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Showing posts from July, 2026

​राजनीति का 'पलटीमार' क्लाइमेक्स: नीतीश कुमार का सफर, सिद्धांतों से सत्ता के गलियारे तक !

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  ​भारतीय राजनीति अक्सर अपने आप में कई 'फिल्मों' का मिश्रण होती है—जिसमें ड्रामा, थ्रिलर और अचानक आने वाले क्लाइमेक्स की कोई कमी नहीं होती। लेकिन पिछले दो दशकों में नीतीश कुमार की राजनीतिक यात्रा ने जिस तरह के 'यू-टर्न' लिए हैं, उसने 'थ्री इडियट्स' के चतुर को भी पीछे छोड़ दिया है। कभी नरेंद्र मोदी के सबसे बड़े 'विकल्प' के रूप में देखे जाने वाले नीतीश बाबू, अब उसी नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल में 'शामिल' होने की दहलीज पर खड़े हैं। ​क्या यह उनकी लंबी राजनीतिक यात्रा का अंतिम पड़ाव है? या फिर सत्ता की बिसात पर एक और चाल? ​जब 'भोज' रद्द हुआ था, तब 'जज्बात' अलग थे ​याद है 2010 का वह दौर? पटना में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक थी। नीतीश जी ने भोज का न्योता दिया था। लेकिन एक होर्डिंग—जी हाँ, सिर्फ एक होर्डिंग—ने पूरा खेल बदल दिया। कोसी त्रासदी में गुजरात सरकार की सहायता के विज्ञापनों को देख नीतीश जी का 'पारा' सातवें आसमान पर पहुँच गया था। उस वक्त न केवल सहायता राशि वापस लौटा दी गई, बल्कि मोदी जी की उपस्थिति की आहट मात्...

अज्ञान का सत्ता-केंद्र: - पत्रकार अशोक बाजपेयी !

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    ​"आज अज्ञान देहरादून की गलियों से, चांदनी चौक से नहीं, लालकिले से चढ़कर बोल रहा है।" ​इस कथन में बाजपेयी ने 'अज्ञान' के भौगोलिक और राजनीतिक विस्थापन को रेखांकित किया है।  पारंपरिक रूप से अज्ञान को एक व्यक्तिगत या अनपढ़ होने की स्थिति के रूप में देखा जाता था (जैसे गलियों या सामान्य बाजारों में)। बाजपेयी तर्क देते हैं कि अब अज्ञान केवल आम जनता के बीच सीमित नहीं है, बल्कि यह सत्ता के शीर्ष केंद्रों (लालकिले/संसद) से प्रसारित हो रहा है। ​देहरादून/चांदनी चौक: ये स्थान जन-साधारण, सामान्य जीवन या पुराने बौद्धिक केंद्रों के प्रतीक हैं। लेखक का कहना है कि अज्ञान अब यहाँ से नहीं फैल रहा। ​लालकिला: यह भारतीय सत्ता, नीति-निर्माण और राष्ट्र के सर्वोच्च नेतृत्व का प्रतीक है। जब सत्ता के गलियारों से अविवेकपूर्ण, तथ्यात्मक रूप से गलत या तर्कहीन बातें कही जाती हैं, तो वह 'अज्ञान' राष्ट्र-नीति का हिस्सा बन जाता है। यह कथन सत्ता द्वारा बौद्धिकता की अनदेखी और तर्कहीनता को बढ़ावा देने की प्रवृत्ति पर कटाक्ष है। जब शासक वर्ग या संस्थान तथ्यों के बजाय पूर्वाग्रहों और अल्पज्ञान स...

जन्मजात नागरिकता: अमेरिका का संवैधानिक संकट और भारतीय परिप्रेक्ष्य !

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    यह लेख अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के एक हालिया फैसले पर केंद्रित है, जिसमें अमेरिका में जन्में बच्चों को नागरिकता देने वाले जन्मजात नागरिकता कानून को बहुत ही कम अंतर (एक वोट) से बरकरार रखा गया है।  यह घटना अमेरिकी संवैधानिक व्यवस्था की नाजुकता को दर्शाती है। ​ट्रम्प प्रशासन ने एक कार्यकारी आदेश के माध्यम से उन बच्चों को नागरिकता देने से रोकने का प्रयास किया था जिनके माता-पिता गैर-नागरिक हैं। ​यह फैसला सुप्रीम कोर्ट की निष्पक्षता पर सवाल उठाता है, क्योंकि यह मामला राजनीतिक विचारधाराओं के ध्रुवीकरण के करीब पहुंच गया था।  यदि यह अधिकार समाप्त कर दिया जाता, तो यह न केवल मानवीय संकट पैदा करता बल्कि यह निर्धारित करना भी असंभव हो जाता कि कौन नागरिक है और कौन नहीं। ​अमेरिका और भारत दोनों लोकतंत्र हैं, लेकिन जन्मजात नागरिकता के प्रति दोनों का दृष्टिकोण काफी भिन्न है: ​कानूनी आधार: * अमेरिका: वहां का संविधान (14वां संशोधन) मुख्य रूप से 'मिट्टी के अधिकार' (Jus Soli) पर आधारित है, यानी जो अमेरिका की भूमि पर जन्मा, वह नागरिक है। ​भारत: भारत ने समय के साथ अपनी नीति को बदला है। स्वत...

