क्या ईश्वर मंदिरों की चौखट और पत्थर की मूर्तियों में कैद है? मोको कहाँ ढूंढे रे बन्दे .. संत कबीर साहेब।
मोको कहाँ ढूंढे रे बन्दे, मैं तो तेरे पास में।
ना मैं देवल, ना मैं मसीद, ना काबे कैलास में॥
ना मैं कोनौ क्रिया-कर्म में, ना ही योग बैराग में।
खोजी होय तौ तुरतै मिलिहौं, पल भर की ही तलाश में॥
कहै कबीर सुनो भई साधो, सब स्वाँसों की स्वाँस में॥
आज के दौर में जब हम चारों तरफ आस्था के नाम पर प्रदर्शन, दिखावे और बाह्य आडंबरों का बोलबाला देखते हैं, तो संत कबीर की ये पंक्तियाँ हमें एक आईना दिखाती हैं। सदियों पहले कबीर ने जो कहा था, वह आज के उपभोक्तावादी युग में और भी अधिक प्रासंगिक हो गया है।
ईश्वर: एक अनुभव, न कि कोई वस्तु
हममें से अधिकांश लोग ईश्वर को एक 'वस्तु' की तरह ढूँढ रहे हैं—कभी तीर्थ यात्राओं में, कभी मन्नत की धागों में, तो कभी कर्मकांडों के जटिल चक्रव्यूह में। हम मंदिर, मस्जिद, चर्च और गुरुद्वारों की ईंट-पत्थरों में उसे ढूँढते हैं, जबकि सत्य यह है कि जो स्वयं 'अनंत' है, उसे किसी चारदीवारी में कैद नहीं किया जा सकता।
ढोंग और दिखावे की पराकाष्ठा
वर्तमान समाज में धर्म के नाम पर जो ढोंग पसरा है, वह अत्यंत चिंताजनक है। अपनी गलतियों को छुपाने के लिए दान-पुण्य का प्रदर्शन करना, ईश्वर के नाम पर गरीबों का शोषण करना, और धर्म को एक व्यापार बना लेना—क्या इसी को हम आध्यात्मिकता कहते हैं? कबीर ने स्पष्ट कहा था— "ना मैं कोनौ क्रिया-कर्म में"। वे हमें याद दिलाते हैं कि ईश्वर बाह्य प्रदर्शनों का भूखा नहीं है। वह तो केवल 'भाव' का भूखा है।
भीतर की खोज ही असली साधना है
कबीर कहते हैं— "सब स्वाँसों की स्वाँस में।" इसका अर्थ है कि परमात्मा हमसे अलग नहीं, बल्कि हमारी जीवन-शक्ति के रूप में हमारे भीतर ही विद्यमान है। जब हम बाहर की शोर-शराबे वाली दुनिया से हटकर अंतर्मुखी होते हैं, तब हमें उस असीम ऊर्जा का अहसास होता है।
सुधार की ओर
यदि हम वास्तव में ईश्वर को पाना चाहते हैं, तो हमें अपनी दृष्टि बदलनी होगी।
अंधविश्वास त्यागें: तर्क को साथ रखें। जो तर्क की कसौटी पर खरा न उतरे, वह धर्म नहीं, केवल अंधविश्वास है।
मानवता ही धर्म है: जो व्यक्ति अपने आसपास के दुखी और लाचार इंसान की मदद नहीं कर सकता, वह मंदिर जाकर लाखों का चढ़ावा भी चढ़ा दे, तो भी वह शून्य है।
स्वयं का विश्लेषण: मंदिर जाने से पहले अपने भीतर झाँकें। क्या मन साफ है? क्या दूसरों के प्रति करुणा है? यदि नहीं, तो ईश्वर की तलाश अधूरी है।
याद रखिए, ईश्वर कोई बाहरी सत्ता नहीं है जिसे रिश्वत या दिखावे से प्रसन्न किया जाए। वह प्रेम है, वह सत्य है, और वह आपके ही भीतर की शांति में निवास करता है।

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