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Showing posts from July, 2026

'लीक' होते पेपर, 'बहती' प्रतिमाएं: क्या इसी 'चमकीले भ्रष्टाचार' पर टिका है नया सिस्टम?

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  कहते हैं कि भक्ति में शक्ति होती है, लेकिन हमारी व्यवस्था की भक्ति में गजब की 'कलाकारी' है! यहाँ न तो आस्था अक्षुण्ण है, न युवा का भविष्य सुरक्षित और न ही महापुरुषों का सम्मान। बात चाहे मर्यादा पुरुषोत्तम राम के नाम पर आए चढ़ावे की हो या अपनी ही विचारधारा के शीर्षमूर्धन्य नेता भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी जी की स्मृतियों की—जब नीयत में ही खोट हो, तो आस्था हो या परीक्षा का पर्चा, सब 'लीक' होकर सरेआम नीलाम हो जाता है। जिन्होंने भगवान राम के नाम पर बनी व्यवस्थाओं को संदेह के घेरे में ला खड़ा किया, उनसे देश के युवाओं या अपने मार्गदर्शकों के प्रति ईमानदारी की उम्मीद रखना ही सबसे बड़ी नासमझी है। एक तरफ तो करोड़ों युवाओं के भविष्य का 'पेपर लीक' करके उनकी बरसों की मेहनत पर पानी फेर दिया जाता है, और दूसरी तरफ 14 लाख रुपये डकार कर तांबे की जगह सीमेंट की मूर्ति पर तांबे का रंग पोत दिया जाता है। बारिश की पहली ही फुहार क्या पड़ी, नकली तांबे का रंग बह गया और प्रतिमा में आई दरारों ने चिल्ला-चिल्लाकर सिस्टम के भ्रष्टाचार की कहानी बयाँ कर दी। यह सिर्फ वाजपेयी जी की प्रतिमा की दरार...

चेतना की ओर: जब बुद्ध ने ढकोसलों को नकार कर दिया सत्य का मार्ग!

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  हमें तर्क, विवेक और करुणा को अपनाना चाहिए। इतिहास के पन्नों में कई विचारकों ने जन्म लिया, लेकिन शाक्यमुनि गौतम बुद्ध का आगमन मानव सभ्यता के इतिहास में एक वैचारिक क्रांति की तरह था। बुद्ध ने अंधभक्ति, ढोंग और कर्मकांड से ग्रसित समाज को तर्क, करुणा और प्रत्यक्ष अनुभव का मार्ग दिखाया। उनका धर्म किसी अदृश्य सत्ता का भय नहीं, बल्कि मन को शुद्ध करने और जीवन को व्यावहारिक रूप से समझने का विज्ञान था। आत्मा और अंधविश्वास पर सीधा प्रहार तत्कालीन समाज में यह धारणा गहरी बैठी थी कि आत्मा अजर, अमर और शाश्वत है जो एक शरीर से निकलकर दूसरे शरीर में प्रवेश करती है। महात्मा बुद्ध ने इस रूढ़िवादी विचार पर सीधा प्रहार किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि जिसे लोग अजर-अमर आत्मा कहते हैं, वह केवल मन, विचारों, संवेदनाओं और शरीर के निरंतर बदलते समुच्चय (पंचस्कंध) के अलावा कुछ नहीं है। बुद्ध के अनुसार, ब्रह्मांड में कुछ भी "अमर" या "स्थिर" नहीं है। सब कुछ परिवर्तनशील है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि बिना सोचे-समझे अगले जन्म के सुखों के लिए इस जन्म को पाखंड और अनुष्ठानों में गंवा देना एक 'मनग...

प्रेमचंद जयंती पर 'सूत्रधार' का विशेष आयोजन: "वर्तमान में क्यों प्रासंगिक हैं कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद?"

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  महान उपन्यासकार एवं कहानीकार मुंशी प्रेमचंद की 146वीं जयंती के शुभ अवसर पर खगौल स्थित जमालुद्दीन चक के 'सूत्रधार' कार्यालय में एक भव्य संगोष्ठी का आयोजन किया गया। नाट्य संस्था 'सूत्रधार' द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में क्षेत्र के प्रमुख कलाकारों, साहित्यकारों और रंगकर्मियों ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम की शुरुआत मुंशी प्रेमचंद के चित्र पर श्रद्धा-सुमन अर्पित कर पुष्पांजलि के साथ हुई। इस संगोष्ठी का मुख्य विषय "वर्तमान समय में प्रेमचंद के साहित्य की प्रासंगिकता" रखा गया था। वक्ताओं के मुख्य विचार: साहित्य, यथार्थ और सामाजिक चेतना संगोष्ठी के दौरान उपस्थित विद्वानों और वक्ताओं ने प्रेमचंद के साहित्य और उनके सामाजिक दृष्टिकोण पर अपने विचार साझा किए: प्रेमचंद ने समाज को नई दिशा दी (नवाब आलम, महासचिव): नाट्य संस्था 'सूत्रधार' के महासचिव नवाब आलम ने बताया कि संस्था हर साल प्रेमचंद जयंती मनाती है। इस बार का विषय युवाओं को ध्यान में रखकर चुना गया है, ताकि नई पीढ़ी समकालीन संदर्भों में प्रेमचंद के साहित्य और उनके सामाजिक दृष्टिकोण को बेहतर ढंग से समझ सके। मानवता ...

राम लखन सिंह यादव कॉलेज में "प्रेमचंद का साहित्य और आज का वंचित समाज" विषय पर परिचर्चा आयोजित!

