सत्ता का अहंकार और लोकतंत्र की मर्यादा: एक आत्मचिंतन ! -प्रो प्रसिद्ध कुमार।
भरत तिवारी की ह्त्या 'बहादुरी' नहीं, बल्कि 'कायरतापूर्ण' कृत्य है।
सत्ता का यह 'मिजाज' पतन की पटकथा खुद ही लिख रहा है।
राजनीति में सत्ता का मद अक्सर व्यक्ति को जमीन से दूर कर देता है। जब सत्ताधारी अपनी जिम्मेदारियों को भूलकर प्रतिशोध की राजनीति में लिप्त हो जाते हैं, तो उसका खामियाजा न केवल समाज को, बल्कि अंततः उस सत्ता को भी भुगतना पड़ता है। बिहार की वर्तमान राजनीति में सम्राट चौधरी के बयानों और कार्यशैली पर उठ रहे सवाल इसी 'अहंकार' और 'बदले की भावना' की ओर इशारा कर रहे हैं।
सत्ता का मद और प्रतिशोध की राजनीति
लोकतंत्र में मुख्यमंत्री का पद जनता की सेवा और राज्य के विकास के लिए होता है, न कि किसी विशिष्ट जाति या वर्ग के प्रति द्वेष निकालने के लिए। पिछले कुछ समय में जिस तरह से राजद के नेतृत्व और विशेषकर यादव समाज को लक्ष्य बनाकर कार्रवाई की गई है, वह राजनीतिक विश्लेषकों के लिए चिंता का विषय रहा है।
अक्सर यह देखा गया है कि जब सत्ता में बैठे व्यक्ति का भाषा और व्यवहार में संयम नहीं रहता, तो उसके समर्थक भी उसी राह पर चलने लगते हैं। समाज में वैमनस्य बढ़ाकर, जातिगत ध्रुवीकरण की आड़ में जो राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश की जाती है, वह लोकतंत्र की नींव को कमजोर करती है।
बक्सर की घटना: एक बड़ा सवाल
हाल ही में बक्सर के भरत तिवारी की घटना ने पूरे राजनीतिक परिदृश्य को हिलाकर रख दिया है। एक व्यक्ति जिसने आत्मसमर्पण कर दिया हो, उसका इस तरह से अंत कर दिया जाना न केवल कानून व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है, बल्कि यह सीधे तौर पर मानवाधिकारों और न्यायपालिका की मर्यादा का उल्लंघन भी है।
लोकतंत्र में किसी अपराधी या आरोपी को दंड देने का अधिकार केवल कानून के पास है। यदि पुलिस या प्रशासन कानून के दायरे से बाहर जाकर ऐसी कार्रवाई करते हैं, तो वह 'बहादुरी' नहीं, बल्कि 'कायरतापूर्ण' कृत्य है। यह कृत्य संविधान की आत्मा के विरुद्ध है। ऐसी घटनाएं समाज के बीच एक गहरा अविश्वास पैदा करती हैं।
बुद्ध की करुणा और अहिंसा का मार्ग
आज के इस दौर में जब नफरत और अहंकार का बोलबाला है, हमें तथागत बुद्ध के उपदेशों को याद करने की आवश्यकता है। बुद्ध ने सिखाया था कि "अहिंसा ही परम धर्म है।" घृणा का उत्तर घृणा से नहीं, बल्कि प्रेम और शांति से दिया जा सकता है।
सत्ता में बैठे लोगों को यह समझना चाहिए कि जो शासक प्रजा के प्रति करुणा और समानता का भाव नहीं रखता, उसका पतन निश्चित है। इतिहास गवाह है कि अहंकार की मीनारें कितनी भी ऊंची क्यों न हों, वे अंततः ढह ही जाती हैं। शांति और अहिंसा का मार्ग ही समाज को विकास की ओर ले जा सकता है। किसी भी वर्ग को अपमानित करना या उनके साथ अन्याय करना एक ऐसी आग को जन्म देता है, जो अंततः सत्ता को ही जला देती है।
निष्कर्ष: समन्वय ही समाधान है
आगामी समय में बिहार की राजनीति किस दिशा में जाएगी, यह इस बात पर निर्भर करता है कि समाज के विभिन्न वर्ग, विशेषकर यादव और अन्य बहुजन समाज, किस तरह से अपनी एकता प्रदर्शित करते हैं। यदि समाज अपने हितों के प्रति सजग है और बिना किसी भेदभाव के एकजुट खड़ा होता है, तो कोई भी शक्ति उनके अधिकारों का हनन नहीं कर सकती।
राजनीति को 'सबका साथ, सबका विकास' की मूल भावना पर लौटकर आना होगा। न्याय की हत्या करके लोकतंत्र को जीवित नहीं रखा जा सकता। शांति, सहिष्णुता और न्यायसंगत व्यवहार ही एक स्वस्थ समाज और मजबूत शासन की नींव रख सकते हैं। वक्त की पुकार यही है कि अहंकार को त्यागकर संवाद का रास्ता चुना जाए, अन्यथा सत्ता का यह 'मिजाज' पतन की पटकथा खुद ही लिख देगा। !

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