Posts

Showing posts from June, 2026

शिक्षा के मंदिर में 'रिश्वत' का धंधा — गुरु नहीं, यह शिक्षा के नाम पर कलंक है !

Image
  शिक्षा को समाज का तीसरा नेत्र माना गया है और एक शिक्षक को उस नेत्र को खोलने वाला मार्गदर्शक। लेकिन जब ज्ञान के इसी मंदिर का मुख्य पुजारी ही सौदागर बन जाए, तो पूरी व्यवस्था की नींव हिल जाती है।  पटना के संपतचक स्थित उत्क्रमित उच्च माध्यमिक विद्यालय, चैनपुर के प्रधानाध्यापक कुणाल प्रियदर्शी को ₹50,000 की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों गिरफ्तार किया गया है। शर्म की बात यह है कि यह रिश्वत कोई बड़ा ठेका पास कराने के लिए नहीं, बल्कि वार्षिक माध्यमिक परीक्षा 2026 में सफल हुए 152 गरीब छात्रों के अंक प्रमाण पत्र (Marksheet) और सी.एल.सी. (CLC) देने के एवज में ₹400 प्रति छात्र के हिसाब से मांगी जा रही थी। 1. छात्रों के भविष्य और अधिकारों का सौदा एक छात्र जब कड़ी मेहनत के बाद परीक्षा पास करता है, तो उसकी मार्कशीट और सर्टिफिकेट उसका कानूनी अधिकार होते हैं। उन दस्तावेजों पर उसकी आगे की पढ़ाई और करियर टिका होता है। एक प्रधानाध्यापक  द्वारा अपने ही स्कूल के उत्तीर्ण छात्रों से उनके वैध कागजात देने के लिए प्रति छात्र ₹400 की डिमांड करना यह दर्शाता है कि शिक्षा का स्तर कितना गिर चुका है। यह ...

भारत में नशा मुक्ति: दंड से उपचार की ओर एक अनिवार्य बदलाव!

Image
    ​भारत आज दो तरफा नशीली दवाओं की चुनौती के बीच खड़ा है। पश्चिम में स्थित 'गोल्डन क्रिसेंट' और पूर्व में स्थित 'गोल्डन ट्राइएंगल' के बीच भौगोलिक स्थिति ने भारत को तस्करी का एक प्रमुख केंद्र बना दिया है। ड्रोन, डार्कनेट और क्रिप्टोकरेंसी के बढ़ते उपयोग ने इस खतरे को और अधिक जटिल कर दिया है। हालाँकि, इस समस्या का सबसे दुखद पहलू इसका केवल कानूनी और दंडात्मक दृष्टिकोण है। ​वर्तमान में, हमारी नीति नशीली दवाओं की जब्ती और छोटी-मोटी गिरफ्तारियों पर अधिक केंद्रित है। लेकिन यह 'नशा-विरोधी' अभियान जमीनी हकीकत से कोसों दूर है। सबसे बड़ी विसंगति यह है कि जहाँ छोटे स्तर पर नशीले पदार्थों का सेवन करने वाले युवा आपराधिक रिकॉर्ड के कारण अपनी आजीविका खो रहे हैं, वहीं बड़े ड्रग-माफियाओं और अवैध दवा निर्माताओं पर नाममात्र की कार्रवाई हो रही है। ​नशा मुक्ति के लिए चल रहे मौजूदा प्रयासों में भी गंभीर खामियाँ हैं। अधिकांश पुनर्वास केंद्र शहरी इलाकों में सिमटे हुए हैं, जबकि समस्या का घनत्व ग्रामीण और सीमावर्ती गाँवों में अधिक है। इसके अतिरिक्त, निजी नशा मुक्ति केंद्रों में होने वाली...

सैन्य पारदर्शिता और राजनीतिक जवाबदेही!

Image
   कोटि कोटि नमन!   यह विलंबित सम्मान, युद्ध के दौरान परिचालन गोपनीयता और सार्वजनिक जवाबदेही के बीच के नाजुक संतुलन पर सरकार की अविश्वशनीयता  है।  कैसे एक सरकार 'राष्ट्रीय सुरक्षा' का नाम लेकर अपने राजनीतिक हितों को साधने के लिए तथ्यों को छुपाई है।  ​पारदर्शिता का अभाव और राजनीतिक नैरेटिव:  सरकार ने 'ऑपरेशन सिंदूर' (2025) के दौरान मारे गए छह सैनिकों के बलिदान को स्वीकार करने में एक साल से अधिक का समय लिया। यह देरी सरकार की उस "अतिशयोक्तिपूर्ण आत्म-प्रशंसा" वाली रणनीति के विपरीत है, जो वह सार्वजनिक रूप से अपनाती रही। ​संसद को गुमराह करना: कैसे रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने जुलाई 2025 में लोकसभा में दावा किया कि "कोई भारतीय सैनिक हताहत नहीं हुआ"। सरकार द्वारा बाद में इसे "संदर्भ" के नाम पर स्पष्ट करने का प्रयास, उसकी विश्वसनीयता को और कम करता है। ​गोपनीयता बनाम जवाबदेही:  सबसे महत्वपूर्ण तर्क यह है कि 'परिचालन गोपनीयता' और 'सार्वजनिक जवाबदेही' में अंतर होता है। युद्ध में होने वाली हताहतों को छिपाना शायद सरकार के राजनीतिक हितों क...

बिहार बिजली: ToD टैरिफ का नया नियम - अब बिजली के समय से तय होता आपका बिल!

Image
     बिहार में बिजली विभाग ने 'टाइम ऑफ डे' (ToD) टैरिफ लागू किया है, जहाँ बिजली की दरें उपयोग करने के समय पर निर्भर करेंगी। ​नया रेट चार्ट: ​सस्ती बिजली: सुबह 9:00 बजे से शाम 5:00 बजे तक (निर्धारित दर से 20% कम)। ​महंगी बिजली: शाम 5:00 बजे से रात 11:00 बजे तक (पीक ऑवर्स होने के कारण महंगी)। ​सामान्य दर: रात 11:00 बजे से सुबह 9:00 बजे तक (सामान्य रेट)। ​महत्वपूर्ण जानकारी: ​यह नियम स्मार्ट मीटर/प्रीपेड मीटर वाले उपभोक्ताओं पर लागू है। ​कृषि फीडर से जुड़े उपभोक्ताओं को इस नियम से पूरी तरह बाहर रखा गया है। ​बचत का मंत्र: वॉशिंग मशीन, पानी की मोटर, प्रेस और गीजर जैसे भारी बिजली खपत वाले उपकरण सुबह 9 से शाम 5 के बीच चलाएं। इससे आप महीने के बिल में 10% से 15% तक की बचत आसानी से कर सकते हैं।

सत्ता का अहंकार और लोकतंत्र की मर्यादा: एक आत्मचिंतन ! -प्रो प्रसिद्ध कुमार।

Image
     भरत तिवारी की  ह्त्या  'बहादुरी' नहीं, बल्कि 'कायरतापूर्ण' कृत्य है।  सत्ता का यह 'मिजाज' पतन की पटकथा खुद ही लिख रहा है।  ​राजनीति में सत्ता का मद अक्सर व्यक्ति को जमीन से दूर कर देता है। जब सत्ताधारी अपनी जिम्मेदारियों को भूलकर प्रतिशोध की राजनीति में लिप्त हो जाते हैं, तो उसका खामियाजा न केवल समाज को, बल्कि अंततः उस सत्ता को भी भुगतना पड़ता है। बिहार की वर्तमान राजनीति में सम्राट चौधरी के बयानों और कार्यशैली पर उठ रहे सवाल इसी 'अहंकार' और 'बदले की भावना' की ओर इशारा कर रहे हैं। ​सत्ता का मद और प्रतिशोध की राजनीति ​लोकतंत्र में मुख्यमंत्री का पद जनता की सेवा और राज्य के विकास के लिए होता है, न कि किसी विशिष्ट जाति या वर्ग के प्रति द्वेष निकालने के लिए। पिछले कुछ समय में जिस तरह से राजद के नेतृत्व और विशेषकर यादव समाज को लक्ष्य बनाकर कार्रवाई की गई है, वह राजनीतिक विश्लेषकों के लिए चिंता का विषय रहा है। ​अक्सर यह देखा गया है कि जब सत्ता में बैठे व्यक्ति का भाषा और व्यवहार में संयम नहीं रहता, तो उसके समर्थक भी उसी राह पर चलने लगते हैं। समाज म...