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  पटना, 31 जुलाई: राम लखन सिंह यादव कॉलेज, अनीसाबाद, पटना में मुंशी प्रेमचंद की जयंती के अवसर पर एक विशेष परिचर्चा का आयोजन किया गया। परिचर्चा का मुख्य विषय "प्रेमचंद का साहित्य और आज का वंचित समाज: दलित, शोषित और हाशिए के स्वर" तथा "21वीं सदी का भारत और प्रेमचंद का यथार्थ: क्या बदला और क्या आज भी वही है?" रहा। कार्यक्रम की अध्यक्षता महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. सुरेंद्र प्रसाद ने की, जबकि परिचर्चा का विषय प्रवेश प्रो. रोहित कुमार द्वारा कराया गया। पूरे कार्यक्रम का कुशल मंच संचालन प्रो. प्रसिद्ध कुमार ने किया। परिचर्चा को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने प्रेमचंद के साहित्य की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला: प्रो. राय श्री पाल सिंह ने कहा कि प्रेमचंद ने अपने समय की तमाम सामाजिक विसंगतियों पर करारा प्रहार किया था। उन्होंने 'निर्मला', 'गोदान' और 'पंच परमेश्वर' जैसी कालजयी कृतियों का उल्लेख करते हुए प्रेमचंद के सामाजिक चिंतन को रेखांकित किया। प्रो. (डॉ.) शंकर प्रसाद शाह ने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि प्रेमचंद ने केवल साहित्य ही नहीं रचा, बल्कि अपने ल...

समय की कसौटी पर खरा: समकालीन संदर्भ में प्रेमचंद का शब्द-संसार!

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   " साहित्य राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई नहीं, बल्कि उसके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है।" — मुंशी प्रेमचंद हिंदी साहित्य के क्षितिज पर मुंशी प्रेमचंद एक ऐसे प्रकाशपुंज हैं, जिनकी रचनाधर्मिता समय की सीमाओं को लांघकर हर युग में नई चेतना का संचार करती है। प्रायः कहा जाता है कि महान साहित्य वह है जो अपने समय का दस्तावेज़ होते हुए भी कालजयी हो। प्रेमचंद का साहित्य इसी कसौटी पर शत-प्रतिशत खरा उतरता है। उन्होंने आज से लगभग एक शताब्दी पूर्व जिस समाज, जिन समस्याओं और जिन मानवीय संवेदनाओं को अपनी लेखनी का विषय बनाया, वे समस्याएँ रूप बदलकर आज भी हमारे सम्मुख खड़ी हैं। 1. यथार्थ के धरातल पर किसान और ग्रामीण जीवन प्रेमचंद को 'उपन्यास सम्राट' और 'कलम का सिपाही' यूँ ही नहीं कहा जाता; उन्होंने भारतीय गाँव की आत्मा को उसकी पूरी नग्नता और जीवंतता के साथ पहचाना था। ऋण और शोषण का दुष्चक्र: 'गोदान' का होरी केवल 1936 का एक भारतीय किसान नहीं है, बल्कि वह आज भी कर्ज़ के बोझ तले दबे, मौसम की मार झेलते और बाज़ार व्यवस्था के हाथों शोषित होते हर अन्नदाता का प्रतीक...

राजनीतिक भाषा का दोहरा मानदंड और समाज का दर्पण!

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    सभ्यता और भाषा के इतिहास में अशिष्टता कोई नया अध्याय नहीं है। बदलाव केवल जन-मानस की स्मृति और सुविधा अनुसार चुनी गई प्रतिक्रियाओं में आया है। भाषा केवल शब्दों से नहीं बनती; उसमें उस दौर की मानसिकता, समाज के द्वंद्व और राजनीतिक संस्कृति की स्पष्ट छाप होती है। अतीत के पन्नों को पलटें तो सत्ता और शीर्ष नेताओं के विरुद्ध उग्र और व्यक्तिगत कटाक्ष कोई अनहोनी घटना नहीं रहे हैं। अस्सी के दशक में जब सार्वजनिक मंचों या जन-संचार माध्यमों पर सत्ता-शीर्ष के विरुद्ध तीखी टिप्पणी या नारे गूँजते थे, तब समाज उन्हें भावी पीढ़ी के 'संस्कारों के पतन' के रूप में देखने के बजाय राजनीतिक माहौल की तात्कालिक प्रतिक्रिया मानता था। आपातकाल के दौर में लगे अश्लील नारे हों या बोफोर्स प्रकरण के समय गूँजती उक्तियाँ, बच्चों ने उन शब्दों को गढ़ा नहीं था, बल्कि केवल उस माहौल से उधार लिया था जिसमें वे सांस ले रहे थे। बच्चे या युवा स्वयं भाषा का सृजन नहीं करते, वे केवल अपने परिवेश का प्रतिध्वनित रूप होते हैं। अतीत में जब व्यंग्य और तीखे आक्रमण राजनीतिक बहस का हिस्सा थे, तब उन्हें लोकतंत्र के स्वाभाविक उग्र रूप ...

सफलता का असली पैमाना: चरित्र और मानवीय संवेदनाएं!

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  आज के आधुनिक दौर में हमने सफलता के ऐसे मानदंड तय कर लिए हैं जो केवल बाहरी दुनिया और भौतिक वस्तुओं तक सीमित रह गए हैं। हम किसी व्यक्ति की सफलता का आकलन इस बात से करते हैं कि उसका बैंक बैलेंस कितना है, उसकी प्रसिद्धि का दायरा कितना बड़ा है, या उसके नाम के साथ कितनी बड़ी उपलब्धियां जुड़ी हैं। लेकिन क्या वास्तव में यही जीवन का अंतिम सत्य है? सच्ची सफलता का गणित उस दिन बदलेगा, जब समाज अपना नजरिया बदलेगा। बैंक खाते से पहले व्यवहार: भौतिक धन तो आता-जाता रहता है, लेकिन आपका सौम्य और आदरपूर्ण व्यवहार ही लोगों के दिलों में आपकी स्थायी जगह बनाता है। लोकप्रियता से पहले ईमानदारी: केवल प्रसिद्ध होना काफी नहीं है, बल्कि सत्य और निष्ठा के मार्ग पर चलना अधिक मूल्यवान है। क्षणिक प्रसिद्धि की तुलना में ईमानदारी से मिला सम्मान जीवन भर साथ रहता है। उपलब्धियों से पहले मानवीय संवेदनाएं: आपकी डिग्री और पद तब तक बेमानी हैं जब तक आपके भीतर दूसरों के दर्द को समझने और उनकी मदद करने की करुणा नहीं है। एक संवेदनशील और संवेदनशील इंसान बनना किसी भी उपलब्धि से बड़ा है। हमें यह याद रखना होगा कि चरित्र ही मनुष्य की...