​द 10-डिजिट प्रॉब्लम !

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     कैसे आधुनिक डिजिटल युग में हमारा फोन नंबर केवल संचार का साधन न रहकर, हमारी मुख्य डिजिटल पहचान  और प्रमाणीकरणकर्ता बन गया है। इंटरनेट के इस दौर में, अत्यधिक डेटा साझा करने से हमारी निजता खतरे में है। 'PleaseRobMe.com' का उदाहरण  हैं, जो दर्शाता है कि सार्वजनिक डेटा का दुरुपयोग सुरक्षा के लिए कितना खतरनाक हो सकता है। आज हमारे फोन नंबर का उपयोग बैंकों, टैक्स रिकॉर्ड्स, सब्सक्रिप्शन सेवाओं और ओटीपी आधारित सुरक्षा के लिए किया जाता है। ओटीपी हमारे फोन नंबर को एक 'पासवर्ड' के समान संवेदनशील बना देता है। फोन नंबर कई डेटाबेस में मौजूद होते हैं, जिससे उनके लीक होने की संभावना अधिक होती है। सिम फ्रॉड या फोन का नियंत्रण खोना किसी व्यक्ति के डिजिटल जीवन को पूरी तरह तबाह कर सकता है। हमें अपनी निजी जानकारी, विशेषकर फोन नंबर को साझा करने में बहुत सावधानी बरतनी चाहिए।  केवल व्यक्तिगत सतर्कता पर्याप्त नहीं है; सरकारों को 'डार्क पैटर्न' (डिजिटल धोखे) को रोकने के लिए सख्त डेटा संरक्षण नियम लागू करने चाहिए। ​फोन नंबर अब हमारी डिजिटल सुरक्षा की नींव बन गया है। इसे सुरक्षित ...

​थोक महंगाई: आर्थिक संकट की आहट!-प्रो प्रसिद्ध कुमार, अर्थशास्त्र विभाग।

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    ​हाल ही में वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों ने देश की आर्थिक स्थिति को लेकर चिंता बढ़ा दी है। मई 2026 में देश की थोक महंगाई दर में भारी उछाल दर्ज किया गया है, जो बढ़कर 9.68 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच गई है। अप्रैल 2026 में यह दर 8.3 प्रतिशत थी। केवल एक महीने के भीतर हुई यह बढ़ोतरी इस बात का स्पष्ट संकेत है कि अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर हालात सामान्य नहीं हैं। ​इस तेजी के पीछे मुख्य रूप से ईंधन और ऊर्जा क्षेत्र की कीमतों में हुई वृद्धि है। सरकार के नए आंकड़ों के अनुसार, इस क्षेत्र में महंगाई दर मई में 30.33 प्रतिशत तक पहुंच गई, जो अप्रैल में 24.89 प्रतिशत थी।  विशेष रूप से पश्चिम एशिया में चल रहा संघर्ष और वहां की अस्थिरता ने वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की आपूर्ति को प्रभावित किया है। भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई तेजी का सीधा असर भारत पर पड़ता है। ​महंगाई मापने के पारंपरिक तरीकों में भी बदलाव किए गए हैं। थोक महंगाई सूचकांक (WPI) का आधार वर्ष अब 2011-12 से बदलकर 2022-23 कर दिया ...

एक कलाकार की साधना और संघर्ष: उदय कुमार और उनकी कृति 'पचरंगा'! मेरे अनन्य मित्र -प्रो प्रसिद्ध कुमार।

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    ​ वे 1988 में राम लखन सिंह यादव कॉलेज (अनीसाबाद, पटना) से स्नातक किये थे।  ​कला के प्रति समर्पित जीवन और समाज के हर रंग को अपनी लेखनी में समेटने वाले खगौल के सुपुत्र उदय कुमार जी का नाम आज किसी परिचय का मोहताज नहीं है। एक मंझे हुए कलाकार, गायक और नाट्य लेखक के रूप में उन्होंने नाट्य की दुनिया में अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई है। ​कला के प्रति अटूट समर्पण ​1988 में राम लखन सिंह यादव कॉलेज (अनीसाबाद, पटना) से स्नातक करने वाले उदय जी ने अपने कला प्रेम के लिए दानापुर रेलवे की सुरक्षित और प्रतिष्ठित नौकरी को त्याग दिया। उनका पूरा जीवन मंच (Stage) के नाम रहा है। पटना के कालिदास रंगालय, एन.सी. घोष (खगौल) और प्रेमचंद रंगशाला जैसे प्रमुख मंचों से लेकर देश के कई राज्यों तक उन्होंने अपनी अभिनय क्षमता और नाट्य प्रस्तुतियों से दर्शकों का दिल जीता है। बिहार सरकार ने भी उनके इस अतुल्य योगदान के लिए उन्हें सम्मानित किया है। ​साहित्य की नई कड़ी: 'पचरंगा' ​उनकी नवीनतम कृति 'पचरंगा' समाज के विभिन्न पहलुओं और मानवीय संवेदनाओं का एक जीवंत दस्तावेज है। पुस्तक का आवरण ही यह बयां कर देता है क...