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Showing posts from August, 2026

कानून का ढोंग और व्यवस्था की गहरी नींद !

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  वर्ष 2012 के निर्भया कांड के बाद कानूनों को सख्त बनाया गया और बलात्कार की परिभाषा को व्यापक किया गया। लेकिन 2013-2019 के आंकड़े और हालिया घटनाएं यह साबित करती हैं कि केवल कानून की धाराएं बदलने से जमीनी हकीकत नहीं बदलती। जब तक कानून का खौफ सड़कों पर नहीं दिखेगा, ये बदलाव महज़ कागज़ी औपचारिकता बनकर रह जाएंगे। नोएडा के परी चौक से दिल्ली के कश्मीरी गेट तक एक निजी बस में रात भर नाबालिग बच्ची के साथ दरिंदगी होती रही, लेकिन रास्ते में न किसी पुलिस गश्त की नज़र पड़ी, न नाकेबंदी पर बस रोकी गई और न ही सीसीटीवी निगरानी का कोई फायदा मिला। यह सुरक्षा एजेंसियों और पुलिसिंग सिस्टम की अक्षमता और घोर लापरवाही को नग्न रूप में उजागर करता है। देश की राजधानी होने के बावजूद दिल्ली महिलाओं के लिए असुरक्षित बनी हुई है। "बहुस्तरीय सुरक्षा" और "कड़े पहरे" के दावे अपराधियों के बेखौफ रवैये के सामने पूरी तरह ध्वस्त हो चुके हैं। सख्त कानून और गश्त के तमाम सरकारी दावों के बावजूद व्यवस्था की आपराधिक लापरवाही और पुलिसिंग तंत्र की नाकामी के कारण अपराधियों के मन से कानून का डर पूरी तरह खत्म हो चुका...

सच्ची सफलता का आधार: नैतिक मूल्य और आंतरिक शांति!

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  आज की आपाधापी भरी आधुनिक जिंदगी में, हम अक्सर सफलता को केवल भौतिक साधनों, धन-दौलत और ओहदे से मापने की भूल कर बैठते हैं। जब भौतिक सफलता को जरूरत से ज्यादा महत्वपूर्ण समझ लिया जाता है, तो इंसान अनजाने में ही एक ऐसी दौड़ में शामिल हो जाता है जिसकी कोई मंजिल नहीं होती। इस अंधी दौड़ का सबसे बड़ा नुकसान हमारे नैतिक मूल्यों को चुकाना पड़ता है। सुबह से शाम तक सहूलियत और क्षणिक लाभ के लिए जब व्यक्ति अपने सिद्धांतों और संस्कारों से समझौता करने लगता है, तो धीरे-धीरे उसकी चेतना कमजोर होने लगती है। शुरुआत छोटे-छोटे समझौतों से होती है, लेकिन समय के साथ मनुष्य ऐसे कार्य भी करने लगता है जो न केवल समाज, बल्कि उसके अपने परिवार के हित में भी नहीं होते। भौतिक वस्तुएं आपको क्षणिक सुख दे सकती हैं, लेकिन यदि आपकी आत्मा असंतुष्ट है और आपके कर्म दूसरों के अहित पर टिके हैं, तो भीतर केवल नकारात्मकता ही पनपेगी। ऐसी नकारात्मकता के साथ जीने वाला व्यक्ति भले ही दुनिया की नजरों में कितना भी सफल क्यों न दिखे, उसका आंतरिक पतन निश्चित होता है। नैतिक मूल्यों के बिना पाई गई कोई भी सफलता स्थायी नहीं हो सकती और न ही व...

दानापुर मंडल से 17 रेलकर्मी सम्मानपूर्वक सेवानिवृत्त: जानें विदाई समारोह की खास बातें!

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  दानापुर मंडल रेल कार्यालय के सभागार में 31 अगस्त 2026 को अगस्त माह में सेवामुक्त हुए 17 रेलकर्मियों के लिए एक भव्य "समापक भुगतान समारोह" का आयोजन किया गया। इस भावुक और गरिमामय कार्यक्रम में सेवानिवृत्त हो रहे कर्मियों को उनकी वर्षों की निष्ठावान सेवा के लिए सम्मानित कर विदाई दी गई। समारोह की प्रमुख झलकियां सम्मान और विदाई: अपर मंडल रेल प्रबंधक (इन्फ्रा), श्री राजीव कुमार ने सभी 17 सेवानिवृत्त रेलकर्मियों को अंगवस्त्र और समापक भुगतान के जरूरी दस्तावेज सौंपकर सम्मानित किया। कार्यक्रम की शुरुआत: वरीय मंडल कार्मिक अधिकारी, श्री अतुल कुमार ने स्वागत भाषण के साथ समापक भुगतान का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया। सुरक्षित भविष्य और निवेश की सलाह: ADRM श्री राजीव कुमार ने कर्मियों के सुखद और स्वस्थ जीवन की कामना करते हुए एक महत्वपूर्ण सलाह दी। उन्होंने सभी से अपील की कि वे अपने समापक भुगतान की गाढ़ी कमाई को किसी भी असुरक्षित या जोखिम भरी जगह पर निवेश न करें। स्वास्थ्य और दीर्घायु का मंत्र: समारोह में एक्युप्रेशर और आयुर्वेदिक डॉक्टरों को विशेष रूप से आमंत्रित किया गया था, जिन्होंने सेवान...

जब पश्चिमी जगत ने ढूंढा भगवद्गीता में मॉडर्न मैनेजमेंट का 'मास्टरकी'!

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    जब भी घर की अलमारी में रखी 'भगवद्गीता' पर नज़र पड़ती है, तो अमूमन मन में विचार आता है—यह तो जीवन के अंतिम पड़ाव या बुजुर्गों के पढ़ने की चीज़ है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिस किताब को हम केवल पूजा-पाठ और मोक्ष का साधन मानते रहे, दुनिया के सर्वश्रेष्ठ मैनेजमेंट गुरु उसमें भविष्य के लीडर्स तैयार करने का सूत्र खोज रहे हैं? यह ठीक वैसा ही है जैसे सदियों से हमारी रसोई और आँगन में उगने वाला 'ग्वारपाठा' जब तक 'एलोवेरा' बनकर खूबसूरत बोतलों में नहीं आया, हमने उसकी कीमत नहीं समझी। जब योग 'योगा' बनकर पश्चिम से लौटा, तब हमने उसे दिनचर्या में शामिल किया। अब यही कहानी भगवद्गीता के साथ दोहराई जा रही है।  2008 में इस कैथोलिक यूनिवर्सिटी ने अपने कोर करिकुलम में भगवद्गीता को शामिल करके पूरी दुनिया को चौंका दिया था। दर्शनशास्त्र और मानव जीवन के मूल्यों को समझने के लिए विदेशी छात्र गीता के अध्यायों का अध्ययन कर रहे हैं। इतना ही नहीं, हार्वर्ड से लेकर भारत के IIMs तक—आज हर जगह 'अध्याय 2 का 47वाँ श्लोक' (कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन) किसी भी मॉडर्न मैन...

