभव और अज्ञानता का अंधकार
जब वह मंच से बोलता, तो शिक्षा सिसकने लगती। 'हफ़ितडीफिट' और 'डिलीट' जैसे विकृत और स्तरहीन शब्द जब उसके मुख से निकलते, तो ज्ञान की भूमि बिहार का गौरवशाली इतिहास शर्मसार हो उठता था। नालंदा और विक्रमशिला की आत्माएं इस भाषाई पतन पर आंसू बहाती थीं।
विडंबना की पराकाष्ठा तो देखिए! जिसका स्वयं का चरित्र संदेह के कोहरे में लिपटा था, जिसके दामन पर दाग थे, वह समाज में 'कानून और व्यवस्था' सुधारने का दंभ भर रहा था। यह दृश्य वैसा ही था, जैसे कोई अंधा व्यक्ति हाथ में मशाल लेकर दूसरों को रास्ता दिखाने का ढोंग कर रहा हो।
प्रकृति और शौर्य के 'हरे रंग' का उपहास
एक दिन उस मूढ़ ने 'हरे रंग' का उपहास उड़ाया। वह क्या जाने उस रंग की महिमा?
हरा रंग—जो हमारी धरती की अंगड़ाई है, जो खुशहाली और फसलों की लहलहाती समृद्धि का प्रतीक है।
हरा रंग—जो इतिहास के उस अमर सेनानायक हरि सिंह नलवा के शौर्य का प्रतीक है, जिन्होंने दुश्मनों के छक्के छुड़ा दिए थे और जिनके नाम से खैबर दर्रे तक की धरती कांपती थी।
जब सभा में किसी प्रबुद्ध ने उस चौधरी से पूछा, "क्या तुम जानते हो हरि सिंह नलवा कौन थे?" तो वह अज्ञानी केवल मुंह बनाकर रह गया। इतिहास के पन्नों से कोसों दूर रहने वाले इन मौसमी नेताओं के पास अहंकार तो था, पर बोध शून्य था।
सुदर्शनधारी के वंशज और दुःसाहस का परिणाम
दूसरे ने अपनी मर्यादा लांघते हुए एक ऐसा दुःसाहस कर दिया, जिसने इतिहास के सबसे काले अध्याय की याद दिला दी। उसने उन लोगों को बिहार छोड़ने की धमकी दे डाली, जो स्वयं को उस परम सत्ता का वंशज मानते हैं जो:
अपनी तर्जनी उंगली पर सुदर्शन चक्र घुमा सकता है।
जो लोक-रक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत को एक उंगली पर उठा सकता है।
उसका यह कृत्य वैसा ही था, जैसा महाभारत काल में अहंकारी दुशासन ने हस्तिनापुर की सभा में शांतिदूत बनकर आए साक्षात श्रीकृष्ण को जंजीरों में बांधने का दुःसाहस किया था। दुशासन भूल गया था कि ईश्वर को बांधने का प्रयास करने वाले का अंत कैसा होता है। इतिहास गवाह है, उस मद और अहंकार का परिणाम पूरा कुरुवंश भुगत चुका है।
अस्तित्व का संकट
जो सोलह कलाओं का स्वामी है, जो अपनी बांसुरी की तान से चराचर जगत में प्रेम की वर्षा करता है; उससे घृणा करने वाले को तीनों लोकों में कहीं शरण नहीं मिलती।
वाणी ही मनुष्य के व्यक्तित्व का असली आईना है। किसी भी बात को बोलने से पहले सोच लेना अनिवार्य है। जो संपूर्ण सृष्टि का रक्षक और नियंता है, उससे बैर मोल लेकर और उसके लोक को प्रताड़ित करके, मनुष्य किसी और का नहीं, बल्कि स्वयं के ही अस्तित्व को महाविनाश के खतरे में डाल देता है। समय का रथ जब घूमता है, तो नामी 'चौधरी' और 'सम्राट' भी इतिहास के कूड़ेदान में समा जाते हैं, केवल कर्म और धर्म ही जीवित रहते हैं।
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