जे.एन.एल. कॉलेज में 'भारतीय मनोविज्ञान दिवस' पर भाषण प्रतियोगिता आयोजित, छात्रों ने जाने भारतीय ज्ञान परंपरा के रंग!

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  पटना: जगत नारायण लाल (जे.एन.एल.) कॉलेज के काउंसलिंग सेल और मनोविज्ञान विभाग के संयुक्त तत्वावधान में 29 जुलाई 2026 को 'भारतीय मनोविज्ञान दिवस' का आयोजन बड़े ही उत्साह के साथ किया गया। इस अवसर पर विद्यार्थियों के लिए एक विशेष भाषण प्रतियोगिता आयोजित की गई, जिसमें छात्रों ने भारतीय मनोविज्ञान के इतिहास और इसमें दिग्गजों के योगदान पर अपने विचार रखे। कार्यक्रम में विषय की गहराई और भारतीय ज्ञान परंपरा पर विस्तार से चर्चा हुई। भारतीय ज्ञान परंपरा और मनोविज्ञान का गहरा संबंध कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए काउंसलिंग सेल की नोडल ऑफिसर डॉ. किरण बाला ने भारतीय ज्ञान परंपरा में मनोविज्ञान की सदियों पुरानी भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि किस तरह भारतीय दर्शन और प्राचीन ज्ञान में मन, चेतना और व्यवहार को समझने के गहरे आयाम मौजूद हैं। इसके बाद मनोविज्ञान विभाग की विभागाध्यक्ष एवं सहायक प्राध्यापिका डॉ. अर्चना भारती ने भारत में आधुनिक मनोविज्ञान के इतिहास और इसके विकास यात्रा की जानकारी दी। उन्होंने डॉ. नरेंद्र नाथ सेन गुप्ता, डॉ. गिरीन्द्रशेखर बोस और डॉ. जे.पी. दास जैसे महान भारतीय मन...

दलित सम्मान पर चोट और भाजपा की दिखावटी राजनीति: श्रेयसी सिंह प्रकरण का आलोचनात्मक विश्लेषण!

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  भारतीय लोकतंत्र और संवैधानिक व्यवस्था का मूल आधार समानता, बंधुत्व और हर नागरिक की गरिमा का सम्मान है। किंतु हाल ही में बिहार सरकार की खेल मंत्री श्रेयसी सिंह से जुड़ा एक घटनाक्रम यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या यह संवैधानिक मूल्य सिर्फ भाषणों और शपथ पत्रों तक ही सीमित रह गए हैं? राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के बिहार प्रदेश प्रवक्ता एजाज अहमद द्वारा उठाए गए सवाल न केवल एक राजनीतिक बयानबाजी हैं, बल्कि वे समाज के सबसे वंचित वर्ग—दलित समाज—के प्रति सत्तासीन दल के रवैये पर एक गहरा प्रश्नचिह्न खड़ा करते हैं। इवेंट-जीवित राजनीति और जमीनी हकीकत राजनीतिक लाभ और प्रचार के लिए 'इवेंट' तैयार करना वर्तमान दौर की राजनीति का एक अहम हिस्सा बन चुका है। मंत्री श्रेयसी सिंह द्वारा दलित समाज की बच्चियों को मिठाई खिलाने का कार्यक्रम भी कुछ ऐसा ही प्रतीत होता है। जब तक कैमरे की नज़र मंत्री पर थी और वे स्वयं बच्चियों को मिठाई खिला रही थीं, तब तक सब कुछ एक आदर्श 'सोशल इंजीनियरिंग' और 'दलित प्रेम' का उदाहरण लग रहा था। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम का दुखद और सबसे घिनौना पहलू तब सामने आया जब उसी...

भारत में बढ़ते अति-अमीर और कर व्यवस्था का बदलता परिदृश्य!

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  भारत की अर्थव्यवस्था में हाल के वर्षों में कई महत्वपूर्ण और संरचनात्मक बदलाव देखने को मिले हैं। हाल ही में भारत सरकार द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2024-25 के लिए 576 करदाताओं ने ₹100 करोड़ से अधिक की आय घोषित की है। यह आंकड़ा पिछले वर्ष की तुलना में लगभग एक-तिहाई (एक तिहाई से अधिक) की वृद्धि दर्शाता है। यह रुझान न केवल देश में 'सुपर-रिच' यानी उच्च आय वर्ग की बढ़ती संख्या को रेखांकित करता है, बल्कि देश की आयकर व्यवस्था की बढ़ती पारदर्शिता और विश्वसनीयता को भी साबित करता है। अति-अमीरों की संख्या में यह इजाफा इस बात का प्रमाण है कि देश में कर संरचना व्यावहारिक और पारदर्शी बन रही है। यह उन तर्कों का खंडन करता है कि अति-अमीर करों के बोझ से बचने के लिए देश छोड़ रहे हैं। आयकर विभाग की कठोर निगरानी, डिजिटल प्रक्रियाओं और सरलीकृत व्यवस्थाओं ने करदाताओं को खुलकर आय घोषित करने के लिए प्रोत्साहित किया है। हालाँकि, केवल अति-अमीरों का दायरा ही नहीं बढ़ा है, बल्कि आयकर रिटर्न दाखिल करने वाले सामान्य नागरिकों की संख्या में भी वृद्धि दर्ज की गई है। रिपोर्ट के अनुसार, भार...

146वीं प्रेमचंद जयंती 2026: जानिए इस विशेष संगोष्ठी और आयोजन का पूरा विवरण!

