सीमा विवाद और पारदर्शिता: भारत-चीन वार्ता का नया चरण।

 




हाल ही में भारत और चीन के विशेष प्रतिनिधियों  के बीच सीमा प्रश्न पर आयोजित बैठक के बाद दोनों देशों ने विवादित सीमा प्रबंधन को लेकर महत्वपूर्ण सहमति व्यक्त की है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोवाल और चीन के विदेश मंत्री वांग यी के बीच बीजिंग में हुई इस बैठक से दोनों देशों के रिश्तों में सामान्यीकरण की दिशा में एक नया अध्याय जुड़ता दिखाई दे रहा है।

दोनों देशों ने सीमा परिसीमन पर "शीघ्र और महत्वपूर्ण परिणाम" प्राप्त करने के लिए बातचीत को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया है।

 ट्रांस-बॉर्डर नदियों पर विशेषज्ञ-स्तरीय तंत्र की बैठक अगले महीने आयोजित की जाएगी। इसके साथ ही हाइड्रोलाजिकल (जल-विज्ञान संबंधी) डेटा साझा करने पर संवाद बनाए रखने पर सहमति बनी है, जिसकी मांग भारत लगातार करता रहा है।

शीर्ष सैन्य कमांडरों के बीच वार्ता आयोजित करने के लिए दो नए बैठक बिंदु स्थापित किए जाएंगे।

पूर्वी  और मध्य क्षेत्रों में हॉटलाइन के दो नए चैनल शुरू किए जाएंगे।

दोनों पक्षों ने पिछले दो वर्षों में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर शांति बनाए रखने के प्रयासों की पुष्टि की और संबंधों को सामान्य बनाने की प्रतिबद्धता दोहराई। उच्च स्तरीय बैठकों की पृष्ठभूमि और कूटनीतिक गति। 

एनएसए अजीत डोवाल की यह बीजिंग यात्रा 12 सितंबर को भारत द्वारा आयोजित किए जाने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से ठीक पहले हुई है।

 वार्ता के माध्यम से चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की लगभग सात वर्षों के अंतराल के बाद भारत यात्रा के लिए अनुकूल माहौल तैयार होने की संभावना है।

अक्टूबर 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हुई बैठक ने सामान्यीकरण के इस संतुलित प्रयास की शुरुआत की थी, जिसे 2025 में तियानजिन बैठक में आगे बढ़ाया गया।

यद्यपि दोहरे तंत्र—विशेष प्रतिनिधि वार्ता  तथा सीमा मामलों पर परामर्श और समन्वय के लिए कार्य तंत्र ने पिछले दो वर्षों में सीमाओं पर स्थिरता बनाए रखने में अच्छा काम किया है, फिर भी कुछ अनसुलझे और अस्पष्ट पहलू बने हुए हैं:

 यह स्पष्ट नहीं है कि दोनों पक्ष सीमा के किन हिस्सों का परिसीमन करने की योजना बना रहे हैं और क्या 2005 के राजनीतिक मापदंड और मार्गदर्शक सिद्धांत समझौते पर पुनर्विचार किया जा रहा है या नहीं।

2005 के समझौते के अनुच्छेद 10 के अनुसार, केवल एक निश्चित रूपरेखा के आधार पर ही दोनों पक्ष सीमा रेखा का सीमांकन कर सकते हैं। यद्यपि दोनों पक्षों ने 2005 के समझौते की पुष्टि की है, लेकिन इसकी व्यावहारिक प्रक्रिया अभी भी सार्वजनिक नहीं है। सीमा विवाद जैसे संवेदनशील मुद्दे पर कोई भी समझौता यदि पूर्णतः बंद कमरों में होता है और उसमें पारदर्शिता की कमी होती है, तो वह संदेह पैदा कर सकता है। सीमा प्रबंधन में प्रगति का स्वागत निश्चित रूप से किया जाना चाहिए, लेकिन इसके साथ ही दोनों देशों की सरकारों को अपनी जनता को भी इन वार्ताओं के विश्वास में लेना होगा।

भारत और चीन के बीच सीमा विवाद का समाधान केवल सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर ही नहीं, बल्कि पारदर्शी संवाद के माध्यम से ही संभव है। जब तक सीमा परिसीमन की योजना और प्रक्रिया में स्पष्टता और जनता की सहभागिता नहीं होगी, तब तक टिकाऊ शांति का निर्माण एक चुनौती बना रहेगा।

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