पटरियों से उड़ान तक: जब एक शिक्षक दंपत्ति ने बदल दी बरौनी स्टेशन के बेसहारा बच्चों की तकदीर! -प्रो प्रसिद्ध कुमार।

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     बिहार के बरौनी रेलवे स्टेशन पर जहाँ ट्रेनों की आवाजाही और मुसाफिरों की हलचल रहती थी, वहीं पटरियों के किनारे जिंदगी से हारे मासूमों का एक दूसरा ही संसार था। भीख मांगना, बाल मजदूरी और नशे के दलदल में धंसते बचपन के बीच साल 2013 में उम्मीद की एक ऐसी किरण जगी, जिसने दर्जनों जिंदगियों का रुख मोड़ दिया। यह कहानी है बेगूसराय के शिक्षक दंपत्ति अजीत कुमार और शबनम मधुकर की। अजीत जी खुद अपने बचपन में पटरियों पर संघर्ष का दौर देख चुके थे, इसलिए इन बच्चों का दर्द उनसे बेहतर कौन समझ सकता था? इसी दर्द ने उन्हें और उनकी पत्नी को इन बच्चों की जिंदगी संवारने का बीड़ा उठाने के लिए प्रेरित किया। इस मुहिम में उनके दोनों बेटों ने भी कंधे से कंधा मिलाकर साथ दिया। ममता की छांव और अनुशासन का संगम यह अनोखी पाठशाला किसी आलीशान इमारत में नहीं, बल्कि खुले आसमान के नीचे पटरियों के किनारे चलती थी। ममता का टिफिन: शबनम जी हर सुबह दर्जनों बच्चों के लिए खुद अपने हाथों से खाना बनाकर लाती थीं, ताकि कोई भी बच्चा भूखे पेट पढ़ाई न करे। अनुशासन की नींव: अजीत जी बच्चों को अनुशासन के साथ शिक्षा का पाठ पढ़ाते थ...

अपवाद की स्थिति: क्या भारत में भेदभाव सामान्य बनता जा रहा है?

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     वर्ष 2007 के बाद पहली बार संयुक्त राष्ट्र नस्लीय भेदभाव उन्मूलन समिति (CERD) द्वारा भारत में नस्लीय व जातीय भेदभाव की स्थिति की गहन समीक्षा की गई है। इस समीक्षा में समिति ने अल्पसंख्यकों, दलितों और गैर-नागरिकों के खिलाफ बढ़ती हिंसा, डेटा में पारदर्शिता की कमी तथा मानवाधिकार निकायों की स्वायत्तता में आई गिरावट पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। यह रिपोर्ट भारत की अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं, नीतिगत चिंताओं और नागरिक समाज की वर्तमान स्थिति का एक स्पष्ट और विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करती है। UN-CERD रिपोर्ट: मुख्य बिंदु और वैश्विक चिंताएं संयुक्त राष्ट्र की नस्लीय भेदभाव उन्मूलन समिति (CERD) ने भारत द्वारा 'सभी प्रकार के नस्लीय भेदभाव के उन्मूलन पर अंतर्राष्ट्रीय कन्वेंशन (1968)' के अनुपालन पर अपनी समीक्षा रिपोर्ट जारी की है। हिंसा पर चिंता: समिति ने कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा अल्पसंख्यक एथनिक व धार्मिक समूहों, दलितों और गैर-नागरिकों के प्रति हिंसा पर "गंभीर चिंता" व्यक्त की है। 'नस्ल' बनाम 'जाति' का तर्क: भारत सरकार का रुख रहा है कि 'जातिगत भेदभा...

लेबल से आगे: भारत को स्वस्थ खान-पान की ओर कैसे मोड़ें?

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  भारत में पैक्ड खाद्य पदार्थों के सामने वाले हिस्से पर पोषण संबंधी चेतावनी लागू करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण शुरुआत हुई है। हालाँकि, केवल लेबल लगाने से सीमित और जागरूक वर्ग को ही लाभ मिलेगा। व्यापक प्रभाव के लिए भारत को अपनी कर नीतियों, औद्योगिक प्रोत्साहनों , कॉरपोरेट प्राथमिकताओं और स्कूली शिक्षा को स्वास्थ्य उद्देश्यों के साथ एकीकृत करना होगा। FSSAI ने उच्चतम न्यायालय में पैक्ड खाद्य पदार्थों पर अत्यधिक वसा (Fat), चीनी (Sugar), नमक (Salt) या कृत्रिम मिठास होने पर लाल षट्कोणीय (Red Hexagonal) चेतावनी देने का प्रस्ताव रखा है।  चिली और मेक्सिको जैसे देशों में प्रत्येक नुकसानदेह तत्व (नमक, चीनी, संतृप्त वसा) के निर्धारित सीमा से अधिक होने पर अलग-अलग स्पष्ट चेतावनियाँ दी जाती हैं।  भारत को भी 'एक सीमा से अधिक पोषक तत्व = एक चेतावनी', 'दो तत्व = दो चेतावनियाँ' जैसा सरल मॉडल अपनाना चाहिए। इससे उपभोक्ता बिना भ्रमित हुए सही चुनाव कर सकेंगे। स्पष्ट चेतावनियाँ खाद्य निर्माताओं को अपने उत्पादों में चीनी, नमक या वसा की मात्रा घटाने के लिए एक प्रत्यक्ष व्यावसायिक प्रोत्साहन देत...

जब प्रकृति बोले, मानवता को सुनना होगा ।

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  नेपाल-तिब्बत हिमालय क्षेत्र में आई हालिया विनाशकारी बाढ़ केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण मानवता के लिए एक गंभीर चेतावनी है। यह घटना हमें याद दिलाती है कि भले ही हमने अपनी राजनीतिक और राष्ट्रीय सीमाएं बना ली हों, लेकिन हम सभी एक ही आसमान के नीचे सांस लेते हैं और एक परस्पर जुड़े हुए पारिस्थितिक तंत्र का हिस्सा हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार उच्च तापमान और तेजी से पिघलती बर्फ ने इस विभीषिका में बड़ी भूमिका निभाई है। पिछले तीन दशकों में नेपाल अपने ग्लेशियरों की लगभग एक-तिहाई बर्फ खो चुका है। यहाँ एक गहरा विरोधाभास देखने को मिलता है: नेपाल वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में मात्र 0.05% (2024 के आंकड़ों के अनुसार) का योगदान देता है। फिर भी, न्यूनतम कार्बन उत्सर्जन करने के बावजूद यह देश जलवायु परिवर्तन के सबसे खतरनाक दुष्प्रभावों को झेलने के लिए मजबूर है। प्रकृति किसी राष्ट्रीय सीमा को नहीं मानती। एक जगह उत्सर्जित कार्बन पूरे वातावरण को प्रभावित करता है; नदियों, ग्लेशियरों और हवाओं को पासपोर्ट की आवश्यकता नहीं होती। इस संकट से निपटने के लिए विभिन्न आध्यात्मिक परंपराएं हमें प्रकृति...