आस्था की रक्षा, भरोसे की वापसी: क्या मंदिर के चंदे में पारदर्शिता जरूरी है?

Image
    ​अयोध्या का राम मंदिर केवल पत्थरों से बनी एक संरचना नहीं है, बल्कि यह करोड़ों लोगों की आस्था का प्रतीक है। हालांकि, हाल ही में राम मंदिर के दान में कथित हेराफेरी को लेकर जो जांच सामने आई है, उसने इस पावन स्थल की छवि पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। जब आस्था के केंद्रों से भ्रष्टाचार की खबरें आती हैं, तो यह न केवल वित्तीय नुकसान होता है, बल्कि उस नैतिक नींव को भी कमजोर करता है जिस पर लोगों की भक्ति टिकी होती है। ​आस्था और पारदर्शिता का मेल मंदिर, मस्जिद या चर्च—ये सभी केवल धार्मिक स्थल नहीं हैं, बल्कि ये समुदायों के भरोसे के केंद्र हैं। भक्त अपनी मेहनत की कमाई का एक हिस्सा ईश्वर के प्रति समर्पण भाव से देते हैं, न कि किसी व्यक्ति विशेष को अमीर बनाने के लिए। जब उस दान का दुरुपयोग होता है, तो यह जनता के साथ एक विश्वासघात के समान है। ​जांच की आवश्यकता: SIT का कदम हाल ही में SIT द्वारा दान की पूरी प्रक्रिया—चंदा इकट्ठा करने से लेकर बैंक में जमा करने तक—की जांच करने का निर्णय एक स्वागत योग्य और आवश्यक कदम है। पारदर्शिता पूरी तरह होनी चाहिए। राम मंदिर जैसे संस्थान, जो दशकों के संघर्ष...

जब 42°C का तापमान महसूस होता है 50°C जैसा: 'हीट इंडेक्स' को समझें!

Image
     ​गर्मी के मौसम में हम अक्सर थर्मामीटर पर नज़र डालते हैं और तापमान देखकर ही अपनी दिनचर्या तय कर लेते हैं। लेकिन, क्या आपने कभी सोचा है कि कभी-कभी 40-42 डिग्री सेल्सियस तापमान में भी हमें असहनीय गर्मी और दम घुटने जैसा महसूस क्यों होता है? ​इसका जवाब थर्मामीटर के पार, हवा की नमी (Humidity) में छिपा है। ​तापमान बनाम 'हीट इंडेक्स  ​हवा का तापमान तो केवल यह बताता है कि हवा कितनी गर्म है, लेकिन हमारे शरीर को गर्मी कैसे 'महसूस' होती है, यह 'हीट इंडेक्स' पर निर्भर करता है। नमी बढ़ने पर पसीना कम सूखता है, जिससे शरीर को खुद को ठंडा रखने में संघर्ष करना पड़ता है। यही कारण है कि जब हवा में नमी ज़्यादा होती है, तो हमें थर्मामीटर पर दिख रहे तापमान से कहीं ज़्यादा गर्मी महसूस होती है। ​स्वास्थ्य पर पड़ने वाला गंभीर असर ​लगातार भीषण गर्मी में रहने से हमारा शरीर केवल पसीना ही नहीं बहाता, बल्कि यह हमारे स्वास्थ्य के लिए गंभीर जोखिम भी पैदा करता है: ​डिहाइड्रेशन: शरीर से पानी और लवणों की कमी। ​कमज़ोर इम्युनिटी: शरीर की बीमारियों से लड़ने की क्षमता पर असर। ​मानसिक तनाव: एकाग्रता में कमी और...

दवाओं की गुणवत्ता और नियामक सुधार!

Image
     स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा 'अनुसूची H2'  दवाओं के दायरे को बढ़ाने के निर्णय का स्वागत करता है, जो राजस्व-आधारित विनियमन से हटकर जोखिम-आधारित विनियमन की ओर एक महत्वपूर्ण कदम है। ​सुधार का महत्व ​यह नया ढांचा, जिसमें बारकोड और क्यूआर कोड के माध्यम से उत्पाद पहचान, बैच नंबर और विनिर्माण लाइसेंस जैसी जानकारी शामिल है, दोषपूर्ण बैचों को ट्रैक करने और नकली दवाओं के खतरे से निपटने के लिए आवश्यक है। यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि: ​भारत में रोगाणुरोधी प्रतिरोध की दर बहुत अधिक है, और घटिया दवाएं स्थिति को और खराब कर सकती हैं। ​यह प्रणाली अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि सुधारने में मदद कर सकती है, जहाँ भारत पर अक्सर नकली दवाओं के स्रोत के रूप में सवाल उठाए जाते रहे हैं। ​कार्यान्वयन की चुनौतियां और भविष्य की राह ​लेख इस बात पर जोर देता है कि नीति की सफलता पूरी तरह से इसके प्रभावी कार्यान्वयन पर निर्भर करती है। इसके लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाने की आवश्यकता है: ​तकनीकी अवसंरचना: क्यूआर कोड प्रणाली को एक राज्य-प्रबंधित डेटाबेस, इंटरऑपरेबल सॉफ्टवेयर और देशव्यापी स्कैनिं...

क्या ईश्वर मंदिरों की चौखट और पत्थर की मूर्तियों में कैद है? मोको कहाँ ढूंढे रे बन्दे .. संत कबीर साहेब।

Image
  ​मोको कहाँ ढूंढे रे बन्दे, मैं तो तेरे पास में। ना मैं देवल, ना मैं मसीद, ना काबे कैलास में॥ ना मैं कोनौ क्रिया-कर्म में, ना ही योग बैराग में। खोजी होय तौ तुरतै मिलिहौं, पल भर की ही तलाश में॥ कहै कबीर सुनो भई साधो, सब स्वाँसों की स्वाँस में॥ ​आज के दौर में जब हम चारों तरफ आस्था के नाम पर प्रदर्शन, दिखावे और बाह्य आडंबरों का बोलबाला देखते हैं, तो संत कबीर की ये पंक्तियाँ हमें एक आईना दिखाती हैं। सदियों पहले कबीर ने जो कहा था, वह आज के उपभोक्तावादी युग में और भी अधिक प्रासंगिक हो गया है। ​ईश्वर: एक अनुभव, न कि कोई वस्तु ​हममें से अधिकांश लोग ईश्वर को एक 'वस्तु' की तरह ढूँढ रहे हैं—कभी तीर्थ यात्राओं में, कभी मन्नत की धागों में, तो कभी कर्मकांडों के जटिल चक्रव्यूह में। हम मंदिर, मस्जिद, चर्च और गुरुद्वारों की ईंट-पत्थरों में उसे ढूँढते हैं, जबकि सत्य यह है कि जो स्वयं 'अनंत' है, उसे किसी चारदीवारी में कैद नहीं किया जा सकता। ​ढोंग और दिखावे की पराकाष्ठा ​वर्तमान समाज में धर्म के नाम पर जो ढोंग पसरा है, वह अत्यंत चिंताजनक है। अपनी गलतियों को छुपाने के लिए दान-पुण्य का प्रद...

