जान की कीमत: एक तरफ 'सवाल', दूसरी तरफ 'आंकड़ा'!
किसी भी विकसित और संवेदनशील समाज की सबसे बड़ी पहचान यह होती है कि वह अपने एक नागरिक की जान को कितनी अहमियत देता है। हाल ही में हुई दो दुखद घटनाओं ने एक बार फिर इस बहस को जन्म दिया है कि क्या हम एक मानवीय समाज की ओर बढ़ रहे हैं या केवल एक ऐसी व्यवस्था का हिस्सा हैं जहाँ जीवन की कीमत केवल एक संख्या (आंकड़ा) बनकर रह गई है।
न्यूयॉर्क के सेंट्रल पार्क में एक बग्घी दुर्घटना में एक छात्र की मृत्यु ने पूरे शहर को झकझोर कर रख दिया है। डेढ़ सौ वर्षों से चली आ रही इस परंपरा पर अब वहां की नगर परिषद और प्रशासन गंभीर सवाल उठा रहे हैं। प्रश्न यह नहीं है कि हादसा क्यों हुआ, बल्कि यह है कि क्या यह व्यवस्था एक भी निर्दोष नागरिक की जान जोखिम में डालने के योग्य है? एक आम व्यक्ति की मौत के बाद वहां पूरी व्यवस्था कटघरे में है। कानून बदलने की मांग तेज हो गई है और बग्घी सेवा को हमेशा के लिए बंद करने पर विचार किया जा रहा है। वहां एक मौत एक 'सवाल' बनकर उभरी है, जिसे प्रशासन नजरअंदाज नहीं कर सकता।
इसके विपरीत, भारत में स्थिति चिंताजनक है। आए दिन पुल गिरना, नाव पलटना, अस्पताल या कोचिंग सेंटर में आग लगना या निर्माण कार्य के दौरान मजदूरों की मौत जैसी घटनाएं अब हमारे लिए 'सामान्य' होती जा रही हैं। जब भी ऐसी त्रासदी होती है, चर्चा कुछ दिनों तक चलती है और फिर हम मृतकों की संख्या गिनकर अगले हादसे का इंतजार करने लगते हैं।
दुर्भाग्य से, यहां मौत के बाद व्यवस्था बदलने के बजाय, संवेदनाएं केवल 'मुआवजे' और 'आंकड़ों' तक सीमित रह जाती हैं। अक्सर इन हादसों को 'ईश्वरीय विधान' या 'किस्मत' का नाम देकर व्यवस्था की विफलता और प्रशासनिक लापरवाही को ढक दिया जाता है। क्या एक आम नागरिक की जान किसी रसूखदार व्यक्ति की जान से कम मूल्यवान है? यह प्रश्न आज हर उस माता-पिता के मन में है, जिन्होंने भ्रष्टाचार और प्रशासनिक उदासीनता की भेंट चढ़ी इमारतों या असुरक्षित स्थानों पर अपने बच्चों को खोया है।

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