रंगमंच के संवाहक: पद्मश्री सतीश आनंद और 'कला संगम' का स्वर्णिम सफर!

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  भारतीय रंगमंच की बात जब भी होगी, तब बिहार और देश के नाटकीय परिदृश्य को नई पहचान देने वाले वरिष्ठ नाट्य निर्देशक और अभिनेता सतीश आनंद का नाम अत्यंत आदर के साथ लिया जाएगा। पांच दशकों से अधिक समय तक थिएटर को समर्पित रहे सतीश आनंद ने न केवल रंगमंच को जिया, बल्कि उसे लोक संस्कृति और आधुनिक चेतना के साथ जोड़कर एक नया विस्तार भी दिया। 'कला संगम' की स्थापना और नाट्य क्रांति सतीश आनंद जी का सबसे ऐतिहासिक योगदान रहा 'कला संगम' नाट्य संस्था की स्थापना। 1970 के दशक में पटना में स्थापित यह संस्था केवल नाटक खेलने का मंच नहीं बनी, बल्कि इसने बिहार में एक सांस्कृतिक क्रांति का रूप ले लिया। प्रतिभाओं को मंच: 'कला संगम' के माध्यम से उन्होंने कई युवा कलाकारों को तराशा, जो आगे चलकर राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय सिनेमा, टेलीविजन और रंगमंच के बड़े स्तम्भ बने। प्रयोगधर्मी नाट्य शैली: उन्होंने पारंपरिक लोक कलाओं (विशेषकर 'विदेशिया' जैसी बोलियों और शैलियों) को आधुनिक नाट्य सिद्धांतों के साथ पिरोया। उनके निर्देशकीय कौशल ने क्षेत्रीय नाटकों को राष्ट्रीय पहचान दिलाई। प्रमुख प्रस्तुतिय...

बिहार के गौरव 'राज्यगीत' के रचयिता कवि सत्यनारायण सिंह का निधन: साहित्य जगत का एक युग समाप्त।

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  बिहार की पावन धरती ने हमेशा से साहित्य, ज्ञान और संस्कृति के नए आयाम गढ़े हैं। इन्हीं सांस्कृतिक स्तंभों में से एक, विख्यात साहित्यकार और कवि सत्यनारायण सिंह अब हमारे बीच नहीं रहे। उनके निधन से हिंदी और मैथिली साहित्य जगत में एक गहरी और अपूरणीय क्षति हुई है। राज्यगीत के माध्यम से अमर हुआ योगदान कवि सत्यनारायण जी की सबसे बड़ी और ऐतिहासिक पहचान उनका रचा हुआ बिहार राज्यगीत ("मेरे भारत के कंठहार, तुझको शत-शत प्रणाम बिहार") है। वर्ष 2012 में बिहार सरकार द्वारा आधिकारिक तौर पर अपनाए गए इस गीत के माध्यम से उन्होंने राज्य की ऐतिहासिक गरिमा, समृद्ध संस्कृति और गौरवशाली अतीत को अद्भुत पंक्तियों में पिरोया। जब भी यह राज्यगीत गूंजेगा, सत्यनारायण जी की शब्द-साधना हर बिहारी के दिल में जीवंत रहेगी। साहित्यिक सफर और प्रमुख योगदान सरल एवं मर्मस्पर्शी शैली: उनकी रचनाओं में जमीन से जुड़ाव, लोक-संस्कृति की सोंधी महक और गहरी मानवीय संवेदनाएं स्पष्ट झलकती हैं। हिंदी-मैथिली काव्य साधना: उन्होंने दोनों भाषाओं में उत्कृष्ट साहित्य का सृजन कर विभिन्न साहित्यिक मंचों को समृद्ध किया। सांस्कृतिक चेतना ...

कवि शैलेन्द्र: संवेदनशीलता, संघर्ष और स्वाभिमान का नाम !

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    वे भूख के अहसास को दबाने के लिए बीड़ी पिया करते थे। मशहूर गीतकार शैलेन्द्र की लेखनी में साधारण इंसान की पीड़ा, गरीबी का दर्द और व्यवस्था के खिलाफ एक खामोश बगावत साफ झलकती है। रेलवे की नौकरी से लेकर सिनेमा के सुनहरे दौर तक, उनके गीत आम आदमी की आवाज़ बने। संघर्ष और अनछुए पहलू भूख और बीड़ी का दौर: अपने शुरुआती दिनों में जब उनके पास भरपेट खाने के पैसे नहीं होते थे, तब वे भूख के अहसास को दबाने के लिए बीड़ी पिया करते थे। यह तंगहाली उनके गीतों में दर्द और सच्चाई बनकर उतरी। स्वाभिमानी स्वभाव: शैलेन्द्र ने कभी अपनी कला से समझौता नहीं किया। जब राज कपूर ने पहली बार उन्हें 'सबका देश' नाटक में सुनकर फिल्म 'आग' के लिए गीत लिखने का न्योता दिया, तो उन्होंने यह कहकर मना कर दिया था कि वे पैसे के लिए नहीं लिखते। बाद में आर्थिक तंगी के कारण जब वे राज कपूर के पास गए, तो राज कपूर ने सहृदयता से उन्हें अपनाया। वामपंथी विचारधारा से जुड़ाव: वे 'इप्टा' (IPTA) से गहराई से जुड़े थे। जन आंदोलनों और मजदूरों के हक में लिखी उनकी कविताएं सीधे दिल को छूती थीं। 'तीसरी कसम' का आर्थिक झट...

अपूरणीय क्षति: नहीं रहे संपतचक के लोकप्रिय राजद नेता नागेंद्र यादव !

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     संपतचक की माटी ने आज अपना एक सच्चा हितैषी, कुशल सामाजिक कार्यकर्ता और राजद का वरिष्ठ स्तंभ खो दिया। संपतचक प्रखंड के पूर्व बीस सूत्री अध्यक्ष और राष्ट्रीय जनता दल के वरिष्ठ नेता नागेंद्र यादव जी का असमय निधन हम सभी के लिए अत्यंत पीड़ादायक और स्तब्ध कर देने वाली खबर है। यह मनहूस समाचार सर्वप्रथम मुझे फुलवारी के अशोक यादव जी से मिला। जब मैंने इसकी पुष्टि के लिए उनसे पूछा, तो उन्होंने बताया कि फुलवारी के विधायक एवं पूर्व मंत्री श्याम रजक जी ने फोन पर इसकी जानकारी दी है। इसके बाद मन में एक अनहोनी की आशंका लिए जब कई अन्य मित्रों दिलीप यादव  से पड़ताल की, तो यह हृदयविदारक समाचार सत्य साबित हुआ। यद्यपि मेरे पास नागेंद्र जी का व्यक्तिगत फोन नंबर था, लेकिन इस दुखद घड़ी में उनसे या उनके परिवार से बात करने की मेरी हिम्मत ही नहीं बटोही जा सकी। लगभग सत्तर वर्षीय नागेंद्र जी सहजता, सौम्यता और कुशल व्यवहार के प्रतिमूर्ति थे। वे दूर के रिश्ते में हमारे संबंधी तो थे ही, साथ ही एक आत्मीय मित्र और सच्चे शुभचिंतक भी थे। पूर्व मंत्री श्याम रजक जी के वे अत्यंत करीबी और विश्वसनीय सहयो...