​पी.वी. नरसिंह राव: आधुनिक भारत के आर्थिक शिल्पकार ।

Image
    ​भारतीय राजनीति के इतिहास में पी.वी. नरसिंह राव का नाम एक ऐसे दूरदर्शी राजनेता के रूप में दर्ज है, जिन्होंने न केवल एक कठिन दौर में देश का नेतृत्व किया, बल्कि भारत की आर्थिक दिशा को मौलिक रूप से बदल दिया। वे भारत के नौवें प्रधानमंत्री थे और इस सर्वोच्च पद को संभालने वाले पहले तेलुगु भाषी नेता थे। ​आर्थिक सुधार: एक साहसी पहल राव का सबसे महत्वपूर्ण योगदान 1991 में आया, जब भारत अपने स्वतंत्रता के बाद के इतिहास के सबसे गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहा था। उस चुनौतीपूर्ण समय में, जब देश वित्तीय पतन की कगार पर था, राव ने अदम्य साहस और राजनीतिक दूरदर्शिता का परिचय दिया। ​लाइसेंस राज का अंत: उन्होंने दशकों से चले आ रहे प्रतिबंधात्मक 'लाइसेंस राज' को ध्वस्त किया, जो भारतीय उद्यमशीलता की राह में सबसे बड़ी बाधा था। ​वैश्वीकरण और उदारीकरण: वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के साथ मिलकर, उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था के द्वार वैश्विक निवेश के लिए खोले। यह एक ऐतिहासिक बदलाव था जिसने भारत को एक बंद अर्थव्यवस्था से बदलकर एक प्रतिस्पर्धी वैश्विक शक्ति की ओर अग्रसर किया। ​दीर्घकालिक विकास की नीं...

भारतीय नागरिकता का प्रमाण: क्या पासपोर्ट, आधार या वोटर आईडी काफी हैं?

Image
   ​क्या आपके पास भारतीय पासपोर्ट है? क्या आपका नाम वोटर लिस्ट में है? या आपके पास आधार कार्ड है? अगर आपको लगता है कि इनमें से कोई भी दस्तावेज़ आपकी भारतीय नागरिकता का 'अंतिम और पक्का प्रमाण' है, तो यह  आपको वास्तविकता समझने में मदद करेगा। ​अक्सर यह चर्चा का विषय होता है कि नागरिकता साबित करने के लिए कौन सा दस्तावेज़ सबसे महत्वपूर्ण है। आइए, उपलब्ध जानकारी के आधार पर इसे विस्तार से समझते हैं। ​1. क्या भारतीय पासपोर्ट नागरिकता का पक्का सबूत है? ​सरल शब्दों में कहें तो—नहीं। ​विदेश मंत्रालय के अनुसार, भारतीय पासपोर्ट मुख्य रूप से एक 'यात्रा दस्तावेज़'  है, न कि नागरिकता का निर्णायक प्रमाण। पासपोर्ट यह तो बताता है कि धारक भारतीय राष्ट्रीयता का है, लेकिन कानूनन इसे नागरिकता का अंतिम सबूत नहीं माना जाता। यदि नागरिकता को लेकर कभी कोई विवाद होता है, तो अदालतें अन्य प्रासंगिक सबूतों की भी जांच करती हैं। ​2. आधार कार्ड की भूमिका क्या है? ​आधार कार्ड को लेकर अक्सर यह गलतफहमी रहती है कि यह नागरिकता का प्रमाण है। वास्तव में, आधार का मुख्य उद्देश्य पहचान और पते का प्रमाण देना है,...

​लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ: केवल चुनाव तक सीमित क्यों?

Image
  ​आज के दौर में जब हम 'लोकतंत्र' शब्द सुनते हैं, तो अक्सर हमारे दिमाग में सिर्फ चुनाव, वोटिंग और सरकार बनाने की प्रक्रिया आती है। लेकिन क्या लोकतंत्र का मतलब वाकई सिर्फ इतना ही है?  लोकतंत्र का मूल अर्थ है—'जनता का शासन'। यह केवल एक राजनीतिक व्यवस्था नहीं है, बल्कि एक जीवन शैली है। इस व्यवस्था में हर व्यक्ति जन्म से ही आजाद होता है और उसे गरिमा के साथ जीने का अधिकार मिलता है। लोकतंत्र की असली खूबसूरती उसके नागरिकों को प्राप्त स्वतंत्रताओं और अधिकारों में निहित है। एक सच्ची लोकतांत्रिक सरकार वही है जो न केवल लोगों के अधिकारों का सम्मान करती है, बल्कि ऐसी स्वतंत्र संस्थाओं का निर्माण भी करती है जो इन अधिकारों की रक्षा कर सकें। जब तक कानून और संस्थाएं नागरिकों के अधिकारों को पूरी ईमानदारी और निष्पक्षता से लागू नहीं करतीं, तब तक लोकतंत्र अधूरा है। आज हमारे सामने एक बड़ा सवाल खड़ा है: क्या हम सिर्फ एक 'चुनावी लोकतंत्र' बनकर रह गए हैं? ​एक ऐसा लोकतंत्र, जहाँ चुनाव तो होते हैं, सरकारें चुनी जाती हैं, लेकिन वे चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष नहीं होते। जहाँ सत्ता की प्रक्रि...

संस्कार और भाषा: हमारे समाज की नींव!

Image
    ​एक सभ्य और आदर्श समाज का निर्माण रातों-रात नहीं होता, बल्कि इसकी नींव हमारे घरों से शुरू होती है।  संस्कार की सबसे पहली पाठशाला घर है। ​बच्चे अपने बड़ों का अनुकरण करते हैं। इसलिए, यह अनिवार्य है कि अभिभावक स्वयं बच्चों के सामने शालीन भाषा का प्रयोग करें और एक आदर्श प्रस्तुत करें। जब हम घर पर सम्मानजनक और सभ्य भाषा का उपयोग करते हैं, तो वह अनजाने ही बच्चों के चरित्र का हिस्सा बन जाती है। ​केवल किताबी ज्ञान पर्याप्त नहीं है। विद्यालयों में शिक्षा के समानांतर, पुस्तक संस्कृति को फिर से मजबूत करने की आवश्यकता है। शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री प्राप्त करना नहीं, बल्कि व्यक्ति को संस्कारित बनाना भी है। हमें भाषाई संस्कारों पर विशेष बल देने की आवश्यकता है, ताकि नई पीढ़ी अपनी भाषा की मर्यादा को समझ सके। ​आज के दौर में अक्सर लोग स्तरहीन भाषा को केवल इसलिए स्वीकार कर लेते हैं क्योंकि वे टकराव से बचना चाहते हैं या इसे सामान्य मान लेते हैं। हमें स्तरहीन भाषा को स्वीकार करने के स्थान पर अपने मौन को तोड़ना चाहिए। गलत भाषा के प्रति चुप रहना उसे बढ़ावा देने जैसा है। समाज में भाषाई ...

