लोक-संवेदना का अमर उल्लास: 'गबरघिचोर' के बहाने! -समीक्षक: प्रो. प्रसिद्ध कुमार।

   


खगौल के नवनिर्मित सृजन प्रेक्षागृह में भिखारी ठाकुर की नाट्य-चेतना और स्त्री-पीड़ा का सजीव प्रकटीकरण ! 


स्थान: सृजन प्रेक्षागृह, खगौल (पटना)

प्रस्तुति: सूत्रधार | मूल नाटककार: भिखारी ठाकुर | निर्देशक: नवाब आलम

रविवार की संध्या खगौल का नवनिर्मित सृजन प्रेक्षागृह भोजपुरी माटी के अमर शिल्पी और लोक-नाट्य के महानायक भिखारी ठाकुर की कालजयी नाट्य-चेतना से स्पंदित हो उठा। नाट्य-संस्था 'सूत्रधार' के तत्त्वावधान में आयोजित बहुचर्चित नाटक 'गबरघिचोर' के मंचन ने दर्शकों को भाव-विभोर कर दिया।

अत्याधुनिक ध्वनि-प्रकाश व्यवस्था, कलात्मक चित्रों से सुसज्जित दीवारों और मखमली आभामंडल से युक्त यह प्रेक्षागृह स्वयं में रंगकर्म के एक नवीन युग के सूत्रपात का साक्षी बन रहा था। प्रेक्षकों के अपार जनसैलाब ने यह सिद्ध कर दिया कि डिजिटल युग की चकाचौंध में भी लोक-संस्कृति की जड़ें अत्यंत गहरी और अटूट हैं।

गरिमामय परिवेश एवं अतिथियों की उपस्थिति

समारोह का मंगलाचरण पारंपरिक दीप-प्रज्वलन तथा विशेष नाट्य-पुस्तिका के विमोचन के साथ हुआ। तत्पश्चात आगत अतिथियों को अंगवस्त्रम प्रदान कर सम्मानित किया गया।

प्रथम पंक्ति में विराजमान जे.एन.एल. कॉलेज की प्राचार्या व प्रख्यात साहित्यकार प्रो. (डॉ.) मधु प्रभा सिंह कलाकारों का उत्साहवर्द्धन करती दृष्टिगोचर हुईं। मंच पर प्रस्फुटित होती स्त्री-वेदना ने उनके मर्म को गहराई से स्पर्श किया। इनके साथ ही बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष डॉ. अनिल सुलभ, दानापुर मंडल के वरीय मंडल कार्मिक अधिकारी (Sr. DPO) अतुल कुमार, सहायक कार्मिक अधिकारी (APO)  , रेलवे उच्च माध्यमिक विद्यालय khagoul के प्रिंसिपल  ज्ञानेश्वर प्रसाद,  बालिगा मध्य विद्यालय के प्रिंसिपल मोहन  पासवाँ, लक्ष्मी पासवाँ, जितेंद्र ठाकुर, जितेंद्र वत्स, अशोक कुणाल,  मधेश्वेर विश्वकर्मा सहित रेलवे के अनेक वरिष्ठ अधिकारियों ने इस कलात्मक अनुभूति का रसास्वादन किया।

नाट्य-संवेदना: पलायन की विभीषिका और एकाकी स्त्री का संघर्ष

निर्देशक नवाब आलम के कुशल मार्गदर्शन में यह नाटक ग्रामीण भारत के उस कड़वे यथार्थ को उघाड़ता है, जहाँ जीविकोपार्जन हेतु पुरुषों का देशाटन/पलायन घर-आँगन को सूना कर देता है। इस विस्थापन के बीच एक स्त्री जिन सामाजिक उपेक्षाओं, लांछनों और विषम परिस्थितियों से जूझती है, उसी का मर्मस्पर्शी परिणाम 'गबरघिचोर' का चरित्र है। जब वह बालक वयस्क होता है, तो पितृत्व के दावों और सामाजिक कुंठाओं के बीच उसे 'अवैध' का कलंक देकर विवाद को पंचायत के प्रांगण तक घसीट लिया जाता है।