दिखावे की भक्ति और जीते-जी उपेक्षा !

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   जिंदा बाप कोई न पूजे, मरे बाद पुजवाया। मुट्ठी भर चावल लेके, कौवे को बाप बनाया॥ पाखंड और सामाजिक कड़वी सच्चाई पर कबीर का प्रहार कबीरदास जी इस दोहे के माध्यम से समाज में फैले आडंबर, खोखले कर्मकांड और बनावटी परंपराओं पर सीधा प्रहार करते हैं: जीवित माता-पिता का निरादर: जब माता-पिता जीवित होते हैं, तब लोग अक्सर उनकी सेवा नहीं करते, उनकी जरूरतों का ध्यान नहीं रखते और उन्हें शारीरिक व मानसिक कष्ट देते हैं। मृत्यु के बाद का दिखावा: माता-पिता के गुजर जाने के बाद लोग समाज में अपनी झूठी प्रतिष्ठा बनाने के लिए बड़े-बड़े श्राद्ध, भोज और अनुष्ठान आयोजित करते हैं। कर्मकांड का पाखंड: कबीर जी चुटकी लेते हुए कहते हैं कि जो व्यक्ति जीवनभर अपने पिता को एक रोटी के लिए तरसाता रहा, वही मृत्यु के बाद मुट्ठी भर चावल (पिंडदान) छत पर रखकर कौवों को बुलाता है और मानता है कि उसने अपने पिता को तृप्त कर दिया। कबीर का संदेश कबीरदास जी का मानना है कि वास्तविक धर्म और सेवा 'जीवित' रहते की जाती है। मृत्यु के बाद किए जाने वाले दिखावटी कर्मकांड और आडंबर केवल मन को छलने और समाज को दिखाने का जरिया हैं। यदि सच्चा ...

मेटा का $17.1-अरब का ऐतिहासिक समझौता: कारण, निहितार्थ एवं सीमाएं !

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  26 अगस्त 2026 को टेक दिग्गज मेटा (Meta) ने अमेरिका के 47 राज्यों के साथ $17.1 बिलियन (लगभग 1.4 लाख करोड़ रुपये) का ऐतिहासिक समझौता किया। यह मुकदमा मेटा द्वारा बच्चों का डेटा बिना सहमति जुटाने और इंस्टाग्राम व फेसबुक को जानबूझकर एडिक्टिव (लत लगाने वाला) बनाकर बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने के आरोपों पर आधारित था। गोपनीयता का उल्लंघन: 29 अमेरिकी राज्यों का आरोप था कि मेटा ने 13 साल से कम उम्र के बच्चों का निजी डेटा उनके अभिभावकों की सहमति के बिना एकत्र किया, जो COPPA और राज्य गोपनीयता कानूनों का उल्लंघन था। एडिक्शन और मानसिक नुकसान: कंपनी पर जानबूझकर 'अनंत स्क्रॉलिंग' और 'बॉडी कंपैरिजन' को बढ़ावा देने वाले फीचर्स डिजाइन करने का आरोप था, जिससे किशोरों में अवसाद, चिंता और आत्म-हानि के मामले बढ़े। मेटा के अपने शोध का सच: मेटा के आंतरिक दस्तावेजों से पता चला कि इंस्टाग्राम की 13.5% ब्रिटिश किशोरियों ने स्वीकार किया कि इस ऐप के उपयोग से उनके मन में आत्मघाती विचार अधिक बार आने लगे। चेतावनी को नजरअंदाज करना: पूर्व मेटा इंजीनियर (व्हिसलब्लोअर) आर्टुरो बेजर ने गवाह...

क्या अभियुक्त को एफआईआर की प्रति देने से इनकार किया जा सकता है?

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    कानूनी प्रावधान, न्यायपालिका का रुख और अभियुक्त के अधिकारों का एक सारगर्भित विश्लेषण हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद पुलिस को निर्देश दिया कि वे स्वतंत्र पत्रकार अभिषेक उपाध्याय को उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर  और सीसीटीवी फुटेज की प्रति प्रदान करें। पत्रकार का आरोप था कि अयोध्या में राम मंदिर दान में हुई कथित अनियमितताओं पर रिपोर्टिंग करने के कारण उन्हें गलत मामले में फंसाया गया था। बार-बार मांगने के बावजूद पुलिस ने उन्हें एफआईआर की प्रति नहीं दी थी, जिसके बाद उन्हें सर्वोच्च न्यायालय का रुख करना पड़ा। . वैधानिक प्रावधान क्या कहते हैं? (BNSS के तहत स्थिति) भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) में एफआईआर दर्ज होते ही तुरंत अभियुक्त को उसकी प्रति देने का कोई स्पष्ट बाध्यकारी प्रावधान नहीं है: धारा 173(2): यह सूचनाकर्ता या पीड़ित (Victim) को तुरंत और नि:शुल्क एफआईआर की प्रति देने का प्रावधान करती है, लेकिन इसमें अभियुक्त (Accused) का उल्लेख नहीं है। धारा 230: इसके अनुसार मजिस्ट्रेट द्वारा आरोप-पत्र दाखिल होने के बाद (14 दिनों के भीतर) ही अभियुक्त को एफआईआर और संबंध...

इच्छापत्र से रोडमैप तक: क्या ‘सप्तधारा’ दे पाएगी आर्थिक विकास को नई धार?

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  सप्तधारा का विज़न और वास्तविकता।  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2047 तक भारत को 'विकसित भारत' बनाने के लिए 'सप्तधारा' (विनिर्माण, कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण, प्रौद्योगिकी, बुनियादी ढांचा, रक्षा, हरित/नीली अर्थव्यवस्था और सॉफ्ट पावर) का संकल्प प्रस्तुत किया है। हालाँकि, केवल नई शब्दावली गढ़ने या पुरानी योजनाओं (मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, गति शक्ति) को एक नए ढांचे में समेटने भर से त्वरित विकास दर हासिल नहीं की जा सकती। जब तक इस संकल्प के साथ एक कठोर कार्यान्वयन रणनीति नहीं जोड़ी जाती, यह नीति से अधिक एक 'इच्छापत्र' (Wishlist) ही प्रतीत होगी। 10.8% जीडीपी वृद्धि का कठिन लक्ष्य पिछले 25 वर्षों में भारत की औसतन जीडीपी वृद्धि दर 6.5% रही है। विकसित देश का दर्जा पाने के लिए भारत को 2047 तक प्रति व्यक्ति आय में लगभग 9.8% की चक्रवृद्धि वृद्धि हासिल करनी होगी, जिसके लिए वार्षिक जीडीपी वृद्धि दर को लगातार ~10.8% बनाए रखना होगा। इतिहास में इतने लंबे समय तक लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत ऐसी तीव्र वृद्धि दर का कोई पूर्व उदाहरण नहीं मिलता। भारत में आर्थिक सुधारों को लागू करना...

