राजनीति का 'पलटीमार' क्लाइमेक्स: नीतीश कुमार का सफर, सिद्धांतों से सत्ता के गलियारे तक !
भारतीय राजनीति अक्सर अपने आप में कई 'फिल्मों' का मिश्रण होती है—जिसमें ड्रामा, थ्रिलर और अचानक आने वाले क्लाइमेक्स की कोई कमी नहीं होती। लेकिन पिछले दो दशकों में नीतीश कुमार की राजनीतिक यात्रा ने जिस तरह के 'यू-टर्न' लिए हैं, उसने 'थ्री इडियट्स' के चतुर को भी पीछे छोड़ दिया है। कभी नरेंद्र मोदी के सबसे बड़े 'विकल्प' के रूप में देखे जाने वाले नीतीश बाबू, अब उसी नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल में 'शामिल' होने की दहलीज पर खड़े हैं। क्या यह उनकी लंबी राजनीतिक यात्रा का अंतिम पड़ाव है? या फिर सत्ता की बिसात पर एक और चाल? जब 'भोज' रद्द हुआ था, तब 'जज्बात' अलग थे याद है 2010 का वह दौर? पटना में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक थी। नीतीश जी ने भोज का न्योता दिया था। लेकिन एक होर्डिंग—जी हाँ, सिर्फ एक होर्डिंग—ने पूरा खेल बदल दिया। कोसी त्रासदी में गुजरात सरकार की सहायता के विज्ञापनों को देख नीतीश जी का 'पारा' सातवें आसमान पर पहुँच गया था। उस वक्त न केवल सहायता राशि वापस लौटा दी गई, बल्कि मोदी जी की उपस्थिति की आहट मात्...