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  हिंदी साहित्य के महान कथाकार और उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद जी की जयंती हर साहित्य प्रेमी के लिए एक विशेष पर्व की तरह होती है। इस वर्ष 'सूत्रधार' (स्थापित-1979) संस्था द्वारा मुंशी प्रेमचंद जी की 146वीं वर्षगांठ के अवसर पर एक विशेष संगोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है। यदि आप साहित्य में रुचि रखते हैं और प्रेमचंद जी की रचनाओं और विचारों को नए दृष्टिकोण से समझना चाहते हैं, तो यह कार्यक्रम आपके लिए एक बेहतरीन अवसर है। संगोष्ठी का विषय इस वर्ष आयोजित होने वाली संगोष्ठी का मुख्य विषय है: “वर्तमान समय में प्रेमचंद के साहित्य की प्रासंगिकता” बदलते सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिवेश में मुंशी प्रेमचंद की कालजयी कृतियां आज भी हमारे समाज और सरोकारों को कितनी गहराई से छूती हैं, इसी विषय पर प्रबुद्ध वक्ता अपने विचार साझा करेंगे। कार्यक्रम की संपूर्ण जानकारी दिनांक: 31 जुलाई 2026 समय: संध्या 04:00 बजे स्थान: सूत्रधार कार्यालय, जमालुद्दीन चक, खगौल संपर्क एवं अधिक जानकारी यदि आप इस आयोजन में भाग लेना चाहते हैं या कार्यक्रम से जुड़ी अन्य जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए विवरण ...

नेउरा-दनियावाँ रेल खंड: क्या बाबूचक-मोहम्मदपुर में बनेगा 'शहीद जयगोविंद सिंह यादव रेलवे स्टेशन'?

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  पूर्व मध्य रेलवे (दानापुर मंडल) के अंतर्गत नेउरा-दनियावाँ नई रेल लाइन का काम तेजी से आगे बढ़ रहा है। लेकिन इस नई रेल लाइन के शुरू होने के साथ ही स्थानीय ग्रामीणों और यात्रियों की सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए एक बेहद महत्वपूर्ण माँग सामने आई है। हाल ही में स्थानीय निवासी प्रसिद्ध कुमार (ग्राम- बाबूचक, पटना) ने भारत सरकार के माननीय रेल मंत्री श्री अश्विनी वैष्णव जी को पत्र लिखकर 'बाबूचक-मोहम्मदपुर' के पास एक नए स्टेशन के निर्माण और उसके नामकरण अमर शहीद जयगोविंद सिंह यादव के नाम पर करने का आग्रह किया है। 1. स्टेशनों की दूरी और भौगोलिक आवश्यकता वर्तमान रेल योजना के अनुसार: नेउरा और जट-डुमरी के बीच की दूरी लगभग 18.2 किलोमीटर है। इस दूरी के बीच केवल 'गोनपुरा' में स्टेशन प्रस्तावित है। नेउरा और गोनपुरा के ठीक बीचों-बीच (लगभग 7 किमी) 'बाबूचक-मोहम्मदपुर' स्थित है। भौगोलिक और तकनीकी दृष्टि से बाबूचक-मोहम्मदपुर एक ऐसा केंद्र है जहाँ स्टेशन बनने से आस-पास के दर्जनों गाँवों को सीधा लाभ मिलेगा। 2. पटना AIIMS और दानापुर पहुँचना होगा बेहद आसान बाबूचक-मोहम्मदपुर मुख्य पुरैनि...

शिक्षा का राजनीतिकरण और वैज्ञानिक चेतना का क्षरण: प्रतीकवाद बनाम वास्तविक सुधार! -प्रो प्रसिद्ध कुमार।

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  शिक्षा केवल भवनों का निर्माण या नामांकरण का खेल नहीं है; यह किसी राष्ट्र के भविष्य की रीढ़ और बालमन की सोच को गढ़ने का सबसे सशक्त माध्यम है। हाल ही में राज्य के 551 स्कूलों में कक्षा 9 से 12 तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के नाम पर 'सरस्वती विद्या निकेतन' की अवधारणा लाने और परिसरों के रंग-रोगन को लेकर जो नीतियां सामने आ रही हैं, वे शिक्षा के मूल उद्देश्यों पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं। यद्यपि सरकार का यह स्पष्टीकरण राहत देने वाला है कि दानदाताओं और स्वतंत्रता सेनानियों के नाम पर बने स्कूलों के नाम नहीं बदले जाएंगे, परंतु शिक्षा व्यवस्था के प्रतीकात्मक ढर्रे और विचारधारात्मक बदलाव की कोशिशों पर एक गंभीर बहस की आवश्यकता है। जिस देश में महात्मा ज्योतिबा फुले, माता सावित्रीबाई फुले और फ़ातिमा शेख जैसे समाज सुधारकों ने असीम यातनाएं और सामाजिक बहिष्कार सहकर बालिकाओं एवं वंचितों के लिए शिक्षा के द्वार खोले, आज उनके व्यावहारिक संघर्ष और वैज्ञानिक चेतना को नेपथ्य में धकेला जा रहा है। शिक्षा का ध्येय तर्क, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और खोजी मानसिकता का विकास करना है। जब शैक्षणिक संस्थानों में वास्तविक...

बांकीपुर में तेजस्वी यादव का रोड शो: छात्रों पर फायरिंग को लेकर सरकार पर बरसे, न्यायिक जांच और रिहाई की मांग!

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  फुलवारी शरीफ , अजीत कुमार की रिपोर्ट : बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) की प्रत्याशी रेखा गुप्ता के समर्थन में सोमवार को नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी प्रसाद यादव ने एक विशाल रोड शो किया। यह रोड शो मीठापुर से शुरू होकर चांदपुर बेला, सिपारा, विग्रहपुर, पोस्टल पार्क, चिरैयाटांड़ पुल, गोरिया टोली, लालजी टोला, पीरमुहानी, आयुर्वेदिक कॉलेज, लोहानीपुर, साहित्य सम्मेलन, दरियापुर और खेतान मार्केट होते हुए सब्जीबाग चौराहा तक पहुंचा। इस दौरान सड़कों पर राजद समर्थकों का भारी हुजूम उमड़ पड़ा। रोड शो के बाद मीडिया से बातचीत करते हुए तेजस्वी यादव ने राज्य सरकार पर जोरदार हमला बोला और बांकीपुर की जनता का रुख बताते हुए कहा, "जनता ने इस बार भाजपा को हराने का मन बना लिया है। इस बार बांकीपुर में लालटेन ही जलेगा।" छात्र आंदोलन पर सरकार को घेरा छात्र आंदोलन और हालिया कार्रवाई पर राज्य सरकार को आड़े हाथों लेते हुए तेजस्वी ने कहा कि सरकार पहले किसानों को ठग रही थी और अब छात्रों के साथ अन्याय कर रही है। उन्होंने सरकार को अल्टीमेटम देते हुए कहा कि यदि सोमवार शाम तक गिरफ्तार छात्रों को...