क्लोजिंग ऑक्शन सेशन (CAS): सुधार की सख्त जरूरत।

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    भारतीय शेयर बाजार में क्लोजिंग ऑक्शन सेशन (CAS) की नई व्यवस्था अत्यधिक उतार-चढ़ाव (volatility) की वजह बन रही है, जिसने आम निवेशकों के लिए जोखिम बढ़ा दिया है। हाल ही में सेंसेक्स का कुछ ही मिनटों में 2,000 अंक गिरना और बैंकएक्स ऑप्शन में 14,700% का उछाल आना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि यह व्यवस्था फिलहाल बड़े ट्रेडर्स और हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेडर्स (HFT) के पक्ष में ज्यादा झुकी हुई दिखती है। CAS की मुख्य समस्याएं और चुनौतियां असंतुलित मुकाबला: सह-स्थान (co-location) सुविधाओं से लैस वैश्विक संस्थागत संस्थाएं और एक सामान्य खुदरा निवेशक एक ही बाजार में प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं, जिससे आम निवेशकों का नुकसान बढ़ रहा है। आवश्यक तंत्र की कमी: भारत में एक सक्रिय प्रतिभूति उधार और उधार (Securities Lending and Borrowing - SLB) प्रणाली का अभाव है, जो CAS की सफलता के लिए अनिवार्य शर्त मानी जाती है। नियामक कमियां: जेपीमॉर्गन से जुड़ी संस्था सहित दो संस्थाओं पर सेबी (Sebi) द्वारा CAS में हेरफेर के लिए जुर्माना लगाना यह साबित करता है कि इस प्रणाली की खामियों का फायदा उठाया जा रहा है। आगामी जोख...

लक्जरी मुकदमेबाजी का बोझ: जब अमीरों की रंजिश की कीमत चुकाते हैं गरीब!

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  सर्वोच्च न्यायालय की 'लक्जरी लिटिगेशन' (विलासितापूर्ण मुकदमेबाजी) के खिलाफ हालिया चेतावनी एक स्वागत योग्य कदम है। न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची की पीठ ने दो प्रभावशाली पक्षों के बीच 11 साल पुराने एक विवाद की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि अदालतें व्यक्तिगत रंजिशें भुनाने या बिना किसी वास्तविक कारण के मुकदमे चलाने का जरिया नहीं बन सकतीं। शीर्ष अदालत ने इस विवाद को खारिज करते हुए दोनों याचिकाकर्ताओं पर 5-5 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया। भारत की अदालतों पर मुकदमों का भारी बोझ है—वर्तमान में 5.6 करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं, जिनमें से 11 लाख से अधिक मामले 20 साल से भी अधिक समय से लटके हुए हैं। मुकदमों की इस लंबी कतार के मुख्य कारणों में न्यायाधीशों के रिक्त पद, अपर्याप्त बुनियादी ढांचा, बार-बार तारीखें (स्थगन), जांच में देरी, और कमजोर केस प्रबंधन शामिल हैं। अदालती देरी का सबसे भयानक प्रभाव असमानता पर पड़ता है: अमीर और प्रभावशाली याचिकाकर्ता: इनके लिए लंबा खींचता मुकदमा केवल वकीलों की एक और फीस या सुनवाई भर होता है। गरीब और कम पढ़े-लिखे लोग: इनके लिए अदालत...

स्वास्थ्य रिपोर्ट एवं मार्गदर्शिका का मुख्य सारांश:

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   1. मुख्य स्वास्थ्य मानक (Health Parameters & Normal Ranges) Medical Standards क्र.सं. मानक (Parameter) सामान्य सीमा (Normal Range) 1 ब्लड प्रेशर (BP) 120/80 mmHg 2 पल्स रेट (हृदय गति) 60 – 100 बीट/मिनट 3 शरीर का तापमान 36.5°C – 37.2°C (98.6°F) 4 श्वसन दर (Respiratory Rate) 12 – 20 प्रति मिनट 5 कोलेस्ट्रॉल (Total Cholesterol) 130 – 200 mg/dL 6 पोटैशियम 3.5 – 5.0 mEq/L 7 ब्लड शुगर (खाली पेट / Fasting) 70 – 100 mg/dL 8 ब्लड शुगर (खाने के 2 घंटे बाद / PP) < 140 mg/dL 9 क्रिएटिनिन (Creatinine) पुरुष: 0.7 – 1.3 mg/dL | महिला: 0.6 – 1.1 mg/dL 10 हीमोग्लोबिन (Hb) पुरुष: 13.5 – 17.5 g/dL | महिला: 12.0 – 15.5 g/dL 11 यूरिया (BUN) 7 – 20 mg/dL 12 आयरन (Serum Iron) 50 – 170 µg/dL (दैनिक आवश्यकता: 8–18 mg/दिन) 13 प्लेटलेट्स 1.5 – 4.5 लाख / µL 14 श्वेत रक्त कोशिकाएं (WBCs) 4,000 – 11,000 / µL 15 सोडियम 135 – 145 mEq/L 16 यूरिक एसिड पुरुष: 3.4 – 7.0 mg/dL | महिला: 2.4 – 6.0 mg/dL 2. ऊंचाई के हिसाब से आदर्श वजन (Height to Weight Chart - BMI Based) एशियाई मानकों (BMI 18.5 – 24.9) के ...

फेल होने की 'महान कला' और 'कौशल' की नई परिभाषा।

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   बिहार के शिक्षा मंत्री के इस अद्भुत और ऐतिहासिक 'क्रांति' को देखकर तो यही लगता है कि देश में अब कोई अनपढ़ या असफल रहेगा ही नहीं! शिक्षा मंत्री जी के इस क्रांतिकारी निर्णय ने एक ही झटके में पूरी शिक्षा प्रणाली और बेरोजगारी की समस्या का हल निकाल दिया है। अब रिपोर्ट कार्ड पर लाल स्याही से 'फेल' लिखकर बच्चे का दिल दुखाने का जमाना गया, अब तो गर्व से कहा जाएगा—"हमारा बच्चा फेल नहीं हुआ है, वो तो कौशल सीखने के लिए पात्र घोषित हुआ है!" फेल होना: एक अत्यंत दुर्लभ और कठिन 'कौशल' अगर 'फेल' होने को कौशल के नजरिए से देखें, तो यह हर किसी के बस की बात नहीं है: किताबों से दूरी बनाने का हुनर: साल भर बिना किसी तनाव के रहना और किताबों को बिना छुए परीक्षा भवन तक पहुंच जाना अपने आप में एक 'स्ट्रेस मैनेजमेंट' का अद्भुत कौशल है। उत्तर पुस्तिका में नए विचार पेश करना: प्रश्नों का उत्तर न जानते हुए भी कॉपी के पन्ने भरकर आना, कोई मामूली बात नहीं है। इसे साहित्य की भाषा में 'काल्पनिक रचनात्मकता' कहा जाता है। बिना पढ़े पास होने की उम्मीद रखना: यह अति-आत्...