चरमोत्कर्ष : न्याय का मरुस्थल और वात्सल्य का भगीरथ प्रयास

नाटक का सर्वाधिक कारुणिक एवं भाव-विह्वल क्षण वह था जब पंचों ने अपनी न्याय-विवेकहीनता का परिचय देते हुए बालक को तीन टुकड़ों में विभक्त करने का निर्मम फरमान सुना दिया। इस अमानवीय निर्णय के समक्ष माँ का वात्सल्य चीत्कार कर उठा। अपनी संतान के प्राणों की रक्षा हेतु उस जननी ने सहर्ष अपने समस्त अधिकारों की तिलांजलि दे दी। माँ के इस त्यागमय और करुणापूरित रूप ने पंचों की चेतना को झकझोर कर रख दिया और अंततः न्याय की विजय 'गलीज बहू' के पक्ष में हुई।

अभिनय, लोक-संगीत एवं आंगिक सौन्दर्य

अभिनय-कौशल: पूर्व मध्य रेलवे की कमर्शियल क्लर्क सी.पी. सिंह (सिंपी सिंह) ने 'गलीज बहू' की आंतरिक वेदना और लोक-सादगी को जिस जीवंतता से रंगमंच पर उतारा, उसने दर्शकों की अश्रुधारा प्रवाहित कर दी। पंच के रूप में मिथिलेश कुमार पांडेय, 'गलीज' के रूप में मुकेश कुमार, 'गड़बड़ी' बने अमन कुमार, 'गबरघिचोर' की भूमिका में कुंदन कुमार तथा 'जल्लाद' के पात्र में प्रेम प्रकाश सैनिक ने अपने सशक्त अभिनय से चरित्रों में प्राण फूँक दिए।

संगीत व रूप-सज्जा: भिखारी ठाकुर का नाट्य-संसार लोक-संगीत के बिना अधूरा है। पृष्ठभूमि में गूंजते कोरस और पारंपरिक भोजपुरी लोकगीतों ने संपूर्ण वातावरण को एक अनूठी सांगीतिक लय में बाँध दिया। संगीत मंडली (अखिलेश सिंह, लवकुश कुमार, अभिजीत कुमार, शशि भूषण शर्मा, सऊद आलम, भोला सिंह, आसिफ हसन, राजीव रंजन त्रिपाठी, हुस्ना फातिमा व संजय गुप्ता) का प्रयास अत्यंत सराहनीय रहा। जयप्रकाश मिश्र की सूक्ष्म रूप-सज्जा ने पात्रों को यथार्थवादी ग्रामीण प्रामाणिकता प्रदान की।

उपसंहार

इस सांस्कृतिक संध्या में दानापुर नगर परिषद की पूर्व अध्यक्षा डॉ. अनु कुमारी, खगौल नगर परिषद के अध्यक्ष सुजीत कुमार, बड़ी खगौल देवी स्थान के अध्यक्ष अनिल गुप्ता, उमा शंकर गुप्ता, मनीष कुमार, दीनानाथ प्रसाद यादव, अस्तानंद, सोएब कुरैसी, तनवीरुल हक, पप्पू कुमार, मो. सादिक, जीशान आलम,  उमा शंकर गुप्ता,


दयानंद राय व सुनील कुमार सहित अनेक गणमान्य प्रबुद्धजन उपस्थित रहे। कार्यक्रम का सुचारू संयोजन एवं धन्यवाद ज्ञापन प्रो. प्रसिद्ध कुमार द्वारा संपन्न हुआ।

ईस्ट सेंट्रल रेलवे (ECR) द्वारा कला और संस्कृति को प्रदान किया गया यह आधुनिक मंच तथा कलाकारों की यह कालजयी प्रस्तुति इस बात की प्रत्यक्ष प्रमाण है कि भिखारी ठाकुर की रचनाएँ आज भी युग-सापेक्ष, प्रासंगिक और जन-जन के हृदय पर राज करने वाली हैं।

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