अपराध का प्रदर्शन और मीडिया की जिम्मेदारी!

Image
    ​वर्तमान डिजिटल युग में अपराध केवल एक घटना नहीं, बल्कि एक 'तमाशा' बनता जा रहा है। विशेषज्ञों ने 'नकल के अपराध' (कॉपीकैट क्राइम) की गंभीर अवधारणा को रेखांकित किया है। अक्सर देखा गया है कि सामूहिक हिंसा, सार्वजनिक स्थानों पर हमले, आत्महत्या या आतंकी घटनाओं को दोहराने की कोशिश की जाती है, जो समाज के लिए एक बड़ा खतरा है। ​मीडिया और 'नैतिक दहशत'  ​समाजशास्त्री स्टैनली कोहेन के सिद्धांतों के आलोक में यह स्पष्ट होता है कि कभी-कभी मीडिया और सार्वजनिक विमर्श किसी सामाजिक समस्या को इतनी अधिक महत्ता दे देते हैं कि वह सामूहिक अवचेतन में एक असामान्य और भयावह स्थिति पैदा कर देता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के इस दौर में, अपराध का नाटकीय चित्रण अब किसी साधारण नाटक जैसा नहीं रहा; इसमें अपराध का भय कम और उसकी 'भव्यता' का प्रदर्शन अधिक होने लगा है। ​मनोवैज्ञानिकों का स्पष्ट मत है कि अपराध की तकनीकी जानकारी को सीमित रखा जाना चाहिए। समाज की सुरक्षा के लिए यह आवश्यक है कि: ​अपराध की सूचनाओं को केवल जानकारी तक ही सीमित रखा जाए। ​अपराध की प्रस्तुति को लेकर सावधानी बरतनी चाहिए,...

भारतीय अर्थव्यवस्था का खोखला होता आधार! -प्रो प्रसिद्ध कुमार।

Image
     भारतीय अर्थव्यवस्था की चमक-दमक वाली 'विकास गाथा' के पीछे छिपी कड़वी सच्चाइयों को उजागर  है। यह स्पष्ट है कि पिछले एक दशक में सरकार का ध्यान ठोस आर्थिक सुधारों के बजाय केवल नैरेटिव बनाने पर केंद्रित रहा है। ​आयात पर खतरनाक निर्भरता: ऊर्जा, खाद और तकनीक के लिए देश का भारी आयात पर निर्भर होना अर्थव्यवस्था को बाहरी झटकों के प्रति अत्यंत संवेदनशील बनाता है। ​कमजोर होती सामाजिक सुरक्षा: मनरेगा जैसे सुरक्षा जाल को कमजोर करने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था और आम नागरिक गहरे संकट में हैं। ​नवाचार और विनिर्माण का अभाव: देश का 'विश्र्वगुरु' बनने का दावा तकनीकी नवाचार के अभाव में खोखला है। हम आज भी वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण क्षेत्रों, जैसे सेमीकंडक्टर और उन्नत विनिर्माण, में पिछड़ रहे हैं। ​ध्यान भटकाने वाली राजनीति: जनमानस का ध्यान बेरोजगारी और गिरती आय जैसे वास्तविक मुद्दों से हटाकर सांप्रदायिक और विभाजनकारी विवादों में उलझाया जा रहा है, जो विकास की नींव को ही खोखला कर रहा है। ​समय की मांग है कि सरकार छद्म नैरेटिव छोड़ कर वास्तविक आर्थिक प्राथमिकताओं पर ध्यान दे। यदि अब भी सुधा...

'द लोनली प्रोफेट'—भारतीय राजनीति के उस 'अकेले पैगंबर' वी.पी. सिंह की अनकही कहानी !

Image
  25  जून को जन्मदिन पर नमन!    - पुस्तक लेखिका  वरिष्ठ पत्रकार सीमा मुस्तफ़ा।  भारतीय राजनीति के इतिहास में कुछ ऐसे नेता हुए हैं जिन्होंने सत्ता के शिखर पर बैठकर ऐसे फैसले लिए, जिसने देश की सामाजिक और राजनीतिक दिशा को हमेशा के लिए बदल दिया। ऐसे ही एक नेता थे भारत के पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह (वी.पी. सिंह)। 25 जून को उनकी जयंती के मौके पर, अगर आप भारतीय राजनीति के उस दौर को गहराई से समझना चाहते हैं, तो वरिष्ठ पत्रकार सीमा मुस्तफ़ा (Seema Mustafa) द्वारा लिखी गई उनकी जीवनी "The Lonely Prophet: V.P. Singh, a Political Biography" एक बेहतरीन और बेहद जरूरी किताब है। 📖 पुस्तक के बारे में बुनियादी जानकारी किताब का नाम: The Lonely Prophet: V.P. Singh, a Political Biography लेखिका: सीमा मुस्तफ़ा (वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक) विषय: भारत के 7वें प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह का राजनीतिक जीवन, उनके संघर्ष और उनके ऐतिहासिक फैसले। 🔍 पुस्तक की मुख्य बातें और समीक्षा यह किताब केवल वी.पी. सिंह की जीवनी नहीं है, बल्कि यह 1980 और 1990 के दशक की उथल-पुथल से ...

कक्षा 9 सामाजिक विज्ञान का नया पाठ्यक्रम: शिक्षा में सुधार या वैचारिक पुनर्गठन?

Image
   ​हाल ही में NCERT द्वारा कक्षा 9 के सामाजिक विज्ञान पाठ्यक्रम में किए गए आमूलचूल परिवर्तन शिक्षा जगत में चर्चा का विषय बने हुए हैं। चार अलग-अलग विषयों (इतिहास, भूगोल, राजनीति विज्ञान, अर्थशास्त्र) की पारंपरिक व्यवस्था को समाप्त कर अब एक एकीकृत किताब "Understanding Society" लागू की गई है, जिसमें 16 अध्यायों का समावेश है। यह बदलाव केवल स्वरूप का नहीं, बल्कि पाठ्यक्रम की दिशा का भी है, जो कई गंभीर प्रश्न खड़े करता है। ​पाठ्यक्रम का नया स्वरूप: एक मिश्रित दृष्टिकोण ​नए पाठ्यक्रम में वास्तविक जीवन और व्यावहारिक विषयों पर जोर देने का दावा किया गया है। 1975-77 के 'राष्ट्रीय आपातकाल' (National Emergency) पर एक समर्पित अध्याय का जुड़ना इसका सबसे चर्चित पहलू है। साथ ही, स्थानीय शिल्प, कला और आपदा प्रबंधन जैसे विषयों का शामिल होना इसे अधिक व्यावहारिक बनाने का प्रयास प्रतीत होता है। ​क्या खोया? क्या मिला? ​पाठ्यक्रम के सरलीकरण के नाम पर की गई काट-छांट आलोचना का केंद्र बनी हुई है: ​इतिहास का विलोपन: 'फ्रांसीसी क्रांति' और 'नाजीवाद' जैसे वैश्विक इतिहास के आधारभूत अ...

सरकारी फाइलों में कैद भोगीपुर विद्यालय का पुनर्निर्माण: 100 वर्षीय समाजसेवी की सरकार को चुनौती !

