भारत की डिजिटल संप्रभुता: एक अनिवार्य प्राथमिकता !
भारत की डिजिटल और रणनीतिक संप्रभुता के सामने मौजूद गंभीर चुनोती है। विदेशी तकनीकी प्लेटफार्मों और क्लाउड सेवाओं पर हमारी अत्यधिक निर्भरता न केवल व्यापारिक निरंतरता के लिए जोखिम है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी एक बड़ा खतरा है।
हालिया घटनाएं, जैसे सीसीटीवी नेटवर्क में सेंध और विदेशी प्रतिबंधों के कारण भारतीय कंपनियों की डिजिटल सेवाओं तक पहुँच का बाधित होना, इस बात का प्रमाण हैं कि विदेशी संस्थाओं के पास भारतीय डेटा और महत्वपूर्ण अवसंरचना को नियंत्रित करने की शक्ति है। अपनी 'पावर ट्रांजिशन' की स्थिति में, भारत के लिए बाहरी प्रभाव से मुक्त तकनीक विकसित करना अब विकल्प नहीं, बल्कि एक अनिवार्य आवश्यकता है।
यूपीआई और स्वदेशी सेमीकंडक्टर निर्माण जैसी पहलों का विस्तार क्लाउड और रक्षा प्रौद्योगिकियों तक किया जाना चाहिए।
भारत को अपने R&D निवेश को वैश्विक मानकों के अनुरूप बढ़ाना होगा, क्योंकि 0.74% का औसत खर्च हमारी महत्वाकांक्षाओं के लिए अपर्याप्त है।
रक्षा क्षेत्र में सह-उत्पादन और विश्वसनीय तकनीकी साझेदारियों को बढ़ावा देना, न कि केवल आयात पर निर्भर रहना।
भारत अब अपनी डिजिटल संप्रभुता को नज़रअंदाज़ करने का जोखिम नहीं उठा सकता। आर्थिक प्रतिस्पर्धात्मकता और रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने के लिए आत्मनिर्भर तकनीकी पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण ही एकमात्र स्थायी रास्ता है।

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