लूटशाही व्यवस्था पर निगरानी का करारा प्रहार: जब ‘जनता के सेवकों’ ने वाशिंग मशीन और नोटों में बेची ईमानदारी!

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  अधिकारियों के साथ-साथ उनके घरेलू नौकर और दलाल तक करोड़पति बन रहे हैं। बिहार में भ्रष्टाचार का दीमक अब इस कदर जड़ें जमा चुका है कि सरकारी पद जनता की सेवा के लिए नहीं, बल्कि निजी तिजोरियाँ भरने और ऐशो-आराम जुटाने का जरिया बन गए हैं। आम आदमी अपने ही हक, जमीन और इंसाफ के लिए दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर है, जबकि अफसरशाही पूरी निर्लज्जता के साथ जनता की गाढ़ी कमाई को 'बाप की बपौती' समझकर लूटने में जुटी है। हाल ही में समस्तीपुर के रोसड़ा से सामने आया मामला इस सड़न का ज्वलंत उदाहरण है। भूमि सुधार उप-समाहर्ता (DCLR) कंचन कुमारी झा और उनके घरेलू नौकर (दलाल) सुमित कुमार को निगरानी अन्वेषण ब्यूरो ने ₹2 लाख नकद और ₹37,000 की नई वॉशिंग मशीन की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों गिरफ्तार कर लिया। सरकारी आवास से मिला ₹13.82 लाख का अतिरिक्त कैश यह बताने के लिए काफी है कि कैसे आम जनता का खून-पसीना पानी की तरह बहाया जा रहा है।   व्यवस्था पर कुछ चुभते सवाल: नीचे से ऊपर तक बना सिंडिकेट: राजस्व और भूमि सुधार विभाग में भ्रष्टाचार किस सीमा तक फैला है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अधिकार...

प्रकृति का तांडव: जब बिखर गया इंसानी घमंड!

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   जान बचाने के लिए सांस लेने तक की मोहलत नहीं थी। सूर्य की पहली किरण के साथ वह शहर रोज़ की तरह जाग रहा था। गगनचुम्बी इमारतें अपनी शान-शौकत का ढिंढोरा पीट रही थीं, और सड़कों पर दौड़ती गाड़ियां इंसान की तरक्की की गवाही दे रही थीं। रमेश भी अपने नवनिर्मित तीन मंजिला संगमरमर के महल की छत पर खड़ा होकर अपनी संपत्ति को निहार रहा था। जीवन भर उसने इस धन-दौलत, नाम और रुतबे को कमाने में क्या-कुछ नहीं किया—छल, कपट, दिन-रात का चैन और रिश्तों की बलि। उसके लिए पैसा ही सब कुछ था। लेकिन कुदरत खामोशी से अपना हिसाब लिख रही थी। इंसानों ने जिस बेदर्दी से जंगलों को काटा था, नदियों का गला घोंटा था और हवाओं में ज़हर घोला था, उसकी आहुति मांगने का वक्त आ चुका था। अचानक, धरती के सीने से एक गहरा, भयानक कंपन उठा। गड़गड़ाहट इतनी तेज़ थी कि लगा जैसे आसमान फट पड़ा हो। कुछ ही सेकंडों में वह आलीशान महल, जिसे बनाने में रमेश ने अपनी पूरी जिंदगी खपा दी थी, ताश के पत्तों की तरह ढहने लगा। कंक्रीट के बड़े-बड़े टुकड़े गिरने लगे और चीख-पुकार से पूरा आसमान थर्रा उठा। सड़कों का नज़ारा हृदयविदारक था। लोग बदहवास होकर इधर-उधर भाग रहे थे...

हिमालयी चेतावनी: नेपाल और तिब्बत के बदलते भूगोल का बिहार पर संकट !

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  जलवायु परिवर्तन, पिघलती हिमनद झीलें और सीमा पार की नदियों के बदलते स्वरूप पर एक गहन विश्लेषण।  वैश्विक तापमान में वृद्धि के कारण हिमालयी क्षेत्र में एक अप्रत्याशित और गंभीर पर्यावरणीय संकट आकार ले रहा है। तिब्बत और नेपाल के उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में तापमान बढ़ने से ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे अत्यंत अस्थिर हिमनद झीलों का निर्माण हो रहा है। ये झीलें कभी भी टूटकर भयंकर तबाही मचा सकती हैं। इस पर्वतीय संकट का सबसे प्रत्यक्ष और गंभीर प्रभाव निचले मैदानी इलाकों, विशेषकर भारत के बिहार राज्य पर पड़ रहा है। तीव्र गति से गर्म होता हिमालयी क्षेत्र IPCC और ICIMOD (2019) के आंकड़ों के अनुसार, हिंदू कुश हिमालयी क्षेत्र वैश्विक औसत की तुलना में कहीं अधिक तेजी से गर्म हो रहा है। यदि वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5°C पर सीमित भी कर दिया जाए, तब भी यह क्षेत्र औसत से 0.3°C अधिक गर्म होगा। मध्यम उत्सर्जन परिदृश्य में इस सदी के अंत तक यहाँ का तापमान 2.5°C और उच्च उत्सर्जन में 5.5°C तक बढ़ सकता है। इस क्षेत्र में अत्यधिक ठंडे दिनों और रातों की संख्या लगातार घट रही है, जबकि गर्म दिनों की आव...

'गुड गर्ल' सिंड्रोम और वैवाहिक जीवन: सामाजिक संस्कार बनाम आत्म-अभिव्यक्ति !

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  बचपन से ही लड़कियों को यह सिखाया जाता है कि उनकी 'अच्छाई' और सामाजिक प्रतिष्ठा उनकी यौन संयम, लज्जा और सीमाओं में रहने से जुड़ी है। समाज में महिलाओं के पहनावे, दोस्तों और व्यवहार पर अनकही पाबंदियाँ लगाकर यह संदेश दिया जाता है कि कामुकता या अपनी इच्छाओं को प्रकट करना 'गलत' है। यह सामाजिक संस्कार अक्सर माताओं द्वारा सुरक्षा के नाम पर अपनी बेटियों में स्थानांतरित किया जाता है, जो आगे चलकर गहरे मानसिक अवरोध का रूप ले लेता है। यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन के 2024 के एक अध्ययन  अनुसार, बचपन में यौन विषयों को लेकर मिला नकारात्मक संदेश वयस्कता में गहरे यौन अपराधबोध का कारण बनता है। विवाह के बाद यह उम्मीद करना कि दशकों पुराना यह संकोच और भय अचानक गायब हो जाएगा, पूरी तरह से अवास्तविक है। विवाह के सामाजिक लाइसेंस के बावजूद, यह पुराना डर और संकोच महिलाओं के अवचेतन मन में बना रहता है। इसके परिणामस्वरूप वे: अपने पति के सामने अपनी इच्छाएँ और पसंद व्यक्त करने में असमर्थ रहती हैं। खुद को अभिव्यक्त करने में लज्जा, असहजता या खुद के 'गलत' होने का अपराधबोध महसूस करती हैं। पहल करने से डरत...