राम लखन सिंह यादव कॉलेज में बीए सेमेस्टर-1 के नवागत छात्रों का हुआ आत्मीय स्वागत, नियमित कक्षाओं और नैतिक मूल्यों पर दिया गया जोर!

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  पटना, 27 जुलाई 2026: राम लखन सिंह यादव कॉलेज, अनीसाबाद, पटना-2 में स्नातक प्रथम वर्ष (बीए सेमेस्टर-1, सत्र 2026-2030) के नवप्रवेशित विद्यार्थियों के शैक्षणिक सफर की शुरुआत के उपलक्ष्य में सोमवार को एक भव्य शिक्षक-छात्र सम्मेलन का आयोजन किया गया। सुबह 10:30 बजे आयोजित इस कार्यक्रम में कॉलेज के प्राध्यापकों ने नवागत छात्रों का गर्मजोशी से स्वागत किया। यह महत्वपूर्ण सम्मेलन कॉलेज की उप-प्राचार्या प्रो. संगीता कुमारी की अध्यक्षता में और प्रो. प्रसिद्ध कुमार के कुशल संचालन में सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। सम्मेलन के दौरान प्राध्यापकों ने छात्रों का मार्गदर्शन करते हुए उन्हें नियमित रूप से कक्षाओं में उपस्थित रहने की सलाह दी। वक्ताओं ने पठन-पाठन के साथ-साथ स्वाध्याय (स्व-अध्ययन), मौलिक रचनाओं और नैतिक मूल्यों (Moral Values) के महत्व पर विशेष जोर दिया। शिक्षकों ने कहा कि अनुशासन और निरंतरता ही एक सफल छात्र जीवन की नींव है। कार्यक्रम के दौरान नवप्रवेशित विद्यार्थियों ने भी अपने विचार खुलकर रखे और कॉलेज में मिले इस आत्मीय स्वागत के प्रति आभार जताया। छात्रों ने प्राध्यापकों की प्रेरणादायी बातों...

लोक-संवेदना का अमर उल्लास: 'गबरघिचोर' के बहाने! -समीक्षक: प्रो. प्रसिद्ध कुमार।

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    खगौल के नवनिर्मित सृजन प्रेक्षागृह में भिखारी ठाकुर की नाट्य-चेतना और स्त्री-पीड़ा का सजीव प्रकटीकरण !  स्थान: सृजन प्रेक्षागृह, खगौल (पटना) प्रस्तुति: सूत्रधार | मूल नाटककार: भिखारी ठाकुर | निर्देशक: नवाब आलम रविवार की संध्या खगौल का नवनिर्मित सृजन प्रेक्षागृह भोजपुरी माटी के अमर शिल्पी और लोक-नाट्य के महानायक भिखारी ठाकुर की कालजयी नाट्य-चेतना से स्पंदित हो उठा। नाट्य-संस्था 'सूत्रधार' के तत्त्वावधान में आयोजित बहुचर्चित नाटक 'गबरघिचोर' के मंचन ने दर्शकों को भाव-विभोर कर दिया। अत्याधुनिक ध्वनि-प्रकाश व्यवस्था, कलात्मक चित्रों से सुसज्जित दीवारों और मखमली आभामंडल से युक्त यह प्रेक्षागृह स्वयं में रंगकर्म के एक नवीन युग के सूत्रपात का साक्षी बन रहा था। प्रेक्षकों के अपार जनसैलाब ने यह सिद्ध कर दिया कि डिजिटल युग की चकाचौंध में भी लोक-संस्कृति की जड़ें अत्यंत गहरी और अटूट हैं। गरिमामय परिवेश एवं अतिथियों की उपस्थिति समारोह का मंगलाचरण पारंपरिक दीप-प्रज्वलन तथा विशेष नाट्य-पुस्तिका के विमोचन के साथ हुआ। तत्पश्चात आगत अतिथियों को अंगवस्त्रम प्रदान कर सम्मानित किया गया।...

रंग-तरंग: जब खगौल के मंच पर 'गबरघिचोर' के साथ जीवंत हो उठी भिखारी ठाकुर की लोक-संस्कृती - प्रो. प्रसिद्ध कुमार की आँखों देखी !

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    पटना/खगौल। रविवार की शाम खगौल का नवनिर्मित सृजन प्रेक्षागृह तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज रहा था। मौका था भोजपुरी के शेक्सपियर कहे जाने वाले भिखारी ठाकुर के कालजयी लोकनाट्य 'गबरघिचोर' के प्रभावशाली मंचन का। चर्चित नाट्य संस्था 'सूत्रधार' द्वारा प्रस्तुत इस नाटक को देखने के लिए दर्शकों की ऐसी भीड़ उमड़ी कि हॉल खचाखच भर गया। आधुनिक सुख-सुविधाओं से लैस यह प्रेक्षागृह किसी बड़े थिएटर या मॉल से कम नहीं लग रहा था—मखमली फर्श, आरामदायक सीटें, शानदार लाइट-साउंड व्यवस्था और दीवारों पर उकेरी गई खूबसूरत चित्रकारी ने रंगकर्म के माहौल को और भी भव्य बना दिया था। गरिमामय शुरुआत और सम्मान कार्यक्रम की शुरुआत अतिथियों द्वारा दीप प्रज्ज्वलन और एक विशेष पुस्तिका के विमोचन के साथ हुई। उपस्थित सभी अतिथियों को अंगवस्त्र प्रदान कर सम्मानित किया गया। फ्रंट सीट पर बैठकर नाटक का आनंद ले रहे अतिथियों में जेएनएल कॉलेज की प्राचार्य सह प्रख्यात साहित्यकार प्रो. (डॉ.) मधु प्रभा सिंह पूरी तन्मयता के साथ कलाकारों का हौसला बढ़ा रही थीं। एक महिला और साहित्यकार के नाते मंच पर उकेरी जा रही स्त्री-वेदना उ...

