सुशासन की बलिवेदी पर 'सुशासन': जब बिहार में नौकरशाही भी अपराधियों के निशाने पर आ गई!
बिहार में 'सुशासन' का दावा लंबे समय से प्रशासनिक व्यवस्था और राजनीतिक मंचों का मुख्य नारा रहा है। लेकिन जब राज्य में कानून व्यवस्था की स्थिति इस कदर बिगड़ जाए कि जनता की रक्षा और नीति-निर्माण में लगे प्रशासनिक अधिकारी ही सुरक्षित न रहें, तो इस 'सुशासन' की खोखली दीवारों पर सवाल उठना स्वाभाविक है। औरंगाबाद में कार्यपालक पदाधिकारी (EO) की दिन-दहाड़े या निर्मम हत्या ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि राज्य में कानून का डर लगभग समाप्त हो चुका है और अपराधी बेखौफ होकर अपनी मनमर्जी चला रहे हैं। औरंगाबाद में EO की हत्या केवल एक व्यक्ति की हत्या नहीं है, बल्कि यह राज्य के प्रशासनिक इक़बाल पर करारा तमाचा है। जिस व्यवस्था में अधिकारी अपनी जान की सुरक्षा को लेकर चिंतित रहें, वहाँ आम जनता न्याय और सुरक्षा की उम्मीद किससे करे? जब विकास योजनाओं को लागू करने वाले और भ्रष्टाचार पर नकेल कसने वाले अफसरों की आवाज गोलियों की गूँज से दबा दी जाती है, तो यह स्पष्ट संकेत है कि सत्ता का नियंत्रण नेताओं के हाथों से फिसलकर 'समानांतर सत्ता' चलाने वाले अपराधियों के हाथों में चला गया है। और...