Image
      संस्थापक-संरक्षक एवं वयोवृद्ध समाजसेवी सुखदेव बाबू का अपील।  ​राजधानी पटना के पास स्थित संपतचक प्रखंड का उत्क्रमित मध्य विद्यालय, भोगीपुर आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। वर्षों से विद्यालय के जर्जर भवन के पुनर्निर्माण की फाइल सरकारी कार्यालयों की धूल फांक रही है, लेकिन धरातल पर स्थिति जस की तस बनी हुई है। ​शिक्षा व्यवस्था पर मंडराता संकट ​इस विद्यालय में पढ़ने वाले लगभग 100 प्रतिशत बच्चे दलित, महादलित, पिछड़े एवं अति पिछड़े वर्ग के गरीब परिवारों से आते हैं। भवन की खस्ताहाल स्थिति न केवल बच्चों के भविष्य पर सवाल खड़ा कर रही है, बल्कि उनकी सुरक्षा के लिए भी गंभीर खतरा बनी हुई है। ​विधानसभा तक पहुंची गूंज, पर नतीजा शून्य ​इस मामले की गंभीरता को समझते हुए स्थानीय विधायक और बिहार विधानसभा के सचेतक अरुण मांझी ने कई बार सदन और प्रशासनिक स्तर पर इस मुद्दे को उठाया। प्रशासन से लेकर विधानसभा तक मामला पहुंचने के बावजूद निर्माण कार्य शुरू न होना, सरकारी सिस्टम की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। ​100 वर्षीय समाजसेवी की भावुक अपील ​इस कठिन परिस्थिति में एक उम्मी...

क्या 'वरिष्ठता' ही तरक्की का एकमात्र पैमाना होनी चाहिए?

Image
   ​अक्सर हम अपने कार्यस्थलों पर एक आम जुमला सुनते हैं— "अनुभव ही सब कुछ है।" भारत में, विशेष रूप से हमारे सरकारी और कॉर्पोरेट तंत्र में, उम्र और पद पर रहने के वर्षों (seniority) को बुद्धिमत्ता और योग्यता का सबसे बड़ा सबूत मान लिया जाता है। लेकिन क्या वास्तव में 'समय गुजारना' ही 'उपलब्धि' है? ​हाल ही में हिमाचल प्रदेश के एक न्यायिक अधिकारी का मामला सामने आया, जिसमें उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में यह चुनौती दी थी कि उनके जूनियर को उनसे पहले पदोन्नति दे दी गई। कोर्ट ने इस याचिका को खारिज करते हुए एक बड़ा और जरूरी संदेश दिया: "सिर्फ क्रोनोलॉजी (समय क्रम) ही तरक्की का आधार नहीं हो सकता।" ​संस्कृति का 'सीनियरिटी कल्ट' ​भारतीय समाज में हम 'बुजुर्गों' और वरिष्ठों का सम्मान करना बखूबी जानते हैं। यह हमारी संस्कृति का हिस्सा है। लेकिन समस्या तब आती है जब इस सम्मान को पेशेवर जगत में योग्यता के ऊपर बैठा दिया जाता है। हम 'सीनियरिटी' को एक अधिकार (Entitlement) समझने लगते हैं, जबकि सच्चाई यह है कि वरिष्ठता सिर्फ सम्मान पाने के लिए है, काम में बे...

तीन लाख का सफर: मेरी वैचारिक यात्रा का एक और स्वर्णिम मील का पत्थर! -प्रो. प्रसिद्ध कुमार !

Image
    स्वतंत्रता की गूँज जब शब्दों में ढलती है, तो वह केवल एक लेख नहीं, बल्कि एक इतिहास बन जाती है। आज 25 जून 2026 को, जब मैं अपने ब्लॉग के डैशबोर्ड को देखता हूँ, तो 'All Time' व्यूअर्स का आँकड़ा 3,00,218 को पार कर चुका है। 31 दिसंबर 2025 तक जो संख्या 2.69 लाख थी, वह महज कुछ ही महीनों के निरंतर लेखन के बाद 3 लाख के पार पहुँच गई है। यह मेरे पाठकों का अटूट विश्वास और मेरी कलम की निर्भीकता का परिणाम है। विकास का तुलनात्मक विश्लेषण (दिसंबर 2025 - जून 2026) मेरे ब्लॉग की यह प्रगति केवल अंकों की बढ़ोत्तरी नहीं, बल्कि विचारों के विस्तार की गाथा है: | विवरण | स्थिति (31 Dec 2025) | वर्तमान स्थिति (25 June 2026) | कुल वृद्धि | | :--- | :--- | :--- | :--- | | कुल पोस्ट | 4,300 | 4,693 | 393 | | कुल व्यूअर्स | 2,69,661 | 3,00,218 | 30,557 | इन कुछ महीनों में मैंने लगभग 393 नए लेख लिखे हैं और पाठकों की संख्या में 30,557 की प्रभावशाली वृद्धि हुई है। वैश्विक फलक पर मेरी वैचारिक गूँज आज मुझे गर्व है कि मेरे विचारों को सीमाएं नहीं रोक पाईं। मेरे ब्लॉग की पहुंच वैश्विक है, और हमारे मुख्य पाठक इन द...

फुलवारी शरीफ़ के होनहार: फहद रईस और निदा फातमी की प्रशासनिक सफलता पर सम्मानित !

Image
  ​पटना (फुलवारी शरीफ़): हाल ही में बिहार प्रशासनिक सेवा में चयनित होकर फुलवारी शरीफ़ का मान बढ़ाने वाले फहद रईस (अनुमंडल दंडाधिकारी) और निदा फातमी (राजस्व पदाधिकारी) को बधाई देने का सिलसिला जारी है। इसी क्रम में फुलवारी शरीफ़ नगर परिषद की निवर्तमान उपसभापति श्रीमती अंजुम परवीन ने अपने सहयोगियों के साथ उनके आवास पर पहुँचकर उन्हें भव्य रूप से सम्मानित किया। ​कामयाबी पर हर्ष और गर्व ​श्रीमती अंजुम परवीन ने फहद रईस और निदा फातमी को गुलदस्ता भेंट किया और उन्हें अंग वस्त्र देकर सम्मानित किया। इस दौरान उन्होंने कहा: ​"फहद रईस और निदा फातमी की यह उपलब्धि न केवल उनके परिवार के लिए, बल्कि पूरे समाज के लिए फख्र और खुशी की बात है। उनकी यह मेहनत, लगन और काबिलियत आज के नौजवानों के लिए एक प्रेरणादायक मिसाल है।" ​विशिष्ट अतिथियों की गरिमामयी उपस्थिति ​इस मुबारकबाद के मौके पर श्रीमती अंजुम परवीन के साथ कई गणमान्य लोग मौजूद थे, जिन्होंने फहद रईस और निदा फातमी के उज्जवल भविष्य की कामना की: ​मो. फारूक आजम उर्फ ललन नेता (राष्ट्रीय सचिव, राजद) ​आसिफ इकबाल उर्फ लड्डू (प्रदेश महासचिव, राजद)...

​राम लखन सिंह यादव कॉलेज में प्रो. बी.डी. यादव पांचवीं बार शिक्षक प्रतिनिधि निर्वाचित !