राजनीति का भंवर और छात्र आक्रोश: धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की पूरी कहानी!

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  केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा भारतीय राजनीति और छात्र आंदोलनों के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ बनकर उभरा है। देश भर में परीक्षा पत्रों के लीक होने की घटनाओं और छात्रों के लगातार बढ़ते विरोध प्रदर्शनों के बाद, अंततः नरेंद्र मोदी सरकार पर बने भारी दबाव के कारण उन्हें अपने पद से त्यागपत्र देना पड़ा। GenZ (युवा पीढ़ी) के इस प्रचंड विरोध ने एक बार फिर साबित कर दिया कि युवाओं की चिंताएं सत्ता के समीकरणों पर भारी पड़ सकती हैं। राजनीति में निरंतर बढ़त और पारिवारिक पृष्ठभूमि 1969 में ओडिशा के तालचर में जन्मे धर्मेंद्र प्रधान का संबंध लंबे समय से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े परिवार से रहा है। उनके पिता देबेंद्र प्रधान भी संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ता और वाजपेयी सरकार में मंत्री रह चुके थे। धर्मेंद्र प्रधान ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) से की और बाद में भारतीय जनता युवा मोर्चा (BJYM) के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। उत्कल विश्वविद्यालय से एंथ्रोपोलॉजी (मानव विज्ञान) में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल करने वाले प्रधान ने 2000 में ओडिशा वि...

हरित भविष्य की ओर: धान की खेती और पर्यावरण का संतुलन !

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      भारत दुनिया के सबसे बड़े चावल उत्पादक देशों में से एक है, जो वैश्विक खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हालांकि, हालिया अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों (जैसे Nature Food) से यह बात सामने आई है कि पारंपरिक सिंचित धान के खेत वैश्विक स्तर पर मीथेन उत्सर्जन के प्रमुख स्रोतों में शामिल हो चुके हैं। यह इस चुनौती के प्रमुख कारणों, इसके वैज्ञानिक पहलुओं और उन प्रेरणादायक तकनीकों पर प्रकाश डालता है, जिनके माध्यम से भारत अपनी खाद्य सुरक्षा को बनाए रखते हुए पर्यावरण संरक्षण का नया मार्ग प्रशस्त कर सकता है। उत्सर्जन में वृद्धि: 1960 के दशक के बाद से धान की खेती से होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में दोगुनी वृद्धि देखी गई है। वैश्विक स्तर पर धान के खेतों से प्रतिवर्ष लगभग 1.1 अरब टन CO₂-समकक्ष गैसों का उत्सर्जन होता है। भारत की स्थिति: भारत में सिंचित धान के खेत सालाना लगभग 3.9 करोड़ टन मीथेन का उत्सर्जन करते हैं, जो जर्मनी के कुल वार्षिक मीथेन उत्सर्जन से भी अधिक है। खेतों में लगातार जलभराव जिससे ऑक्सीजन-रहित परिस्थितियाँ बनती हैं और मीथेन बनाने वाले सूक्ष...

ज़ूफार्माकोग्नोसी: जब जानवर स्वयं बनते हैं अपने चिकित्सक!

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  प्रकृति ने जीवों को केवल जीवन ही नहीं दिया, बल्कि स्वास्थ्य और उपचार का ज्ञान भी उनके सहज व्यवहार (Instinct) में समाहित किया है। विज्ञान की भाषा में इस प्रक्रिया को ज़ूफार्माकोग्नोसी (Zoopharmacognosy) कहा जाता है, जिसका सीधा अर्थ है—पशु-पक्षियों और अन्य जीवों द्वारा आत्म-उपचार (Self-medication) के लिए वनस्पतियों और प्राकृतिक तत्वों का उपयोग करना। स्व-उपचार के अद्भुत उदाहरण ओरंगुटान का देसी इलाज: इंडोनेशिया के मध्य कालीमंतन स्थित सेबंगु जंगल में ओरंगुटान 'ड्राकेना' (Dracaena) नाम के पौधे की पत्तियों को अपनी लार के साथ मिलाकर पेस्ट बनाते हैं। वे इस पेस्ट को शरीर पर लगाते हैं ताकि मांसपेशियों का दर्द, जोड़ों की अकड़न और त्वचा संबंधी समस्याएं दूर हो सकें। शालपर्णी और चिंपैंजी: नाइजीरिया में चिंपैंजी 'डेस्मोडियम गैंगेटिकम' (Desmodium gangeticum या शालपर्णी) की पत्तियों को निगलकर अपनी त्वचा पर मौजूद परजीवियों से छुटकारा पाते हैं। दिलचस्प बात यह है कि प्राचीन आयुर्वेद में भी महर्षि सुश्रुत जैसे वैद्यों ने इस पौधे का उपयोग दमा, बवासीर और टाइफाइड जैसी बीमारियों के इलाज के लिए...

माता-पिता को खोने का असमय डर और आज की पीढ़ी !