लोकसभा सीटों की संख्या 543 ही रहनी चाहिए!

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    संसद का मानसून सत्र अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने के बाद, 2027 में होने वाले संभावित परिसीमन  और महिला आरक्षण को लागू करने के लिए लोकसभा सीटों के विस्तार की चर्चाएं तेज हो गई हैं। मुख्य प्रश्न यह उठता है: क्या परिसीमन का अर्थ आवश्यक रूप से लोकसभा के आकार को बढ़ाना ही है? पहली नज़र में लगता है कि 1971 के बाद से भारत की आबादी में अत्यधिक वृद्धि हुई है, इसलिए लोकसभा सीटों में भी आनुपातिक बढ़ोतरी होनी चाहिए। हालांकि, संविधान का अनुच्छेद 81 प्रतिनिधित्व की बात करता है और अनुच्छेद 82 परिसीमन का प्रावधान करता है, लेकिन संसद ने 1976 (42वें संशोधन) और 2002 (84वें संशोधन) में सीटों की संख्या को 1971 की जनगणना पर फ्रीज (स्थगित) कर दिया था। इसका मुख्य उद्देश्य उन राज्यों (विशेषकर दक्षिण भारतीय राज्यों) को राजनीतिक रूप से दंडित होने से बचाना था, जिन्होंने परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण की राष्ट्रीय नीति को सफलता से लागू किया। सरकार द्वारा सुझाव दिया गया है कि सभी राज्यों की सीटों में 50% की समान वृद्धि कर दी जाए ताकि उनका आनुपातिक अनुपात बना रहे (उदा. उत्तर प्रदेश 80 से 120, ...

भारत में निजी स्वास्थ्य सेवा का खर्च: अवसर, चुनौतियाँ और सुधार का मार्ग!

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  भारत में निजी अस्पतालों में इलाज का बढ़ता खर्च आम परिवारों के लिए एक बड़ी आर्थिक चिंता बन गया है। हाल ही में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण पर संसदीय स्थायी समिति की 176वीं रिपोर्ट (7 अगस्त 2026) में यह स्पष्ट हुआ है कि निजी अस्पतालों में औसतन भर्ती खर्च ₹50,508 है, जबकि सरकारी अस्पतालों में यह मात्र ₹6,631 है। प्रसव के मामले में भी निजी क्षेत्रों में जेब से होने वाला खर्च ₹37,630 है, जो सरकारी क्षेत्रों (₹2,299) की तुलना में कई गुना अधिक है। स्वास्थ्य सेवा एक पूंजी-गहन क्षेत्र है जिसमें भूमि, आधुनिक उपकरण, आईसीयू (ICU) और विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी लागत आती है। सरकारी अस्पताल वर्तमान में द्वितीयक  और तृतीयक  देखभाल की पूरी मांग को पूरा करने में असमर्थ हैं, इसलिए निजी और विदेशी निवेश (FDI) की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। हालांकि, जब निजी इक्विटी या कॉरपोरेट पूंजी प्रवेश करती है, तो भारी वित्तीय रिटर्न का दबाव भी आता है। स्वास्थ्य सेवा में "सूचना की असमानता" होती है—अर्थात मरीज को स्वयं यह जानकारी नहीं होती कि कौन सा टेस्ट या इलाज जरूरी है। जब वित्तीय प्रोत्साहन बहुत मजबूत ह...

भारत की खाद्य प्रणाली को जलवायु-सुरक्षित बनाना अत्यंत आवश्यक ।

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  1960 के दशक के खाद्य संकट से उबरकर 80 करोड़ से अधिक लोगों को खाद्य सुरक्षा प्रदान करने वाला भारत अब जलवायु परिवर्तन (अत्यधिक तापमान, अनिश्चित मानसून, बाढ़ और सूखा) के गंभीर संकट का सामना कर रहा है। अब चुनौती केवल "खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने" तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी खाद्य आपूर्ति श्रृंखला (बीज, खरीद, भंडारण, परिवहन और पोषण) को जलवायु-अनुकूल  बनाना समय की सबसे बड़ी मांग है।  भारत ने कृषि क्षेत्र में अभूतपूर्व बदलाव किया है। वर्ष 2024-25 में देश ने 350 मिलियन टन से अधिक रिकॉर्ड अनाज उत्पादन हासिल किया। 'राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम' और 'वन नेशन वन राशन कार्ड' जैसी पहलों के माध्यम से लगभग 80 करोड़ आबादी को रियायती दर पर भोजन मिल रहा है। बढ़ते तापमान, बार-बार आने वाले सूखे व बाढ़ और भूजल स्तर में गिरावट के कारण 1.4 अरब लोगों के लिए किफायती और पौष्टिक भोजन की निरंतर उपलब्धता पर संकट मंडरा रहा है। गेहूं-चावल चक्र की सीमाएं: वर्तमान खरीद प्रणाली मुख्यतः कुछ ही फसलों और क्षेत्रों तक सीमित है, जिससे पंजाब और हरियाणा जैसे क्षेत्रों में गंभीर जल संकट  पैदा हो गया ...

सीमा विवाद और पारदर्शिता: भारत-चीन वार्ता का नया चरण।

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  हाल ही में भारत और चीन के विशेष प्रतिनिधियों  के बीच सीमा प्रश्न पर आयोजित बैठक के बाद दोनों देशों ने विवादित सीमा प्रबंधन को लेकर महत्वपूर्ण सहमति व्यक्त की है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोवाल और चीन के विदेश मंत्री वांग यी के बीच बीजिंग में हुई इस बैठक से दोनों देशों के रिश्तों में सामान्यीकरण की दिशा में एक नया अध्याय जुड़ता दिखाई दे रहा है। दोनों देशों ने सीमा परिसीमन पर "शीघ्र और महत्वपूर्ण परिणाम" प्राप्त करने के लिए बातचीत को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया है।  ट्रांस-बॉर्डर नदियों पर विशेषज्ञ-स्तरीय तंत्र की बैठक अगले महीने आयोजित की जाएगी। इसके साथ ही हाइड्रोलाजिकल (जल-विज्ञान संबंधी) डेटा साझा करने पर संवाद बनाए रखने पर सहमति बनी है, जिसकी मांग भारत लगातार करता रहा है। शीर्ष सैन्य कमांडरों के बीच वार्ता आयोजित करने के लिए दो नए बैठक बिंदु स्थापित किए जाएंगे। पूर्वी  और मध्य क्षेत्रों में हॉटलाइन के दो नए चैनल शुरू किए जाएंगे। दोनों पक्षों ने पिछले दो वर्षों में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर शांति बनाए रखने के प्रयासों की पुष्टि की और संबंधों को सा...