Image
       जब तक जीवित रहूँगा कॉलेज के लिए समर्पित रहूँगा। - एमएलसी प्रो. गुलाम गौस, शिक्षा का मतलब बौद्धिक विकास व चरित्र निर्माण! -प्रो डॉ.  कुमार चंद्रदीप ।  ​पटना, 25 जून 2026: अनिसाबाद स्थित राम लखन सिंह यादव कॉलेज में शिक्षक प्रतिनिधि चुनाव का परिणाम घोषित कर दिया गया है। प्रो. बी.डी. यादव को सर्वसम्मति से पांचवीं बार शिक्षक प्रतिनिधि के रूप में चुन लिया गया है। यह जीत न केवल उनकी लोकप्रियता, बल्कि शिक्षकों के प्रति उनके समर्पण का प्रमाण है।   ​अकादमिक उत्कृष्टता और पहचान गणित विषय में गोल्ड मेडलिस्ट रहे प्रो. बी.डी. यादव अपनी कुशाग्र बुद्धि और मृदुभाषी स्वभाव के लिए जाने जाते हैं। उनके मार्गदर्शन में शिक्षा प्राप्त कर कई छात्र आज भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) जैसी प्रतिष्ठित संस्थाओं में देश का मान बढ़ा रहे हैं।   ​पारदर्शी चुनावी प्रक्रिया यह चुनाव पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय के प्रतिनिधि और कॉलेज ऑफ कॉमर्स, आर्ट्स एंड साइंस के प्रो डॉ.  कुमार चंद्रदीप की देखरेख में संप्रोपन्न हुआ। चुनाव प्रक्रिया में प्रो. अशोक यादव प्रस्ता...

व्हाट्सएप की भारतीय रणनीति: क्या कणाल शाह हो सकते हैं गेम-चेंजर?

Image
    भारतीय डिजिटल भुगतान और मैसेजिंग स्पेस के चौराहे पर एक दिलचस्प सवाल खड़ा  है। भारत जैसे विशाल बाजार में व्हाट्सएप की मौजूदगी बेजोड़ है, लेकिन इसका सही व्यावसायिक लाभ उठाना अब भी एक चुनौती बनी हुई है। ​कणाल शाह जैसे फिनटेक विशेषज्ञों को व्हाट्सएप के विजन से जोड़ना एक साहसी विचार हो सकता है। यह न केवल मेटा को भारतीय बाजार की बारीकियों को समझने में मदद करेगा, बल्कि यूपीआई जैसे प्रतिस्पर्धी माहौल में व्हाट्सएप को अपनी 'पेमेंट सर्विस' को नई ऊंचाइयों पर ले जाने का अवसर भी देगा। हालांकि, नियामक बाधाएं और डेटा संप्रभुता जैसे मुद्दे अभी भी बड़ी चुनौतियां हैं। अंततः, मेटा को यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी व्यावसायिक बदलाव का असर व्हाट्सएप के मुख्य उपयोगकर्ता अनुभव पर न पड़े। यह एक सतर्क लेकिन दूरदर्शी कदम हो सकता है, जो भारत के डिजिटल इकोसिस्टम के भविष्य के लिए काफी महत्वपूर्ण होगा।"

मधुबनी की बेटी का कमाल: चौथे प्रयास में बनीं SDM, जानिए ऋतिका की प्रेरणादायक कहानी!

Image
  कहते हैं कि अगर इरादे मजबूत हों और दिल में कुछ कर गुजरने का जज्बा हो, तो हर मुश्किल राह आसान हो जाती है। ऐसा ही कुछ कर दिखाया है बिहार के मधुबनी जिले की बेटी ऋतिका ने। ऋतिका ने प्रतिष्ठित 70वीं बीपीएससी (BPSC) परीक्षा में न केवल सफलता हासिल की है, बल्कि Sub-Divisional Magistrate (SDM) जैसे बड़े पद पर चुनी जाकर अपने पूरे क्षेत्र का नाम रोशन कर दिया है। जैसा कि हमें IMG_20260624_113553.jpg में देखने को मिलता है, ऋतिका (रोल नंबर: 580034) ने मैरिट लिस्ट में अपनी जगह पक्की कर ली है। आइए जानते हैं उनकी इस प्रेरणादायक यात्रा के बारे में। 📍 जड़ों से जुड़ी सफलता: मधुबनी से दिल्ली तक का सफर ऋतिका मूल रूप से मधुबनी जिले के लदनिया ब्लॉक (Ladaniya Block) के पथराही गाँव (VPO: Pathrahi) की रहने वाली हैं। उनके पिता डॉ. राम बिलास मेहता (Dr. Ram Bilas Mehta) के मार्गदर्शन में ऋतिका ने हमेशा शिक्षा को अपनी प्राथमिकता बनाया। उनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि भी काफी मजबूत रही है: ग्रेजुएशन: दिल्ली यूनिवर्सिटी (Delhi University) से भूगोल (Geography Hons.) की पढ़ाई। पोस्ट ग्रेजुएशन: इग्नू (IGNOU) से लोक प्रशास...

हमने जीना नहीं, बस 'दिखाना' सीख लिया है !

Image
    क्या आपने कभी किसी ऐसे सूने मकान को देखा है जिसकी खिड़कियां तो हैं, पर बंद हैं? बाहर से सब ठीक लगता है, लेकिन अंदर ताजी हवा का एक झोंका तक नहीं आता। आज हमारी जिंदगी भी कुछ ऐसी ही हो गई है—"सब कुछ होते हुए भी कुछ न होना।" हम जी तो रहे हैं, साधन सारे हैं,  आज के इस दौर में दिखावा हमारी सबसे बड़ी जरूरत बन चुका है। आइए थोड़ा ठहरकर सोचें कि इस दिखावे की संस्कृति ने हमसे क्या-क्या छीन लिया है। 1. दिखावे का जीवन और सोशल मीडिया का जाल दिखावे की जिंदगी वह स्थिति है जहाँ व्यक्ति अपनी वास्तविक पहचान, असली खुशी और मौजूदा स्थिति को छुपाकर दूसरों को प्रभावित करने के लिए एक नकली छवि पेश करता है। आंतरिक खोखलापन: यह दिखावा अक्सर सोशल मीडिया, भौतिकवाद और समाज की उम्मीदों के दबाव से पैदा होता है, जो इंसान को अंदर ही अंदर खोखला कर देता है। झूठी जिंदगी का बोझ: जो लोग दूसरों को प्रभावित करने के लिए अपनी क्षमता से अधिक खर्च करते हैं या झूठी जिंदगी जीते हैं, वे अक्सर मानसिक शांति और वास्तविक खुशी से कोसों दूर हो जाते हैं। 2. चेहरे पर हंसी, दिल में खामोशी आजकल जीने के लिए संघर्ष और समाज का दब...

​निंदा: एक ऐसी दीमक, जो चरित्र को खोखला कर देती है!