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   माता-पिता: हमारे जीवित अभिलेखागार!  माता-पिता की मृत्यु जीवन की सबसे अटल सच्चाइयों में से एक है। इसके बावजूद, आज के मिलेनियल्स और जेन-जी के लिए यह केवल एक प्राकृतिक घटना नहीं, बल्कि एक स्थायी और डरावनी चिंता बन चुकी है। दूर देशों में बैठकर अपने माता-पिता के स्वास्थ्य डेटा (स्मार्टवॉच और सेंसर) पर लगातार नजर रखना, दवाइयों का स्टॉक बनाए रखना, करियर के बड़े फैसलों को टालना या उन्हें पीछे छोड़ देना—आज की पीढ़ी इस कड़वे सच को टालने के लिए सब कुछ कर रही है। हालांकि, इस पूरी जद्दोजहद के पीछे एक सबसे बड़ा खौफ यह है कि जिस दिन माता-पिता नहीं रहेंगे, उस दिन वे किसी के "बच्चे" नहीं रहेंगे और जीवन की अग्रिम पंक्ति पर आकर खड़े हो जाएंगे। एक समय था जब माता-पिता की मृत्यु का विचार वयस्कता के उत्तरार्ध में आता था, जब बच्चे खुद जीवन के परिपक्व चरण में होते थे। लेकिन आज स्थिति बदल चुकी है। 20 से 40 वर्ष की आयु के बीच के युवा अत्यधिक एंग्जायटी और इस असमय डर का सामना कर रहे हैं। कुछ लोग अपने माता-पिता की सुरक्षा को लेकर इतने आशंकित हैं कि उन्होंने घरों में कैमरे और स्मार्ट डिवाइसेस लगवा ल...

अपलिट (UpLit): जब किताबें बनती हैं जीवन का मरहम!

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  आज की भागदौड़ भरी, तनावपूर्ण और शोर-शराबे से भरी ज़िंदगी में लोग सुकून और मानसिक शांति की तलाश में किताबों की ओर रुख कर रहे हैं। इसी रुझान ने साहित्य की दुनिया में एक नए और तेज़ी से उभरते जॉनर (Genre) को जन्म दिया है, जिसे 'UpLit' (Uplifting Literature), कम्फर्ट फिक्शन या हीलिंग फिक्शन कहा जा रहा है। ये ऐसी किताबें हैं जो पाठक को किसी सनसनीखेज सस्पेंस या भारी-भरकम ड्रामा में उलझाने के बजाय, उन्हें मानसिक संबल, आशा और आत्म-सहानुभूति का अहसास कराती हैं। क्या है 'हीलिंग फिक्शन' या अपलिट? अपलिट ऐसी कहानियाँ हैं जो सीधे तौर पर आत्म-सुधार (Self-help) की किताबें नहीं हैं, लेकिन पाठक के दिल को छूकर एक उपचारात्मक (healing) अनुभव देती हैं। जापानी साहित्य में इसे 'इयाशि केई' (Iyashikei) यानी 'भावनात्मक रूप से स्वस्थ करने वाली कहानियाँ' कहा जाता है। इन कहानियों में आमतौर पर: साधारण जीवन के किस्से: रोज़मर्रा की छोटी-छोटी घटनाएँ, खाना बनाना, कॉफी की महक और पुरानी किताबों की दुकानों का वर्णन। सहानुभूति और जुड़ाव: दयालुता, दूसरे मौकों (second chances), नए रिश्तों और प...

मैं दिल्ली का जंतर-मंतर हूँ! - प्रो प्रसिद्ध कुमार।

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  समय के शिलालेख पर लिखी जनक्रांति और सत्ता के परिवर्तन की अमर गाथा!  1. स्थापत्य से क्रांति तक का सफर मैं केवल पत्थर, चूने और ईंटों से खड़ा कोई लाल-गुलाबी ढाँचा मात्र नहीं हूँ; मैं काल के गाल पर उकेरा गया इतिहास का एक जीवंत हस्ताक्षर हूँ। १८वीं सदी की शुरुआत में (सन १७२४), महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने मुझे नक्षत्रों की गति नापने, समय की चाल को समझने और खगोलशास्त्र के रहस्यों को सुलझाने के लिए गढ़ा था। मेरे सम्राट यंत्र, जय प्रकाश यंत्र और राम यंत्र सदियों से तारों और ग्रहों से बातें करते आ रहे हैं। पर समय का चक्र बदला, और खगोलशास्त्र की गणना करने वाली मेरी दीवारें देश की राजनीति और जन-आंदोलनों की दिशा तय करने लगीं। तारों की चाल से शुरू हुआ मेरा सफर, सत्ता की चाल बदलने का सबसे बड़ा केंद्र बन गया। "मैं वो वेधशाला हूँ जो सिर्फ़ आसमान के तारे नहीं गिनती, बल्कि धरातल पर तख्तो-ताज की किस्मत भी नापती है।" 2. सत्ता के गुरूर को तोड़ती मेरी ज़मीन मेरे आगोश में आज़ादी के बाद के भारत का संपूर्ण इतिहास और धड़कता हुआ वर्तमान समाहित है। जब-जब सत्ता के गलियारों में निरंकुशता ने जन्म लिया, ...

लोकतंत्र में जनशक्ति की विजय: जब छात्र आंदोलन के आगे झुकी सत्ता ! -प्रो प्रसिद्ध कुमार।

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   जन-आकांक्षाएँ, प्रशासनिक जवाबदेही और लोकतंत्र में आम आदमी की शक्ति।  लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि इसमें सत्ता का अंतिम स्रोत कोई पद, महल या व्यवस्था नहीं, बल्कि इस देश का आम नागरिक होता है। जब-जब सत्ता अपने कर्तव्यों से विमुख होती है या प्रशासनिक खामियों के कारण आम जनमानस—विशेषकर युवाओं का भविष्य—अंधकार में जाने लगता है, तब-तब यही लोकतंत्र अपनी वास्तविक ताकत दिखाता है। हाल ही में NEET-UG परीक्षा विवाद के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा इसी लोकतांत्रिक शक्ति का एक सजीव प्रमाण है। पृष्ठभूमि: जब सड़कों पर उतरा देश का भविष्य NEET जैसी देश की सबसे बड़ी और संवेदनशील परीक्षाओं में धांधली, पेपर लीक और अनियमितताओं के आरोपों ने लाखों परीक्षार्थियों और उनके परिवारों को झकझोर कर रख दिया था। दिल्ली के जंतर-मंतर पर शुरू हुआ छात्रों का आंदोलन केवल एक विरोध प्रदर्शन नहीं था, बल्कि वह देश के उस युवा का आक्रोश था जिसकी मेहनत पर व्यवस्था की कमियों का पानी फिर रहा था। महीनों तक धूप, बारिश और अनिश्चितता के बीच जंतर-मंतर पर डटे छात्रों और उनके समर्थकों ने ...