पटना हाई कोर्ट पहुँचा मामला: 6 साल के बच्चे और परिवार से बदसलूकी का आरोप।

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    पटना: सोशल मीडिया पर प्रसारित एक वीडियो के अनुसार, 6 वर्षीय बालक आदित्य और उसके परिवार के साथ पुलिस द्वारा कथित मारपीट और दुर्व्यवहार का मामला सामने आया है। प्राप्त जानकारी के मुताबिक, प्रदर्शन के दौरान घटी इस घटना के बाद पीड़ित पक्ष ने न्याय की गुहार लगाते हुए पटना हाई कोर्ट का रुख किया है। मामले के मुख्य बिंदु: प्रदर्शन के दौरान घटना: 6 वर्ष का छात्र प्रदर्शन के दौरान मौजूद था, जहाँ पुलिस प्रशासन द्वारा कथित तौर पर मारपीट की गई। पारिवारिक प्रभाव: आरोप है कि बच्चे के साथ-साथ उसके माता-पिता को भी पुलिसिया कार्रवाई का शिकार होना पड़ा। कानूनी कदम: पीड़ित बालक (आदित्य) और उसका परिवार अब न्याय की माँग को लेकर पटना हाई कोर्ट पहुँचे हैं। इस मामले में वरिष्ठ अधिकारियों की जवाबदेही तय करने और निष्पक्ष जाँच की माँग की जा रही है। #PatnaHighCourt #BiharPolice #JusticeForAditya #ChildRights #PatnaNews #HumanRights #BiharNews

नेपाल के रसुवा में रहस्यमयी भीषण बाढ़: 16 की मौत, 41 सुरक्षाकर्मी लापता।

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     नेपाल के रसुवा जिले में तिब्बत की ओर से बहने वाली भोटे कोशी नदी में अचानक आई विनाशकारी बाढ़ ने व्यापक स्तर पर तबाही मचाई है, जिसमें अब तक 16 लोगों की जान जा चुकी है और 41 से अधिक सुरक्षाकर्मी लापता हैं। स्थानीय मौसम साफ होने के बावजूद आई इस बाढ़ ने तटीय क्षेत्रों को पूरी तरह अपनी चपेट में ले लिया है। बाढ़ से जुड़ी प्रमुख जानकारी और नए अपडेट हताहत और रेस्क्यू ऑपरेशन: अब तक 16 शव बरामद किए जा चुके हैं। लापता 41 जवानों और अन्य नागरिकों की तलाश के लिए नेपाली सेना और आपदा प्रबंधन की टीमों ने बड़े पैमाने पर रेस्क्यू ऑपरेशन तेज कर दिया है। बुनियादी ढांचे की तबाही: नदी के तेज बहाव के कारण तटीय इलाकों में स्थित कई बाजार जलमग्न हो गए हैं। इसके अलावा, इस क्षेत्र में संचालित और निर्माणाधीन कई महत्वपूर्ण जलविद्युत परियोजनाओं (हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स) को भारी क्षति पहुंची है। निचले इलाकों में रेड अलर्ट: भोटे कोशी आगे जाकर त्रिशूली नदी में मिलती है। खतरे की गंभीरता को देखते हुए प्रशासन ने त्रिशूली नदी के निचले इलाकों में रहने वाले नागरिकों के लिए चेतावनी जारी कर उन्हें तुरंत सुरक्ष...

राम लखन सिंह यादव कॉलेज में विधायक डॉ संजीव चौरसिया का स्वागत एवं वृक्षारोपण कार्यक्रम आयोजित; नए भवन निर्माण हेतु सौंपा गया मांग पत्र।

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  पटना। आज राम लखन सिंह यादव कॉलेज, अनिसाबाद के प्रांगण में स्थानीय विधायक डॉ संजीव चौरसिया जी का आगमन हुआ। कार्यक्रम के दौरान कॉलेज के प्राचार्य प्रो. सुरेंद्र प्रसाद ने माननीय विधायक जी को अंगवस्त्र एवं पुष्पगुच्छ (बुके) भेंट कर उनका भावभीना स्वागत किया। वहीं महाविद्यालय के प्राध्यापकों ने भी विधायक जी का माल्यार्पण कर अभिनंदन किया। कार्यक्रम के दौरान प्राचार्य प्रो. सुरेंद्र प्रसाद ने विधायक जी को एक मांग पत्र सौंपा, जिसमें कॉलेज में छात्रों की बढ़ती संख्या और जर्जर भवनों को देखते हुए 'विधायक क्षेत्र विकास निधि' से दो छतदार कमरे एवं बरामदे (80 फीट × 35 फीट) के अविलंब निर्माण की स्वीकृति का अनुरोध किया गया। स्वागत समारोह के उपरांत माननीय विधायक जी ने  मांग पूरी करने का आशावसं दिया। कॉलेज प्रांगण में वृक्षारोपण किया। इसी क्रम में एनसीसी (NCC) प्रभारी मुकेश कुमार यादव ने अपने कैडेट्स के साथ 'एक पेड़ माँ के नाम' अभियान के तहत पौधारोपण किया। तद्परांत विधायक जी ने महाविद्यालय परिसर का गहन निरीक्षण किया , कॉलेज में खुला नया ओपी मणिकचंद्त  था कॉलेज के विशाल परिसर व व्यवस्था ...

पुनर्बीमा का कराधान और भारत का रणनीतिक दृष्टिकोण!

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  जब कोई भारतीय नागरिक या कंपनी बीमा पॉलिसी खरीदती है, तो उस जोखिम का एक बड़ा हिस्सा म्यूनिख, ज्यूरिख, सिंगापुर या लंदन जैसे वैश्विक वित्तीय केंद्रों में कार्यरत पुनर्बीमा कंपनियों के पास स्थानांतरित कर दिया जाता है। IRDAI की रिपोर्ट के अनुसार, FY25 में भारत का पुनर्बीमा बाजार ₹1,12,305 करोड़ तक पहुँच गया। इसमें से लगभग ₹43,000 करोड़ का व्यवसाय भारत में बिना किसी स्थायी प्रतिष्ठान के विदेशी वित्तीय केंद्रों द्वारा लिखा गया। यह स्थिति कर चोरी नहीं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय दोहरे कराधान निवारण समझौतों (DTAA) के अनुच्छेद 7  तहत व्यावसायिक लाभ आवंटन का परिणाम है, जो बिना PE के विदेशी कंपनियों के व्यावसायिक लाभ पर भारत को कर लगाने की अनुमति नहीं देता। अनुच्छेद 7 और PE की शर्त: DTAA के तहत, भारत केवल तभी किसी विदेशी पुनर्बीमाकर्ता के लाभ पर कर लगा सकता है जब उसका भारत में कोई PE हो (जैसे भारत में स्थित उसकी शाखाएँ)। गैर-संधि क्षेत्र (जैसे बरमूडा): यहाँ अनुच्छेद 7 लागू नहीं होता, जिससे घरेलू कानून और विदहोल्डिंग टैक्स महत्वपूर्ण हो जाते हैं। इसमें एक विशेष प्रावधान है जो स्थानीय जोखिमों ...