Image
    ​अक्सर हम अपने जीवन में व्यस्त रहते हुए जाने-अनजाने में दूसरों की कमियों पर चर्चा करने लगते हैं। क्या आपने कभी सोचा है कि दूसरों की बुराई करने या उनकी 'निंदा' करने की आदत का हमारे स्वयं के व्यक्तित्व पर क्या प्रभाव पड़ता है? जिस प्रकार दीमक बाहर से मजबूत दिखने वाली लकड़ी को अंदर ही अंदर खाकर खोखला कर देती है, ठीक उसी प्रकार दूसरों की बुराई करने की आदत हमारे चरित्र को भीतर से कमजोर कर देती है। ​जब हम अपना कीमती समय और ऊर्जा दूसरों की कमियां निकालने में खर्च करते हैं, तो हम अनजाने में अपने अंदर नकारात्मकता को पनपने देते हैं। यह आदत धीरे-धीरे हमारी सोचने की शक्ति, हमारी सकारात्मकता और हमारे आत्मविश्वास को नष्ट करने लगती है। ​अक्सर लोग दूसरों को छोटा दिखाकर खुद को बड़ा समझने की भूल करते हैं। लेकिन याद रखिए: ​"महानता किसी को छोटा दिखाने में नहीं, बल्कि स्वयं को ऊंचा उठाने में होती है।" ​सच्ची महानता दूसरों की आलोचना करने में नहीं, बल्कि खुद को बेहतर बनाने, अपने ज्ञान को बढ़ाने और अपने कार्यों को श्रेष्ठ बनाने में निहित है। जब आप अपनी ऊर्जा को अपनी उन्नति में लगाते हैं, तो...

भारत की डिजिटल संप्रभुता: एक अनिवार्य प्राथमिकता !

Image
    भारत की डिजिटल और रणनीतिक संप्रभुता के सामने मौजूद गंभीर  चुनोती है। विदेशी तकनीकी प्लेटफार्मों और क्लाउड सेवाओं पर हमारी अत्यधिक निर्भरता न केवल व्यापारिक निरंतरता के लिए जोखिम है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी एक बड़ा खतरा है। ​हालिया घटनाएं, जैसे सीसीटीवी नेटवर्क में सेंध और विदेशी प्रतिबंधों के कारण भारतीय कंपनियों की डिजिटल सेवाओं तक पहुँच का बाधित होना, इस बात का प्रमाण हैं कि विदेशी संस्थाओं के पास भारतीय डेटा और महत्वपूर्ण अवसंरचना को नियंत्रित करने की शक्ति है। अपनी 'पावर ट्रांजिशन' की स्थिति में, भारत के लिए बाहरी प्रभाव से मुक्त तकनीक विकसित करना अब विकल्प नहीं, बल्कि एक अनिवार्य आवश्यकता है।  यूपीआई और स्वदेशी सेमीकंडक्टर निर्माण जैसी पहलों का विस्तार क्लाउड और रक्षा प्रौद्योगिकियों तक किया जाना चाहिए। भारत को अपने R&D निवेश को वैश्विक मानकों के अनुरूप बढ़ाना होगा, क्योंकि 0.74% का औसत खर्च हमारी महत्वाकांक्षाओं के लिए अपर्याप्त है। रक्षा क्षेत्र में सह-उत्पादन और विश्वसनीय तकनीकी साझेदारियों को बढ़ावा देना, न कि केवल आयात पर निर्भर रहना। ​भारत...

जान की कीमत: एक तरफ 'सवाल', दूसरी तरफ 'आंकड़ा'!

Image
     ​किसी भी विकसित और संवेदनशील समाज की सबसे बड़ी पहचान यह होती है कि वह अपने एक नागरिक की जान को कितनी अहमियत देता है। हाल ही में हुई दो दुखद घटनाओं ने एक बार फिर इस बहस को जन्म दिया है कि क्या हम एक मानवीय समाज की ओर बढ़ रहे हैं या केवल एक ऐसी व्यवस्था का हिस्सा हैं जहाँ जीवन की कीमत केवल एक संख्या (आंकड़ा) बनकर रह गई है। न्यूयॉर्क के सेंट्रल पार्क में एक बग्घी दुर्घटना में एक छात्र की मृत्यु ने पूरे शहर को झकझोर कर रख दिया है। डेढ़ सौ वर्षों से चली आ रही इस परंपरा पर अब वहां की नगर परिषद और प्रशासन गंभीर सवाल उठा रहे हैं। प्रश्न यह नहीं है कि हादसा क्यों हुआ, बल्कि यह है कि क्या यह व्यवस्था एक भी निर्दोष नागरिक की जान जोखिम में डालने के योग्य है? एक आम व्यक्ति की मौत के बाद वहां पूरी व्यवस्था कटघरे में है। कानून बदलने की मांग तेज हो गई है और बग्घी सेवा को हमेशा के लिए बंद करने पर विचार किया जा रहा है। वहां एक मौत एक 'सवाल' बनकर उभरी है, जिसे प्रशासन नजरअंदाज नहीं कर सकता। इसके विपरीत, भारत में स्थिति चिंताजनक है। आए दिन पुल गिरना, नाव पलटना, अस्पताल या कोचिंग सेंटर म...

राजनीति के दिग्गजों का जमावड़ा: राजद महासचिव देव किशुन ठाकुर की पुत्री के विवाह समारोह में उमड़ी खुशियां! -प्रो प्रसिद्ध कुमार।

Image
    ​पटना: 22  जून को राजधानी पटना के गर्दनीबाग (रोड नंबर-15) स्थित 'ग्रेट पब्लिक लाइब्रेरी' का प्रांगण एक बेहद खास और मांगलिक अवसर का साक्षी बना। मौका था राजद के वरिष्ठ नेता और पार्टी के महासचिव श्री देव किशुन ठाकुर जी की सुपुत्री सुश्री प्रियंका के विवाह समारोह का। ​इस शुभ बेला में न केवल वर-वधू को आशीर्वाद देने के लिए परिवार के करीबी लोग मौजूद थे, बल्कि बिहार की राजनीति के कई दिग्गज चेहरे भी एक साथ नजर आए। ​जब सियासत ने लिए ‘खुशियों’ के रंग ​इस विवाह समारोह की सबसे बड़ी रौनक तब और बढ़ गई जब बिहार विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता श्री तेजस्वी यादव जी ने कार्यक्रम में शिरकत की। उनके आगमन ने न केवल कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ाया, बल्कि कार्यक्रम में एक विशेष गरिमा भी जोड़ दी। ​तेजस्वी यादव के साथ राजद के कई वरिष्ठ नेता और गणमान्य हस्तियां भी नवदंपति को आशीर्वाद देने पहुंचीं। कार्यक्रम में शामिल प्रमुख चेहरों में शामिल थे: ​राजद प्रदेश अध्यक्ष: श्री  मंगनीलाल मंडल  ​पूर्व मंत्री: श्री आलोक मेहता ​पूर्व विधानसभा स्पीकर: श्री उदय नारायण चौधरी ​स्थानीय विधायक: श्री श्य...

भारत के सांख्यिकीय डेटाबेस का आधुनिकीकरण!

Image
    ​भारतीय सांख्यिकी प्रणालियों में हालिया सुधारों का उद्देश्य अर्थव्यवस्था के बदलते स्वरूप को बेहतर ढंग से दर्शाना और आंकड़ों की सटीकता व समयबद्धता को बढ़ाना है। पुराने डेटाबेस (जैसे 2011-12 का आधार वर्ष) वर्तमान आर्थिक वास्तविकता को सटीक रूप से नहीं दर्शा पा रहे थे। 15 साल पुराने उपभोग पैटर्न (जैसे DVD प्लेयर का उपयोग) अब अप्रासंगिक हो गए थे, जबकि नई सेवाओं (जैसे ऑनलाइन मीडिया) को शामिल करना आवश्यक था। आधार वर्ष को 2022-23 में बदला गया है। 'डबल डेफलेटर'  पद्धति को अपनाने से जीडीपी और सकल मूल्य वर्धित  की गणना अधिक सटीक हो गई है। इसके अतिरिक्त, जीएसटी डेटा और आवधिक श्रम बल सर्वेक्षणों का उपयोग किया गया है। आधार वर्ष 2024 किया गया है। बास्केट में वस्तुओं की संख्या 299 से बढ़ाकर 358 कर दी गई है। इसमें नए उपभोग आइटम शामिल किए गए हैं और अप्रचलित वस्तुओं (जैसे वीसीआर) को हटा दिया गया है। आधार वर्ष 2022-23 किया गया है और वस्तुओं की संख्या 697 से बढ़ाकर 957 की गई है। सरकार ने नया PPI पेश किया है, जो उत्पादकों को मिलने वाली कीमतों और इनपुट लागत को अधिक सटीकता से मापता है। भवि...