1/29 बिहार बटालियन NCC, पटना द्वारा राम लखन सिंह यादव कॉलेज में 'टीबी मुक्त भारत अभियान' का भव्य आयोजन!

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पटना । 25 जुलाई 26 राम लखन सिंह यादव कॉलेज, अनीसाबाद (पटना) के तत्वावधान में 1/29 बिहार बटालियन NCC, पटना द्वारा "टीबी मुक्त भारत अभियान" के अंतर्गत एक भव्य जन-जागरूकता कार्यक्रम का सफल आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य समाज में टीबी (क्षय रोग) के प्रति जागरूकता फैलाना, इसके समय पर इलाज और रोकथाम के उपायों से आमजन को अवगत कराना था। यह पूरा अभियान Associate NCC Officer Lt. Mukesh Kumar Yadav के कुशल मार्गदर्शन में संपन्न हुआ। कार्यक्रम में महाविद्यालय के माननीय प्राचार्य प्रो. सुरेन्द्र प्रसाद के साथ डॉ. शंकर प्रसाद साहा, प्रो. मनीष भारती, प्रो. हरेन्द्र कुमार, प्रो. सत्येन्द्र कुमार, प्रो. रोहित भारती, प्रो. रोहित कुमार, अन्य शिक्षकगण, एनसीसी कैडेट्स एवं विद्यार्थियों ने बढ़-चढ़कर एवं उत्साहपूर्वक भाग लिया। 🚶‍♂️ विशाल जागरूकता रैली का आयोजन कार्यक्रम के दौरान एक जन-जागरूकता रैली निकाली गई, जो राम लखन सिंह यादव कॉलेज परिसर से प्रारंभ होकर अनीसाबाद – चितकोहरा मार्ग से होते हुए पुनः महाविद्यालय परिसर में समाप्त हुई। हाथों में तख्तियां और बैनर लिए एनसीसी कैडेट्स ने ...

उत्तर क्रांति: जब यूनिवर्सिटी ने खत्म किया पेपर लीक का 'डिप्रेशन'!

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  प्रश्न पत्र के साथ answer भी।  शिक्षा जगत में रोज़ नए-नए प्रयोग होते रहते हैं, लेकिन राजस्थान यूनिवर्सिटी ने जो ऐतिहासिक कीर्तिमान स्थापित किया है, उसकी कल्पना तो स्वयं नोबेल पुरस्कार समिति ने भी नहीं की होगी। जहाँ देश भर के युवा 'पेपर लीक' के डर से अवसाद में चले जाते हैं, वहीं जयपुर की इस महान यूनिवर्सिटी ने समस्या की जड़ पर ही प्रहार कर दिया। ना रहेगा बाँस, ना बजेगी बंसुरी—और ना होगी लीक की टेंशन, जब प्रश्न पत्र के साथ उत्तर पत्र ही 'फ्री' होम डिलीवरी में मिल जाए! मामला एमए समाजशास्त्र के द्वितीय सेमेस्टर का है। परीक्षार्थी हाथों में पेन और दिमाग में डिप्रेशन लिए 'इंडियन सोसायटी' का पेपर देने पहुँचे थे। दिल की धड़कनें बढ़ी हुई थीं कि न जाने कौन सा कठिन सवाल सामने आ जाए। पर जैसे ही प्रश्न पत्र हाथ में आया, परीक्षार्थियों की आँखों से गंगा-जमुना बहने लगी—खुशी के आँसू! सवालों के नीचे बाकायदा थ्योरी और उत्तर छपे हुए थे, वो भी शायद किसी कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) की असीम अनुकंपा से। सोचिए, कितना क्रांतिकारी विचार है! छात्र को उत्तर याद करने की झंझट से मुक्ति। नकल कर...

आई लव यू खगौल! जलमग्न पथ, रेलवे का चकमा और एक भीगे शहर की प्रेमकथा — प्रो. प्रसिद्ध कुमार का एक रिपोर्ताज।

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  दानापुर रेलवे की चक्करघिनी!  जून की २५वीं तारीख़ थी और घड़ी में शाम के ठीक पाँच बज रहे थे। अंबर की नीलिमा को चीरते हुए कजरारे मेघों का एक घटाटोप घिर आया था। हवाएँ पूरे शबाब पर थीं, मानो प्रकृति किसी महातांडव की भूमिका रच रही हो। मैं अपनी जीवनसंगिनी के साथ दानापुर रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म संख्या ४ पर खड़ा था। नियति का खेल तो देखिए, इससे पहले वाली ट्रेन केवल इसलिए छूट गई क्योंकि उसका प्रस्थान प्लेटफॉर्म संख्या १A से होना मुक़र्रर हुआ था। अभी हम उस दंश से उबर ही रहे थे कि उद्घोषक (अनाउंसर) की देववाणी गूंजी—"दानापुर-झाझा पैसेंजर प्लेटफॉर्म संख्या १A से रवाना होगी।" रेलवे की लीला अपरंपार है! प्लेटफॉर्म संख्या ४ से १A की यात्रा करना किसी ओलंपिक भारोत्तोलक या मल्ल-योद्धा के पुरुषार्थ से कम नहीं। यात्रियों की सुरक्षा और सुविधा का रेलवे प्रशासन के लिए वही मोल है, जो पतझड़ में सूखे पत्तों का। आधा किलोमीटर की इस मैराथन दौड़ में रेलवे का धर्म केवल घोषणा करना है, यात्री पहुँचे या पस्त हो जाए—इससे साहिबान को क्या सरोकार? इंद्रदेव की असीम अनुकंपा बरस रही थी। तन-मन जलधाराओं में सराबोर हो...