क्या 'वरिष्ठता' ही तरक्की का एकमात्र पैमाना होनी चाहिए?

  


​अक्सर हम अपने कार्यस्थलों पर एक आम जुमला सुनते हैं— "अनुभव ही सब कुछ है।" भारत में, विशेष रूप से हमारे सरकारी और कॉर्पोरेट तंत्र में, उम्र और पद पर रहने के वर्षों (seniority) को बुद्धिमत्ता और योग्यता का सबसे बड़ा सबूत मान लिया जाता है। लेकिन क्या वास्तव में 'समय गुजारना' ही 'उपलब्धि' है?

​हाल ही में हिमाचल प्रदेश के एक न्यायिक अधिकारी का मामला सामने आया, जिसमें उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में यह चुनौती दी थी कि उनके जूनियर को उनसे पहले पदोन्नति दे दी गई। कोर्ट ने इस याचिका को खारिज करते हुए एक बड़ा और जरूरी संदेश दिया: "सिर्फ क्रोनोलॉजी (समय क्रम) ही तरक्की का आधार नहीं हो सकता।"

​संस्कृति का 'सीनियरिटी कल्ट'

​भारतीय समाज में हम 'बुजुर्गों' और वरिष्ठों का सम्मान करना बखूबी जानते हैं। यह हमारी संस्कृति का हिस्सा है। लेकिन समस्या तब आती है जब इस सम्मान को पेशेवर जगत में योग्यता के ऊपर बैठा दिया जाता है। हम 'सीनियरिटी' को एक अधिकार (Entitlement) समझने लगते हैं, जबकि सच्चाई यह है कि वरिष्ठता सिर्फ सम्मान पाने के लिए है, काम में बेहतर प्रदर्शन का प्रमाण-पत्र नहीं।

​संस्थाओं को क्यों होता है नुकसान?

​जब किसी संस्थान में पदोन्नति 'कन्वेयर बेल्ट' (जो पहले आया, उसे पहले पद मिलेगा) की तरह होती है, तो वहाँ नवाचार (innovation) और समस्या सुलझाने की क्षमता मर जाती है। इसका सीधा असर पड़ता है:

​नेतृत्व की कमी: जब 'सर' बने रहने की मानसिकता हावी होती है, तो नई सोच को दबा दिया जाता है।

​प्रतिभा का पलायन: जो युवा और प्रतिभाशाली कर्मचारी तेजी से आगे बढ़ना चाहते हैं, वे ऐसी दकियानूसी जगहों को छोड़कर चले जाते हैं।

​सुस्ती: जब सबको पता हो कि बस वक्त काटना है, तो कोई भी अतिरिक्त प्रयास करने की कोशिश नहीं करता।

​आगे का रास्ता: 'योग्यता' आधारित संस्कृति

​यह  पारदर्शिता के खिलाफ नहीं है। पारदर्शिता जरूरी है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि हर नियुक्ति के बाद अदालतों में केस दर्ज हों। संस्थानों को यह अधिकार होना चाहिए कि वे उन गुणों को पहचानें और पुरस्कृत करें जो फाइलों के ढेर में नहीं दिखते—जैसे कि लीडरशिप, निर्णय लेने की क्षमता और ईमानदारी।

​सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला उन सभी संस्थानों के लिए एक 'वेक-अप कॉल' है। यदि हमें एक विकसित और प्रभावी राष्ट्र बनना है, तो हमें 'हुए कितने साल हुए' के बजाय 'हमने क्या और कैसा काम किया' पर ध्यान केंद्रित करना होगा।

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