​आईआईटी-दिल्ली का अध्ययन: क्या 'वाइल्ड' मौसम के लिए हम खुद जिम्मेदार हैं?

Image
    ​हाल ही में एनवायर्नमेंटल रिसर्च लेटर्स में प्रकाशित आईआईटी-दिल्ली और केएसएमडीबी कॉलेज के शोधकर्ताओं का एक अध्ययन भारतीय मौसम विज्ञान में एक महत्वपूर्ण मोड़ लेकर आया है। अब तक, देश में बढ़ती भीषण बारिश और विनाशकारी बाढ़ को अक्सर 'प्राकृतिक बदलाव' मानकर खारिज कर दिया जाता था, लेकिन इस नए शोध ने इस बहस को एक तार्किक निष्कर्ष पर पहुँचा दिया है। ​अध्ययन के मुख्य बिंदु: ​दोषी कौन? शोधकर्ताओं ने 1905 से 2014 के बीच के वर्षा आंकड़ों का 'फिंगरप्रिंटिंग' तकनीक से विश्लेषण किया, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि इन चरम मौसमी घटनाओं के पीछे मानव गतिविधियों का स्पष्ट प्रभाव है। ​दोहरा प्रभाव: भारतीय आसमान में इस समय दो ताकतों के बीच संघर्ष चल रहा है—एक तरफ ग्रीनहाउस गैसें हैं जो वातावरण को गर्म कर रही हैं, और दूसरी तरफ एरोसोल (प्रदूषण के कण) हैं, जो सूर्य की रोशनी को बिखेरकर बारिश को दबाने का काम करते हैं। ​छिपा हुआ खतरा: शोधकर्ता टी.एस. चैत्रा के अनुसार, वर्तमान में प्रदूषण के कारण एरोसोल की एक परत बारिश को कुछ हद तक 'नियंत्रित' कर रही है। लेकिन जैसे-जैसे हम प्रदूषण कम करेंगे और हव...

योग: हमारी परंपरा की अमूल्य धरोहर – जमालुद्दीनचक में हर्षोल्लास के साथ मनाया गया अंतरराष्ट्रीय योग दिवस !

Image
  ​योग केवल व्यायाम नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक कला है। इसी संदेश को आत्मसात करते हुए, अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर दानापुर प्रखंड के जमालुद्दीनचक स्थित गोरगावां देवी मंदिर प्रांगण में एक विशेष सामूहिक योगाभ्यास कार्यक्रम का आयोजन किया गया। ​योग का संदेश: "करें योग, रहें निरोग" ​कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य जन-जन को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करना और उन्हें योग की प्राचीन भारतीय पद्धति से जोड़ना था। ​कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित वरिष्ठ अधिवक्ता और रंगकर्मी नवाब आलम ने दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। उन्होंने अपने संबोधन में कहा: ​ "प्राचीन काल से ही भारत में योग की शिक्षा दी जाती रही है। आज पूरा विश्व योग के माध्यम से भारत की ओर देख रहा है। योग न केवल शारीरिक स्वास्थ्य प्रदान करता है, बल्कि मानसिक शांति का भी सबसे प्रभावी माध्यम है।" ​विशेषज्ञों के मार्गदर्शन में हुआ योगाभ्यास ​इस अवसर पर योगाचार्य हरेंद्र कुमार सिंह और देव कुमार अग्रवाल ने उपस्थित जनसमूह को विभिन्न योगासनों का अभ्यास कराया। उन्होंने न केवल आसनों का प्रदर्शन किया...

​राम लखन सिंह यादव कॉलेज में गूंजा 'योग से निरोग' का संदेश; NCC कैडेट्स ने दिखाई योग की शक्ति।

Image
      योग मानसिक शांति और अनुशासन का मार्ग है।-प्राचार्य प्रो. सुरेंद्र प्रसाद।  ​पटना, अनिसाबाद: राम लखन सिंह यादव कॉलेज, अनिसाबाद में अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के उपलक्ष्य में एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस दौरान कॉलेज के NCC कैडेट्स ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और योग के विभिन्न आसनों के माध्यम से स्वास्थ्य के प्रति समाज में जागरूकता का संदेश प्रसारित किया। ​योग का अभ्यास और उत्साह ​कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण NCC कैडेट्स द्वारा किया गया योग प्रदर्शन रहा। 1/29 बिहार बटालियन NCC पटना के एसोसिएट NCC ऑफिसर लेफ्टिनेंट मुकेश कुमार यादव के कुशल मार्गदर्शन में कैडेट्स ने योग के कठिन से कठिन आसनों का अभ्यास किया। लेफ्टिनेंट यादव ने छात्रों को नियमित योग करने और इसे जीवनशैली का अभिन्न अंग बनाने के लिए प्रेरित किया। ​योग है स्वस्थ जीवन का आधार ​कॉलेज के प्राचार्य प्रो. सुरेंद्र प्रसाद ने कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए योग के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, "योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि यह मानसिक शांति और अनुशासन का मार्ग है। आज के दौर में स्वस्थ रहने के ...

दृढ़ संकल्प की जीत: रेलवे के ग्रुप-डी कर्मचारी से बीपीएसी अधिकारी बनने का सफर!

Image
     बिक्रम के सूरज कुमार स्वर्णकार बने वेलफेयर ऑफिसर !  ​सफलता कोई इत्तेफाक नहीं होती, यह मेहनत, धैर्य और कभी न हार मानने वाले जज्बे का परिणाम होती है। हाल ही में बिहार के बिक्रम नगर के निवासी सूरज कुमार की कहानी यही साबित करती है। ​संघर्ष और सफलता की कहानी ​सूरज कुमार, जो एक मध्यमवर्गीय परिवार से आते हैं और जिनके पिता वर्षों से सुनारी (स्वर्णकारी) का व्यवसाय करते हैं, ने यह साबित कर दिया है कि अगर मन में कुछ कर गुजरने की ठान ली जाए, तो परिस्थितियां आड़े नहीं आतीं। ​सूरज ने अपने करियर की शुरुआत भारतीय रेलवे में ग्रुप-डी कर्मचारी के रूप में की थी। एक चुनौतीपूर्ण नौकरी के साथ-साथ पढ़ाई के लिए समय निकालना आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने इसे बाधा नहीं बनने दिया। अपनी ड्यूटी के बाद वे निरंतर स्वध्याय (सेल्फ स्टडी) में लगे रहे। ​एक के बाद एक बड़ी उपलब्धियां ​उनकी मेहनत का फल उन्हें एक साथ दोहरी खुशियों के रूप में मिला: ​इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB): कुछ दिन पूर्व ही उनका चयन इंटेलिजेंस ब्यूरो में अधिकारी पद के लिए हुआ। ​70वीं बीपीएसी (BPSC): हाल ही में घोषित परिणाम में उन्होंने एस...