शिक्षा के मंदिर में 'रिश्वत' का धंधा — गुरु नहीं, यह शिक्षा के नाम पर कलंक है !

 




शिक्षा को समाज का तीसरा नेत्र माना गया है और एक शिक्षक को उस नेत्र को खोलने वाला मार्गदर्शक। लेकिन जब ज्ञान के इसी मंदिर का मुख्य पुजारी ही सौदागर बन जाए, तो पूरी व्यवस्था की नींव हिल जाती है। 

पटना के संपतचक स्थित उत्क्रमित उच्च माध्यमिक विद्यालय, चैनपुर के प्रधानाध्यापक कुणाल प्रियदर्शी को ₹50,000 की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों गिरफ्तार किया गया है। शर्म की बात यह है कि यह रिश्वत कोई बड़ा ठेका पास कराने के लिए नहीं, बल्कि वार्षिक माध्यमिक परीक्षा 2026 में सफल हुए 152 गरीब छात्रों के अंक प्रमाण पत्र (Marksheet) और सी.एल.सी. (CLC) देने के एवज में ₹400 प्रति छात्र के हिसाब से मांगी जा रही थी।

1. छात्रों के भविष्य और अधिकारों का सौदा

एक छात्र जब कड़ी मेहनत के बाद परीक्षा पास करता है, तो उसकी मार्कशीट और सर्टिफिकेट उसका कानूनी अधिकार होते हैं। उन दस्तावेजों पर उसकी आगे की पढ़ाई और करियर टिका होता है। एक प्रधानाध्यापक  द्वारा अपने ही स्कूल के उत्तीर्ण छात्रों से उनके वैध कागजात देने के लिए प्रति छात्र ₹400 की डिमांड करना यह दर्शाता है कि शिक्षा का स्तर कितना गिर चुका है। यह सीधे तौर पर गरीब और मध्यमवर्गीय छात्रों के भविष्य के साथ सरेआम डकैती है।

2. 'गुरु' की गरिमा मटियामेट

भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान भगवान से भी ऊपर बताया गया है। लेकिन जब एक प्रधानाध्यापक अपने कार्यालय कक्ष में ही रिश्वत की गड्डियां गिन रहा हो, तो वह गुरु कहलाने के लायक नहीं रह जाता। यह घटना केवल एक व्यक्ति का भ्रष्टाचार नहीं है, बल्कि यह उस पूरे विश्वास का कत्ल है जो एक छात्र और अभिभावक स्कूल प्रशासन पर करते हैं।

3. व्यवस्थागत सड़न का प्रतीक

यह मामला इस बात का भी सबूत है कि निचले स्तर पर प्रशासनिक भ्रष्टाचार किस कदर हावी है। ₹400 प्रति छात्र की छोटी लगने वाली यह रकम जब 152 छात्रों से वसूली जाती है, तो यह एक संगठित उगाही बन जाती है। सवाल यह उठता है कि क्या यह पहली बार हो रहा था? या ऐसी अवैध वसूली कई विद्यालयों में एक सामान्य प्रक्रिया बन चुकी है, जिसके खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत हर कोई नहीं कर पाता? इस मामले में परिवादी अरुण कुमार सिंह की हिम्मत की सराहना करनी होगी जिन्होंने इस अंधेरे के खिलाफ आवाज उठाई।

केवल गिरफ्तारी काफी नहीं

विजिलेंस टीम द्वारा की गई यह कार्रवाई सराहनीय है, लेकिन यह इस गंभीर बीमारी का केवल एक 'लक्षण'  है, इलाज नहीं। जब तक शिक्षा विभाग के भीतर ऐसी दलाली और घूसखोरी को जड़ से खत्म करने के लिए कठोर और पारदर्शी डिजिटल व्यवस्था (जैसे ऑनलाइन सर्टिफिकेट डिलीवरी) नहीं बनाई जाएगी, तब तक "कुणाल प्रियदर्शी" जैसे लोग शिक्षा के मंदिर को कलंकित करते रहेंगे।

यह घटना चीख-चीख कर कह रही है कि अब समय आ गया है कि शिक्षा व्यवस्था की इस सड़ांध को साफ किया जाए, वरना डिग्रियों के कागजात तो मिल जाएंगे, लेकिन आने वाली पीढ़ी का व्यवस्था पर से भरोसा हमेशा के लिए उठ जाएगा।

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